जुहेब आज़ाद:

बुनकर समुदाय के लोग अपने असाधारण बुनाई कौशल के लिए जाने जाते रहे हैं, भारत के पारंपरिक कपड़ा उद्योग की समृद्ध विरासत का वह एक अभिन्न अंग रहे हैं। हालाँकि, खगड़िया ज़िले के पर्वता ब्लॉक के अगुवानी गाँव की फील्ड विज़िट के दौरान एक बेहद ही हताश करने वाली वास्तविकता सामने आई। यहाँ रह रहे करीब 150 बुनकरों का समुदाय, एक समय की अपनी संपन्न बुनाई की परंपरा और उसका बहुमूल्य ज्ञान खो चुका है। पारंपरिक ज्ञान के इस नुकसान को सीधे तौर पर भूमि अधिकारों के अभाव से जोड़ कर देखा जा सकता है, जिसका अगुवानी गाँव समेत देश के कई बुनकर समुदायों पर गहरा प्रभाव पड़ा है।

बहिष्कृत हितकारी संगठन की टीम के साथ जब हम बुनकर समुदाय के साथ मीटिंग के लिए जा रहे थे तो हमें बेहतरीन कपड़े बनाने वाले करघों के मनमोहक दृश्य और उनके घरघराने की आवाज़ें सुनने की उम्मीद थी। लेकिन इसके बजाय, हमें निराशा ही हाथ लगी, क्योंकि अगुवानी गाँव के बुनकर टोले में आज एक भी करघा मौजूद नहीं है। समुदाय के लोगों ने बताया कि उन्हें बुनाई का काम छोड़े हुए कई साल और पीढ़ियाँ बीत गई हैं। एक समय की यह समृद्ध परंपरा आज लुप्त हो चुकी है और वर्तमान पीढ़ी के पास अपने पूर्वजों के ज्ञान और कौशल का अभाव है।

बुनाई परंपरा में दिखने वाली यह गिरावट महज़ एक संयोग नहीं थी। कपड़ा उद्योग के मशीनीकरण के बाद वैसे ही हथकरघा कारीगरों की आजीविका पर बड़ा प्रभाव पड़ा। साथ ही हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए बने खादी ग्राम उद्योग जैसे संस्थानों के बंद होने से बुनकरों की आजीविका पर और बड़ा आघात पहुँचा। खादी ग्राम उद्योग से बुनाई के मिलने वाले ऑर्डरों के बंद हो जाने के कारण, बुनकरों को आय के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी पड़ी। अक्सर उन्हें मामूली दैनिक मज़दूरी का काम करना पड़ता था, जिसके लिए बुनाई कौशल की आवश्यकता नहीं होती थी। नतीजतन, कई बुनकरों को बेहतर अवसरों की तलाश में पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिससे समुदाय का अपने पारंपरिक शिल्प से जुड़ाव और कमज़ोर हो गया।

बुनकरों के बीच पारंपरिक ज्ञान के नुकसान का एक महत्वपूर्ण कारक, ज़मीन तक उनकी सीमित पहुँच भी है। पीढ़ियाँ बीतने के साथ पारिवारों में लोग बढ़ते गए, लेकिन ज़मीन बंटती चली गई। जीविका और अस्तित्व के सवाल ने समुदाय को अपने पारंपरिक कौशल और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के बजाय, तत्काल आर्थिक ज़रूरतों को प्राथमिकता देने के लिए मजबूर किया। भूमिहीन या ज़मीन का स्वामित्व बहुत कम होने की वजह से वे अपने पारंपरिक व्यवसाय और कौशल को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने में असमर्थ थे।

बुनकरों की यह दुर्दशा पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में भूमि अधिकारों की महत्वपूर्ण भूमिका की मार्मिक याद दिलाती है। ज़मीन पर अधिकार, भारत के बहुजन पारंपरिक कारीगरों और आदिवासी समुदायों को उनके पारंपरिक कौशल, संस्कृति और परम्पराओं को बनाए रखने और उन्हें विकसित करने के लिए एक मजबूत आधार मुहैया कराता है। ज़मीन पर स्वामित्व होने से वे खेती कर सकते हैं और अपनी कला के लिए आवश्यक संसाधन जुटा सकते हैं, जिससे भावी पीढ़ियों के लिए इसकी निरंतरता सुनिश्चित हो सकेगी।

इसके अलावा, भूमि स्वामित्व समुदायों को उनकी आर्थिक गतिविधियों के बारे में अपने विवेक से फैसले लेने का अधिकार देता है। भूमि से मिलने वाली पूँजी को कौशल विकास, तकनीकों के आधुनिकीकरण और ज़रूरी औज़ार लेने में खर्च किया जा सकता है, यह सभी ही तो पारंपरिक शिल्प को ज़िंदा रखने के लिए ज़रूरी हैं।

अगवानी गाँव के बुनकरों की यह कहानी, मज़दूर वर्ग और पारंपरिक शिल्प पर आजीविका के लिए निर्भर समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को बरकरार रखने में भूमि अधिकारों के महत्व पर रौशनी डालती है। उनके बुनाई के कौशल का ख़त्म हो जाना एक चेतावनी है, यह ऐसे नीतिगत उपायों की ज़रूरत को रेखांकित करती है जो इन समुदायों की सांस्कृतिक विरासत पर बढ़ते खतरे को पहचाने और उनकी रक्षा करने के प्रयास करें। भूमि अधिकारों को सुरक्षित करके और स्थायी आर्थिक अवसरों को बढ़ावा देकर, हम पारंपरिक कौशल के संरक्षण और विकास को सुनिश्चित कर सकते हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक विविधता की समृद्ध कलमकारी को बढ़ावा दे सकते हैं। इन समुदायों को समर्थ और सशक्त बनाने के ठोस प्रयासों से ही हम उनका बहुमूल्य ज्ञान और विरासत का समय की कसौटी पर खरा उतर पाना तय कर पाएंगे।

मौजूदा समय में भूमि अधिकार के लिए चल रहे जनांदोलनों में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिल रही है। पूंजीवाद समर्थक राजनीतिक अभिजात वर्ग द्वारा भूमि आंदोलनों के दमन को इस गिरावट के लिए ज़िम्मेदार माना जाना चाहिए। उसके साथ-साथ सांप्रदायिक राजनीति के उदय ने भी आज़ादी के बाद भूमि सुधारों की प्रगति पर एक बड़ा नकारात्मक असर डाला है। राजनीति के इस विभाजनकारी रूप ने मज़दूर वर्ग की एकता को खंडित किया है, जिसकी वजह से संगठित होकर अपने भूमि अधिकारों की वकालत और दावा करने की उनकी क्षमता कम हो गई है। मौजूदा दौर में श्रमिक वर्ग के हितों को प्राथमिकता देने वाले समाज की स्थापना के असरदार साधन के रूप में भूमि अधिकार आंदोलनों को बढ़ावा देने की तत्काल ज़रूरत को समझना आज बहुत ज़रूरी है। 

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  • जुहेब, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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