रिया खत्री और रोहित:

हाल ही में, सरकार ने 18 से 22 सितम्बर 2023 तक संसद का एक विशेष सत्र बुलाया। 18 सितम्बर को महिलाओं के आरक्षण के लिए एक बिल प्रस्तुत करने की बात की और अगले ही दिन 19 सितम्बर 2023 को भारत के कानून मंत्री द्वारा भारतीय संविधान के 128वें संशोधन बिल, 2023 के रूप में महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में प्रस्तुत किया। इस बिल में लोकसभा और विधानसभाओं में कुल सीटों का एक तिहाई भाग महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है।

पिछले 27 वर्षों से भारतीय संविधान में यह संशोधन करने का असफल प्रयास अलग-अलग सरकारों द्वारा किया गया था। सर्वप्रथम वर्ष 1996 में और उसके बाद वर्ष 1998 में, वर्ष 1999 में और वर्ष 2008 में बिल पेश किए गए। पहले तीन बिल संबंधित लोकसभाओं के भंग होने के साथ खत्म हो गए। बिल को पारित करने के अंतिम प्रयास के रूप में महिलाओं के आरक्षण के लिए वर्ष 2008 में बिल को राज्यसभा द्वारा पारित किया गया, लेकिन 15वीं लोकसभा के भंग होने के साथ ही यह बिल भी खत्म हो गया।

ज्ञात रहे कि वर्ष 1993 में 73वें और 74वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायतों और नगर पालिकाओं को शामिल किया और इन निकायों में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित की थी।

संसद की एक संयुक्त समिति ने वर्ष 1996 के बिल की समीक्षा की, जबकि वर्ष 2008 के बिल की समीक्षा स्टैंडिंग कमिटी ने की। दोनों कमिटियों ने महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के प्रस्ताव पर सहमति जताई। इन समितियों ने कुछ सुझाव भी दिए, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

1- उचित समय में अन्य पिछड़े वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षण पर विचार किया जाए।

2- 15 वर्ष की अवधि के लिए आरक्षण दिया जाए और उसके बाद उसकी समीक्षा की जाए, और

3- राज्यसभा और राज्य विधान परिषदों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने की प्रक्रियाओं पर काम किया जाए।

आख़िरकार दिनांक 20 सितम्बर 2023 को यह बिल लोक सभा द्वारा दो-तिहाई बहुमत से पास किया गया एवं दिनांक 21 सितम्बर 2023 को राज्य सभा द्वारा बहुमत से पास किया गया। 29 सितम्बर को राष्ट्रपति ने इसे मंजूरी दे दी और यह एक कानून बन गया।

कानून के मुख्य उद्देश्य:

  • राजनीतिक व्यवस्था में महिलाओं को एक तिहाई प्रतिनिधित्व प्रदान करना।
  • राजनीतिक व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना।
  • महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त करना इत्यादि।

कानून के मुख्य प्रावधान: महिलाओं के लिए आरक्षण: यह कानून जहाँ तक हो सके, लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली की विधानसभा की कुल सीटों का एक तिहाई भाग महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान करता है। और इस कानून में दलित और आदिवासी समुदायों के महिला सदस्यों के लिए भी आरक्षण का प्रावधान है।

यह आरक्षण लागू कब होगा: यह कानून अगली जनगणना के आंकड़े जारी होने और इन आंकड़ों के प्रकाशित होने के बाद महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के लिए परिसीमन किया जाएगा उसके बाद यह कानून लागू होगा। परिसीमन संसदीय या विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया है और जनसंख्या के आधार पर सीटें आवंटित करना इसका मुख्य उद्देश्य है।

आरक्षण की अवधि: इस कानून के तहत आरक्षण शुरुआत के 15 साल की अवधि तक दिया जाएगा। उसके बाद परिसीमन होगा और फिर से महिलाओं की जनसँख्या के आधार पर संसद द्वारा सीटों को आरक्षित किया जायेगा।

इस कानून की कमियाँ:

1- इस कानून कि सबसे बड़ी कमी यह है कि इसके तहत अन्य पिछड़े वर्गों एवं अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं को कोई आरक्षण नहीं दिया गया है, जबकि इनकी जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या का बड़ा हिस्सा है।

2- यह कानून तत्काल प्रभावी ना होकर अगली जनगणना के आंकड़े जारी होने और इन आंकड़ो के प्रकाशित होने के बाद महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के लिए परिसीमन किया जाएगा, उसके बाद लागू होगा। और अब तक यह भी तय नहीं है कि अगली जनगणना कब होगी और इसके बाद परिसीमन कब होगा, इसकी भी कोई समय सीमा तय नहीं की गई है।

3- यह आशंका है कि महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर पुरुष प्रॉक्सी के रूप में कार्य करेंगे, जिसके कारण महिलाएं अपनी कार्य कुशलता और क्षमता का प्रदर्शन करने में असमर्थ होंगी, उनके क्षेत्र की महिलाओं के विचार भी नहीं रख पाएंगी। जैसा नगर निकायों और पंचायत चुनावों में होता है।

4- यह किसी भी लोकतंत्र के लिए बुनियादी है कि नीति, नियम और कानून बनाने के लिए सभी समुदायों की भागीदारी हो। अगर सरकार महिलाओं की भागीदारी के लिए आरक्षण दे रही है तो इसके लिए सबसे पहले जनगणना करनी चाहिए थी और उसके बाद महिलाओं की जनसंख्या के अनुसार उनके लिए सीटें आरक्षित करनी चाहिए थी। सिर्फ 33% प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने का क्या आधार है?

इस कानून से जुड़े कुछ बुनियादी सवाल:

1- क्या यह कानून सिर्फ आगामी चुनाव के लिए जुमला मात्र है?

2- क्या महिलाओं को सिर्फ आरक्षण के माध्यम से सरकारी तंत्र में प्रवेश मिल सकता है अन्यथा नहीं?

3- क्या यह कानून भी सिर्फ किताबों तक ही सीमित रहेगा जैसा कि नगर निकायों और ग्राम पंचायतों में आरक्षित सीटों पर हो रहा है, जहाँ नाम मात्र के लिए महिलाओं की भूमिका है जबकि ज्यादातर मामलों में, इन निकायों में वास्तविक सत्ता पुरुषों द्वारा संचालित होती है?

Authors

  • रिया खत्री / Riya Khatri

    रिया, मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले से हैं और जेनिथ संस्था के साथ एक पैरालीगल के तौर पे काम करती हैं। रिया को कोरियन सिरीज़, लोग बहुत पसंद है। उन्हें चेस खेलना एवं किताबे पढ़ना पसंद है।

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  • रोहित / Rohit

    रोहित, मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले से हैं और कानून के विधार्थी हैं। वर्तमान में रोहित मध्य प्रदेश में जेनिथ संस्था के साथ इंटरशिप कर रहे हैं। वह किताबें पढ़ना और विभिन्न देशों का सिनेमा देखना पसंद करते हैं।

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