कोर्दूला कुजूर:
एक व्यक्ति को सम्पूर्ण होने के लिए उनके अन्दर सौन्दर्य बोध का होना अनिवार्य है। क्योंकि उसके बिना उनका जीवन खोखला (अधूरा) है। यदि उसको हम एक व्यक्ति की दृष्टि से देखें तो अगर मन सच्चा होगा तो चरित्र भी अच्छा होगा, और जब चरित्र अच्छा होगा तभी हम एक अच्छे समाज की कल्पना कर सकते हैं। इस दृष्टिकोण से यदि हम आदिवासी समाज की बात करें तो इन्हीं गुणों के कारण वह सबको सहजता से स्वीकारता है। उनके अन्दर की आत्मीयता के कारण ही आज वह प्रकृति को बचा पाने में समर्थ हो पाया है।
जंगल के एक-एक पेड़ पौधे और जीव जन्तुओं के प्रति उनका स्नेह ही उनको सहजीवन का बोध कराता है। वह (आदिवासी) जब जंगल में पेड़ काटने जाता है तो पहले अर्जी करता है और (क्षमा या) उससे इजाज़त मांगता है, कि वह अपनी ज़रूरत अथवा पूजा (करम) के लिए उसे काट रहा है। करम देवता अथवा अन्य पेड़ उसे माफ करे। जब वह जलावन अथवा अन्य घरेलू काम के लिए लकड़ी काटता है तो फलदार वृक्ष को नहीं काटता, क्योंकि उस पेड़ विशेष के फल से कई जीव जन्तुओं को भोजन मिलता है। यदि वह कोई फल खाता है तो उसके बीज को झाड़ियों के झुरमुट में फेंकता है, ताकि वह झाड़ियों के संरक्षण में बढ़े, और पुन: फल लाए। आदिवासी जब शिकार के लिए जंगल में जाता है तो बच्चा देने वाली (गर्भधारित) जीवों (जानवरों) का शिकार नहीं करता। इसके लिए वे मौसम को देखते हैं कि कौन से महिने में जीव-जंतु अथवा पशु-पक्षी गर्भ धारण करते हैं या अंडा देते हैं, उस मौसम में जंगल में शिकार करना मना रहता है। उसी तरह यदि हम एक गाय और बछड़े की बात करें तो वे मानते हैं कि गाय के दूध पर पहला अधिकार उसके बछड़े का होता है।
इस तरह से जंगल के पेड़-पौधों और जीव जगत से उनका लगाव और स्नेह उनके अन्दर के सौन्दर्य बोध के कारण ही तो होता है। यदि हम मानव शरीर की बात करें तो उनके अन्दर मन, बुद्धि और भावनाएं होती हैं, साथ ही आध्यात्मिक पक्ष भी होता है और यही हमें सौंदर्य का बोध कराता है। आदिवासी समाज के लोग सरल स्वभाव के होते हैं। किन्तु आदिवासी समाज में भी यदि हम उरांव समाज की बात करें तो उनका सरल स्वाभाव के कारण वे सहज ही किसी भी समाज के साथ घुल-मिल जाते हैं, और अपने समाज में आत्मसात भी कर लेते हैं।
यदि हम उरांव समाज की कला पक्ष को देखें तो उनके अन्दर कई अनूठी कलाएँ भी होती हैं जो दूसरे समाज से उनको कुछ अलग करती हैं। सबसे पहले हम उनके घर बनाने की कला को देखें, तो उनके घर की बनावट चौपाईर (चौपाया) होता है। अर्थात चारों तरफ घर और बीच में आंगन होता है। चौपाईर / चौपाया का मतलब मिट्टी के घर में चारों तरफ ढाबा और बीच में कोठरियां होती हैं। छप्पर छारते समय जहाँ से चौड़ाई वाली छत उतरती है वहाँ (उस कोने में) तावा खपाकर या ढाककर डिजाइन दिया जाता है। घर का छप्पर काठ और खपड़े का होता है। घर के दिवार को लीपने और पोतने का उनका अपना तरीका (डिजाइन) होता है। घर की लिपाई सामान्यतः चुंही मिट्टी (पुतनी/सफेद) और नगड़ा मिट्टी से होता है। दिवाल के उपरी हिस्सों को चूंही मिट्टी से लीपते हैं और नीचे लगभग तीन-चार फीट के लगभग नगड़ा मिट्टी से बोर्डर दिया जाता है जिसे पइर’ आना कहते हैं। घर की दिवालों की लिपाई के समय एक विशेष तरह का डिजाइन दिया जाता है। जैसे – घर की पूरी लिपाई-पुताई हो जाने के बाद कई लोग उसकी सुन्दरता को बढ़ाने के लिए अपने पांचों अंगुली से झुंपानुमा सफेद या काली मिट्टी से डिजाइन देते हैं। ये डिजाइन सदानी (गैर आदिवासी) लोग भी देते हैं, लेकिन उनका अपना अलग महत्व है, वे इसे पवित्र और शुभ मानते हैं। इसका प्रयोग प्राय: दिवाली और शादी विवाह के अवसर पर होता है। कहा जाता है कि इससे लक्ष्मी प्रसन्न होती है।
‘लकड़ी या काष्ठ कला’ इस समाज के लोग लकड़ी से कई चीज़ें बनाते हैं, जो उनके घर-गृहस्थी के काम, कृषि कार्य, रीझ रंग और अन्य कामों में उपयोग होता है। जैसे हल – जूआट बहिंगा, लाईट खूंटा (कुआँ से पानी निकालने का यंत्र), पटा (जोत जमीन को समतल करने वाला यंत्र), ठेचका (एक तरह का बाजा) मांदर और ढोलकी का खोल। ओखली, गुलेल और धनुष-कमान, विभिन्न औजारों के डिजाइनदार बेंत, पशु, भेड़-बकरी खासतौर से गाय-बैल और भैंस जंगल में खो न जाए, इसके लिए रली। घटी और ठरकी (एक तरह का घंटी) बनाकर जानवरों के गले मे बांधते हैं। दरवाज़े और चौकी (बेड) पर सुन्दर नक्काशी, बैठने के लिए पिड़हा, मचिया, चौंकी (कुर्सी)। तेल पेरने के लिए कोल्हू और पटनी, कलछुल, छोलनी और चुल्लो, नदी पार करने के लिए विशेष लकड़ी से डोंगा (नाव), बांस से मुरली और तिरयो (बाँसुरी), मछली फँसाने के लिए कुमनी तथा बांस का छाता बनाते हैं। अपने-अपने गाँव के प्रतीक चिन्ह के रूप में काठ का घोड़ा, बाघ, लोमड़ी, धनेश चिड़िया, मोर, रंपा-चंपा और बहुत सारी आकृतियाँ लकड़ी से ही बनाई जाती हैं। इन चिन्हों को सजाकर गाँव के विशेष मेले में नाचते-गाते ले जाते हैं। इन सारी चीजों को बनाते समय, चीजों के साथ आत्मीयता होती है। इन सारे कामों को वे दिल लगाकर करते हैं। उसको बनाते समय कई बार छूते हैं, कतरते हैं और सुमराते हैं, तब उनको अन्तिम रूप देते हैं। मानवीय सौंदर्य बोध के बिना यह कतई सम्भव नहीं है।
‘वस्त्र कला’ पहले उरांव समाज के लोग अपना पहनने के लिए खुद कपड़ा तैयार करते थे। उन दिनों गाँव के कई घरों में हथकरघा हुआ करता था। वे खुद के खेतों से कपास निकालते, सूत कातते और वस्त्र बनाते थे। ये सूत कातने और वस्त्र बिनाई के लिए वे खुद चरखा, टकुआ और करघा का निर्माण करते थे। कपड़ा या धागे की रंगाई के लिए जंगल के चैली नामक पेड़ के छाल से रंग तैयार करते थे। इनके द्वारा बनाये कपड़े में मुख्यतः तीन डिजाइन होते हैं- खोमड़ा बन्ना, आरी बन्ना, और सिकड़ी बन्ना। इन डिजाइनों के उपर फिर से रंग-बिरंगे धागों से फूल-पत्तियां खेलते हुए छोटे बच्चे, जानवरों के बच्चे, तितलियाँ तथा चिड़िया इत्यादि बनाते हैं। ये डिजाइन साड़ियों, करया (धोती), पगड़ी और शाॅल में बनाए जाते हैं। ये हस्त निर्मित फूल, कपड़ों की सुन्दरता में चार चाँद लगा देते हैं। नाचने के लिए कलिंगा और फुदना (रंग बिरंगे धागों के गुच्छे से बने फूल) बनाने का अद्भूत कला भी उनके पास है। अपने द्वारा सजाए इन वस्त्रों को पहनकर, तथा रंग-बिरंगी फुदना और कलिंगा लगाकर जब ये अखड़ा में नाचने उतरते हैं तो उनकी कला देखते ही बनती है और यह काफी मनमोहक भी होता है। इस तरह हम देखते हैं कि इन सारी चीजों को बनाने में उनकी स्नेह भरी आत्मीयता होती है, जो उनके अन्दर के सौन्दर्य बोध को दर्शाती है।

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