राजू:
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 पर लेख की सीरीज के भाग – 1 में हमने चर्चा की थी कि इस अधिनियम का उद्देश्य क्या है और यह अधिनियम किन सामाजिक परिस्थितियों में लाया गया था, इस अधिनियम के तहत कौन से कृत्यों को अपराधों की श्रेणी में रखा गया है व इन अपराधों के लिया क्या सजा का प्रावधान है, इसके बारे में चर्चा किया था।
लेख की इस सीरीज के भाग – 2 में हम दूसरे समुदायों के सदस्यों द्वारा दलित और आदिवासी समुदाय के सदस्यों पर किये गए अपराधों में क्या कानूनी कार्यवाही की जा सकती है? कहाँ की जा सकती है? शिकायत करने की प्रक्रिया और जमानत से संबंधित प्रावधानों के बारे में चर्चा करेंगे।
इस अधिनियम के तहत कानूनी कार्यवाही और प्रक्रिया
दलित या आदिवासी समुदाय के सदस्यों के साथ अत्याचार होने पर वह निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं-
- पुलिस थाना पर जा कर रिपोर्ट लिखवा सकते हैं
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति विशेष अदालत में शिकायत कर सकते हैं
दलित या आदिवासी सदस्यों के साथ अपराध होने पर वह लिखित रूप में एक सामान्य आवेदन, सम्बंधित पुलिस थाने के पुलिस अधिकारी को दे सकता है।
अगर पुलिस अधिकारी रिपोर्ट लिखने से मना कर देता है तो लिखित में एक आवेदन पुलिस अधीक्षक (SP) को दिया जा सकता है।
पुलिस अधिकारी द्वारा रिपोर्ट न लिखने पर इस अधिनियम के तहत अपने कर्तव्य का पालन न करने के कारण उसके खिलाफ धारा 4 के तहत भी रिपोर्ट की जा सकती है। इसके लिये उसे 6 महीने से 1 साल तक की सजा भी मिल सकती है।
आप सीधे ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति विशेष अदालत में शिकायत भी कर सकते है। अधिनियम की धारा 14 में विशेष अदालत की स्थापना की गयी है, जो कि अत्याचार के मामलों की त्वरित जाँच और सुनवाई सुनिश्चित करती है ताकि पीड़ित को उचित समय में न्याय मिल सके।
अधिनियम में रिपोर्ट दर्ज होने के 60 दिन के भीतर पुलिस को जाँच पूरी करके चार्जशीट या चालान को विशेष अदालत में पेश करना होता है, और चालान पेश करने के बाद 60 दिन में ट्रायल या विचरण को खत्म करके निर्णय देने का प्रावधान है। निर्णय के बाद अगले 90 दिन में अपील करने का अधिकार है।
इस अधिनियम के अलावा पीड़ित, राष्ट्रीय या राज्य अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति आयोग में भी शिकायत कर सकते हैं।
दलित समुदाय के सदस्य राष्ट्रीय या राज्य अनुसूचित जाति आयोग की वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन शिकायत कर सकते हैं।
राष्ट्रीय आयोग में शिकायत इस वेबसाइट- https://ncsc.negd.in/Login.aspx पर जाकर किया जा सकता है।
सम्बंधित आयोग के अधयक्ष को ई-मेल के माध्यम से भी शिकायत दर्ज की जा सकती है।
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अधयक्ष को उनकी ई-मेल – chairman-ncsc@nic.in पर भी शिकायत भेज सकते हैं।
आदिवासी समुदाय के सदस्य राष्ट्रीय या राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग की वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन शिकायत कर सकते हैं। राष्ट्रीय आयोग में शिकायत इस वेबसाइट- https://ncstgrams.gov.in/public/webcomplaint.aspx पर किया जा सकता है। सम्बंधित आयोग के अधयक्ष को ई- मेल के माध्यम से भी शिकायत दर्ज की जा सकती है। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अधयक्ष को उनकी ई-मेल – chairperson@ncst.nic.in पर भी शिकायत भेज सकते है।
पीड़ित सदस्य राष्ट्रीय व राज्य मानव अधिकार आयोग में भी शिकायत कर सकते है। यह शिकायत सम्बंधित आयोग की अधिकारिक वेबसाइट पर ऑनलाइन भी की जा सकती है। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग में शिकायत इस वेबसाइट- https://hrcnet.nic.in/HRCNet/public/webcomplaint.aspx पर की जा सकती है। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष को उनकी ई-मेल – chairnhrc@nic.in पर भी शिकायत भेज सकते हैं।
गिरफ़्तारी और जमानत से सम्बंधित प्रावधान
अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत किये गए अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती हैं। इसका मतलब यह है कि यदि इस अधिनियम के तहत दलित या आदिवासी समुदाय के सदस्य के खिलाफ कोई अपराध किया जाता है तो पुलिस के पास अपराधी को बिना किसी गिरफ्तारी वारंट के गिरफ्तार करने की शक्ति है। इसके अलावा, अधिनियम के तहत गिरफ्तार किये जाने पर अपराधी को जमानत नहीं दी जा सकती है, केवल विशेष अदालत या इसके ऊपर वाली अदालत ही जमानत दे सकती है।
दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 438 में अग्रिम जमानत से सम्बंधित प्रावधान है। अग्रिम जमानत से मतलब है, कि अगर किसी व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी का भय है, और उसे गैर-क़ानूनी रूप से गिरफ्तार किया जा रहा है या किसी प्रकरण में झूठा फंसाया जा रहा है, तो वह व्यक्ति गिरफ्तार होने के पूर्व ही जिला सत्र या उच्च न्यायालय से अग्रिम जमानत मांग सकता है। इस अधिनियम की धारा 18 में यह स्पष्ट प्रावधान है कि इस अधिनियम के दायरे में आने वाले अपराधों पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 लागू नहीं होगी, अर्थात अगर किसी व्यक्ति ने दलित या आदिवासी समुदाय के सदस्य के साथ अत्याचार किया गया है, तो उसे वह व्यक्ति अग्रिम जमानत के लिए आवेदन नहीं कर सकता है।
अगले भाग में हम इस अधिनियम के तहत मुआवजे और इस कानून की कमियाँ तथा अन्य प्रावधानों के बारे में चर्चा करेंगे। तो चलिए मिलते है अगले भाग में, तब तक के लिए अपना ख़याल रखिये।
जय भीम! जय जोहार!
फीचर्ड फोटो आभार: गीक्स फॉर गीक्स

Leave a Reply