मनीषा शहारे:

नांगलडोह गाँव, महाराष्ट्र के गोंदिया ज़िले के अर्जुनी मोरगाँव तालुका में आता है। यह गाँव 10 किमी दूर स्थित भरनोली गाँव की ग्रामपंचायत में आता है और जंगलों से घिरा हुआ है। भरनोली से तिरखुरी गाँव तक रास्ता है, पर नांगलडोह पहुँचने के लिए तिरखुरी गाँव से 8 किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता है। बारिश के समय में नाला आ जाने से, यह रास्ता भी बंद हो जाता है। बारिश खतम होने के बाद सभी लोग मिलकर 15 दिन तक रास्ता बनाते हैं, उसके बाद ही उस रास्ते पर आना-जाना हो पाता है। 

नांगलडोह गाँव में 11 परिवारों के 8 घर हैं। उस गाँव के लड़के-लड़कियाँ आश्रम स्कूल में पढ़ते हैं, चूँकि गाँव में स्कूल की सुविधा नहीं है। इस गाँव के लोग बांस कटाई का काम करते है और बांस कटाई का काम खतम होते ही शहरों की तरफ काम की तलाश में पलायन करते हैं। लड़कियों की आगे की पढ़ाई उनके माँ-बाप की इच्छा पर निर्भर होती है, अगर माँ-बाप मना करते है तो लड़कियाँ आगे की पढ़ाई नहीं कर पाती हैं। बांस कटाई के साथ-साथ गाँव के लोग थोड़ी खेती भी करते हैं। गाँव के आस-पास घना जंगल भी है, जहाँ से मौसम आने पर लोग महुआ भी चुनकर लाते हैं। गाँव के सभी लोगों के घर में आपको बहुत सारा महुआ दिख जाएगा। नांगलडोह गाँव के आस-पास कोई दूसरा गाँव नहीं है। इस गाँव में ना स्कूल है और ना ही आने-जाने की कोई सुविधा, ना डाक्टर है और ना बिजली की सुविधा है। सोलर पम्प की सुविधा से पानी धूप के समय में मिलता है, पर बारिश के समय में गाँव के लोग जंगल से बहता हुआ पानी ही पीते हैं। 

हाथियों की तबाही से पहले कुछ ऐसा था नांगलडोह गाँव

गाँव के लोगों के पास ज़मीन तो है पर यह गायरान (चराई की) ज़मीन है। गाँव वाले खेती कर, उपजी फसल को घर के उपयोग के लिए रखते हैं। बारिश के समय सभी जंगल से मशरूम, बांस के वास्ते, अरतफरी, रानतोंडरी, रानभेंडी, कोल्हारी आदि जैसी सब्ज़ियाँ खाने के लिए ले कर आते हैं। जंगल से तरह-तरह के कंद भी लाकर खाते हैं। गाँव के सभी लोगों को सरकारी राशन मिलता है, पर सरकारी राशन दुकानदार सभी परिवारों को 2 किलो राशन कम देता था। अगर गाँव के लोग इसके विरोध में कुछ बोलते, कि हम लोगों का राशन कम क्यूँ? तो राशन दुकानदार 3 महीने तक उस व्यक्ति/परिवार को राशन ही नहीं देता था। इसलिए सभी लोग चुप-चाप जितना राशन मिलता, उतना ले लेते। 

नांगलडोह गाँव में सभी आदिवासी लोग रहते है, सभी लोग मिल-जुल कर रहते हैं। लम्बे समय तक गाँव के लड़के-लड़कियों के पास जाति प्रमाण पत्र (कास्ट सर्टिफिकेट) नहीं था। पर संरपच की मदद से, कुछ लड़के-लड़कियों का कास्ट सर्टिफिकेट बना था। पिछले साल जनवरी 2022 में उस गाँव में कलेक्टर भी दौरा की थी। जिस दिन कलेक्टर ने आना था, उस दिन सामाजिक परिवर्तन संघटना की महिलाएँ, विलास भाऊ और समीक्षा उस गाँव में सुबह पहुँचे और गाँव के लोगों से मिलकर उनके मुद्दों के बारे में चर्चा की। जीवन जीने के लिए मूल-भूत सुविधाओं के आभाव में भी नांगलडोह गाँव में रहने वाले सभी लोग खुश थे, गाँव वालों की सिर्फ एक ही मांग थी कि उन्हें रास्ते की सुविधा मिल जाए। 

पिछले साल ही सितंबर महीने में उनके गाँव में 10 हाथियों का समूह आ गया था। उस समय कुछ महिलाएँ अपने घरों में खाना बना रही थी, तो कुछ बच्चों को संभाल रही थी, सब शाम के क्रियाकलापों में व्यस्त थे। अचानक से सभी को कुछ गिरने की आवाज़ आई, जब बाहर निकल कर बैल का गोठा गिरा हुआ हुआ देखा तब उन्हें समझ आया कि गाँव में हाथी घुस आए हैं। सब एक-दूसरे को आवाज़ देते हुए इधर-उधर भागने लगे और जंगल की ओर निकल गए। बच्चे-बूढ़े सभी को लेकर गाँव वाले, गाँव खाली करके भागे। 

घर तबाह हो जाने के बाद नांगलडोह के लोगों को स्थानीय स्कूल में शरण लेनी पड़ी

फिर देर रात करीब 1 बजे, बोरटोला गाँव के लोग जब नांगलडोह गाँव आये तो पाए कि वहाँ गर्भवती महिलाएँ भी थी और ऐसी महिलाएँ भी थी जिनके बहुत छोटे बच्चे थे। गाँव के सभी लोग बहुत घबराये हुए थे। बोरटोला गाँव के लोगों ने उनका यह हाल देख कर, वन विभाग को सूचित किया। फिर मिलकर नांगलडोह गाँव के लोगों के लिए रहने की व्यवस्था की गई। सुबह होते-होते रात की घटना व्हाट्सएप और फेसबुक ग्रुपस के माध्यम से तेज़ी से फैल गई और दिन भर में नांगलडोह गाँव में अलग-अलग राजनैतिक पार्टियों से जुड़े लोग, फोर व्हीलर (चार-चक्का गाड़ी) से नांगलडोह गाँव के लोगों को देखने आये। इसी के चलते गाँव में बहुत भीड़ इकट्ठा हो गयी।

नांगलडोह गाँव के लोग घबराये हुए थे और रो रहे थे। मदद के लिए पहुँचे लोगों ने पैसे देकर कुछ लोगों की सहायत की। वन विभाग ने गाँव वालों को खाने का सामान देकर मदद की, उनके रहने की व्यवस्था की, और सभी लोगों को कपड़े भी दिये गए। भरनोली गाँव के लोगों ने चावल इकठ्ठा करके मदद की। सामाजिक परिवर्तन संघटना की सभी महिलाओं ने एक मीटिंग आयोजित कर, चावल इकठ्ठा किया व कुछ चंदा भी जमा कर पीड़ित परिवारों को दिया। महिला, बच्चों और लड़कियों के लिए कुछ कपड़े भी लेकर दिये। 

अगले दिन, वन विभाग के साथ संघटना की महिलाएँ नांगलडोह गये। गाँव पूर्ण रूप से अस्त-व्यस्त हो रखा था। सभी बोल रहे थे कि घर पर पड़े महुआ की वजह से जंगल से हाथी गाँव की ओर आये। हाथियों के डर से लोग क्यूंकि भाग आये थे, इसलिए पीछे से हाथियों ने गाँव में खूब नुकसान किया। अतः गाँव वालों के पास ना कपड़े थे, ना खाना पकाने के लिए बर्तन व राशन। सभी लोग सहमे हुए, चुप बैठे थे। सभी परिवारों के लिए पास के स्कूल में रहने की व्यवस्था और खाने की व्यवस्था एक महीने के लिए की गयी। फिर विलास भाऊ भोंगाड़े, समीक्षा गणविर और सामाजिक परिवर्तन संघटना की सभी महिलाएँ, गाँव के लोगों  को मिलने गये और साथ ही कुछ राहत सामग्री भी दिए। वे सभी लोगों के साथ बैठकर बातचीत किए और इसी बातचीत में ज्ञापन देने की चर्चा की गई। परिणामस्वरुप तहसीलदार और कलेक्टर को पूरी स्थिति से अवगत कराते हुए ज्ञापन दिया गया। 

आपसी प्रेम के साथ एक छोटे से गाँव रहने वाले सभी लोग, एक ही दिन में अचानक बिखर गए। कोई समाज के मंदिर में, तो कोई झोपड़ी बनाकर रहने को मजबूर हो गए। आज इस घटना को हुए करीब एक साल बीत चुका है, लेकिन अभी भी नांगलडोह गाँव के लोग उस वक्त के बने अस्थाई घरों में ही रह रहे हैं। घटना के बाद 3-4 दिनों तक गाँव में कुछ लोग आए लेकिन फिर उसके बाद से आज तक ना तो कोई सरकारी अधिकारी गाँव वालों की सुध लेने आया न राजनैतिक पार्टियों के कोई नेता।  

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  • मनीषा, महाराष्ट्र के गोंदिया ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वह कष्टकारी जन आन्दोलन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम कर रही हैं।

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