फरीद आलम:
शाॅर्ट फिल्म “पंडित उस्मान” से व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता-अखण्डता को विकसित करने वाली बंधुता की समझ का प्रयास।
अकरम हसन द्वारा लिखित व निर्देशित शाॅर्ट फिल्म “पण्डित उस्मान” धार्मिक समागमता को प्रहसन के माध्यम से समाज की उस अयोग्यता का परीक्षण करती नज़र आती है जो इसकी स्वीकार्यता से पूरी तरह क़ासिर है। यह घृणा की राजनीति की भी पड़ताल करती है जो विभिन्न धार्मिक समुदाय के लोगों के मन-मस्तिष्क को इस हद तक विषाक्त किये हुए है कि वे किसी भी शांतिपूर्ण आनन्ददायी सम्भावना को पहले धार्मिक कसौटी पर कसते हैं और मन मुताबिक न होने पर उसे स्वीकार करने से इंकार कर देते हैं।
हास्य व्यंग्य फिल्म “पण्डित उस्मान” नौ वर्षीय एक बालक के इर्द-गिर्द अपना विमर्श बुनती चलती है जिसके पिता हृदय प्रत्यारोपण की प्रक्रिया से सफलतापूर्वक गुजर कर पूरे सोलह दिनों बाद घर लौटे हैं। आज उसकी खुशी का ठिकाना नहीं है कि उसके पिता स्वस्थ हो गये हैं और अब वे आँखें भी खोलते हैं।
शाॅर्ट फिल्म की अपनी विवशता होती है कि उसे आधे-पौन घण्टे के समय में ही अपनी बात मुकम्मल करनी होती है इसलिए वह बिम्बों, प्रतीकों का सहारा लेकर सत्ता की उन्माद पसन्दी से उत्पन्न सामाजिक, धार्मिक तंगनज़री के हर पैनेपन से टकराती अपनी यात्रा पूरी करती है।
शरबत तैयार करते हुए बालक आशू का यह कहना कि सुबह से शर्बत की दो बोतलें खत्म हो चुकी हैं यह प्रतिबिंबित करता है कि उस्मान पर्याप्त सामाजिक रप्त-ज़ब्त रखने वाले व्यक्ति हैं और उनकी कुशल क्षेम दरयाफ्त करने सुबह से अच्छी तादाद में लोग आ-जा चुके हैं।
घर में कुत्ता पला होना और उसका नाम शेर खान रखना यह प्रतिबिंबित करता है कि उस्मान पारम्परिक मुस्लिम धारणा – कुत्ते का अपवित्र (नाजायास नापाक) होने में विश्वास नहीं करते और उसके अच्छे रख-रखाव में सहज रूचि रखते हैं।
पड़ोस के गुब्बारे वाला बालक सोनू का उनके पुत्र आशू का दोस्त होना, मित्रता के प्रतीक स्वरूप आपस में चाॅकलेट और गुब्बारों का परस्पर आदान-प्रदान करना तथा उस्मान द्वारा सोनू की आगे की पढ़ाई के लिये उसकी माँ को राज़ी कर लेना व उसके भविष्य को लेकर गम्भीर वादा करना, उस्मान के बेहद ज़िम्मेदार, संवेदनशील व बंधुत्व की भावना से प्रेरित नागरिक होने को प्रतिबिम्बित करता है।
बालक आशू हृदय प्रत्यारोपण के बाद अपने पिता में आए उस व्यवहार परिवर्तन से अनभिज्ञ है जिसने परिवार के सदस्यों और पड़ोस तक को हतप्रभ कर रखा है। लेकिन उस्मान को नया जीवन मिला है और वे इसे साम्प्रदायिक संकीर्णताओं के भेंट हरगिज़ नहीं चढ़ा सकते।
चाचा आधुनिक शिक्षा से लैस हैं, हृदय प्रत्यारोपण विज्ञान और तकनीक द्वारा सम्भव बताकर उसकी महत्ता के कदरदान भी हैं, लेकिन पत्नी को कमअक्ल और कुपढ़ समझते हैं और अपने ज्ञान के गुमान से उसे अपमानित करने का कोई मौका नहीं चूकते जो उस वर्ग समूह में महिलाओ की हैसियत का आभास कराता है। उधर दिवंगत पण्डित जी की विधवा का अंधविश्वास के अंधेरे से चीख़ता विलाप उस वर्ग समूह में महिलाओं की शैक्षिक दुर्दशा का सटीक चित्रण है।
बालक आशू की निगाह से देखें तो हम महसूस करते हैं कि धार्मिक विश्वास के अंतर के मध्य लोग उस्मान के आधारभूत स्वास्थ्य और कुशलता को भुलाकर उनके व्यवहार परिवर्तन के कारणों पर ही केंद्रित हो गये हैं।
हृदय प्रत्यारोपण की युक्ति के माध्यम से निर्देशक अकरम हसन हमारे समाज के उन तौर-तरीकों की बखिया उधेड़ कर रख देते हैं जो समाज को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने का जरिया बनते हैं।
यह (बोक़राती) क़ाबिल चाचा का ही दिमाग है जो उस्मान के दिमाग को दुरूस्त लेकिन दिल को बीमार घोषित करता है। बोक़राती भाई का ही विश्लेषण है कि उस्मान का दिमाग बिल्कुल ठीक काम कर रहा है क्यूंकि वे सबको बराबर सही-सही पहचानते हैं। उनके अनुसार यदि व्यवहार परिवर्तन का कोई कारण हो सकता है तो बस वही दिल है जो ताज़ा-ताज़ा आयातित होकर उस्मान के शरीर में आया है और यहीं संदेह और परस्पर अविश्वास का बीजारोपण हो जाता है।
उस्मान मुसलमान होने के बावजूद गैर मुस्लिम संस्कारों को भी व्यवहार में लाने से परहेज नहीं करते। उनके इस व्यवहार ने धुर साम्प्रदायिक मानसिकता के लोगों के भी कान खड़े कर दिये हैं। धार्मिक विश्वास की अन्तरात्मा जो मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखती है, को स्वीकार कर खुशी-खुशी मंजूरी देने के बजाय दोनों ओर के स्वयंभू धर्म रक्षक न केवल धार्मिक समागमता की भावना का सम्मान करने से इंकार करते हैं बल्कि दोनों के साम्प्रदायिक अवसरवादी गठजोड़ उसके खिलाफ आक्रामक रुख रवैय्या भी अपनाते हैं , और आज की विषाक्त साम्प्रदायिक स्थिति से हमें रू-ब-रू कराते हैं। इसके दंश के प्रभाव में विवेकहीनता का लक्षण सर्वप्रमुख है जिसके वशीभूत हृदयप्रत्यारोपण दक्ष चिकित्सक भी बच नहीं पाता और उसकी चिकित्सीय कर्तव्यनिष्ठा के उपहार स्वरूप उसके हिस्से में अपमान व कृतघ्नता आती है।
बड़े ही हास्य-व्यंग्यात्मक स्वर में यह शाॅर्ट फिल्म समाज के मूल में रोपित नाॅन निगोशिएबल मुद्दों यथा धर्म, जाति, रंग, नस्ल, लिंग और यहाँ तक कि खानपान की आदतों से संवाद करती चलती है।
लेकिन सारी राजनैतिक धार्मिक रस्साकशी के बावजूद बालक आशू और दिवंगत पण्डित जी की आत्मा के मध्य परस्पर स्नेहिल और मित्रवत बातचीत में हल्के-फुल्के हृदय की वही मधुर आवाज़ सुनायी पड़ती है जो पिता उस्मान ने आशू को अपने हृदय की स्वस्थता के प्रमाण स्वरूप सुनायी होती है। इस प्रकार संदेह और अविश्वास में लिप्त दूषित वातावरण से उबर पाने में भ्रमित आशू कामयाबी पाता है और दुनिया की भारी भरकम बातों के बीच हल्के-फुल्के दिल की स्वस्थ-मधुर धड़कन अंतत: सुस्पष्ट और सुश्रव्य साबित होती है। नफरत का ग़ुबार मुहब्बत के गुब्बारों के सामने तुच्छ साबित होता है। एक क़ल्ब (हृदय) दो जान से बंधुता सुरक्षित होती है और नेपथ्य में ख़ुशामदीद (सुस्वागतम) के गुंजायमान सोहर के बीच हल्के-फुल्के दिल वाले पिता-पुत्र व शेर खान साम्प्रदायिकता के अपहरण से मुक्ती पाकर समाज में बंधुता के प्रतीक बन घर लौटते हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि यह फिल्म धार्मिक समागमता का जादुई नरेटिव पैदा करती है। आज बहुत ही कम अवसर आते हैं जब कोई फिल्म मनोरंजन के साथ कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों से भी मुखातिब होती हो।
फ़ेक स्टोरी और फर्जी फाइल वाली राजनैतिक एजेण्डे को साधती किन्तु कलात्मकता, सौंदर्यबोध और मूल्यों को तरसती फिल्मों के दौर में लघु चलचित्र “पण्डित उस्मान” धधकती धरती पर बदलते मौसम का पूर्वानुमान है।
उस्मान के रूप में अभिनेता सदानन्द किरकिरे बेहद प्रभावित करते हैं। सभी कलाकार अच्छा परफार्मेंस पेश करते हैं और फिल्म की थीम को उभारने में कामयाब हैं। आशू के चरित्र में बाल कलाकार कबीर साजिद ने अविस्मरणीय छाप छोड़ी है। इस शाॅर्ट फिल्म को देखने और उससे बंधुत्व के मूल्यों/आदर्शों को गुनने की सिफारिश और मज़ीद आपके इस रीव्यू को सब्र से पढ़ने के बेइंतिहा शुक्रिया के साथ।

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