शैलेश सिंह:

सुशीला दीदी से बातचीत के दौरान उनके जीवन में हुई एक घटना की जानकारी मिली। सुशीला दीदी बताती हैं कि शादी के बाद उनको बच्चे के लिए परिवार और पति से बहुत कुछ सुनना पड़ा, काफी दवा-इलाज के बाद भी उन्हें संतान प्राप्ति नहीं हुईl घर वालों और पति के ताने सुन-सुन कर सुशीला बहुत ज्यादा हताश रहती थीl फिर उन्होंने अपने मायके में यह बात साझा की, उनकी बातें सुनने के बाद मायके वाले भी बहुत परेशान रहने लगे। उसी बीच उनके बड़े भाई ने बताया कि थोड़ी दूर एक गाँव में कोई बाबा हैं जो झाड़-फूँक करते हैं, जिससे महिलाओं को संतान प्राप्ति होती हैl पति और ससुराल वालों के तानों से परेशान सुशीला दीदी एक महिला थी खुद भी यह मानती थी कि मुझे घर वालों को एक बच्चा जरूर देना है, वरना घर में मेरा सम्मान नहीं होगा। 

यह जानकारी मिलते ही वे अपने भाई से बोली कि मुझे आप वहाँ पर ले चलोl वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि उनके जैसी बहुत सी महिलाएँ लाइन लगाकर बाबाजी से झाड़-फूँक की आशा में बैठी हुई हैंl जब सुशीला दीदी का नंबर आया तो बाबा बोला कि आप दूसरे दिन रात में 9:00 बजे आना और अकेले आनाl यह सुनकर वह अपने भाई के साथ घर वापस आ गई और मन ही मन सोचने लगी कि आखिर बाबा ने मुझे रात में अकेले क्यों बुलाया हैl काफी सोच-विचार के बाद फिर से उनके मन में घर वालों के ताने और अपने महिला होने के फर्ज की बात घूमने लगी और वह बाबा के पास जाने के लिए तैयार हो गईl दूसरे दिन वे शाम 7:00 बजे के आसपास बाबा की बैठक में शामिल हुईl उन्होंने वहाँ पर देखा कि दो से तीन और महिलाएँ थी जो वहाँ आई हुई थी, बाकी वहाँ पर और कोई नहीं थाl

सबसे पहले बाबा ने सुशीला को ही बुलाया और पूछा कि अकेले आई हो या किसी साथ में आई हो? उन्होंने बताया कि मैं अपने भाई के साथ आई हूँ, यह सुनकर बाबा ने उनसे उस जगह से 3 किलोमीटर दूरी पर स्थित खेत में चलने को कहा कि हमारे जो भी कुलदेवता हैं वहीं पर हैं, और पूजन वहीं पर किया जाएगा, इसके लिए आपको अकेले मेरे साथ चलना होगाl सुशीला बाबा के साथ चल दी, वहाँ पर पहुँचने पर बाबा ने सुशीला जी से बोला कि आपको अगर बच्चा चाहिए तो आपको यहाँ पर अपने पूरे कपड़े उतारने होंगे। यह सुनकर सुशीला जी को बहुत ठेस लगी और वह बहुत डर गई। वह सोच रही थी कि एक महिला आखिर करें भी तो क्या? घर वाले ताने मार रहे हैं, डॉक्टर की दवा से कोई फायदा नहीं हुआ और झाड़-फूँक वाले लोग ऐसी महिलाओं का फायदा उठा रहे हैं। जो हमारे बस में बिल्कुल नहीं है हम उसके लिए क्या ही कर सकते हैं? 

वह आगे बताती है कि वहाँ से वह बहुत शांत होकर और किसी तरह बाबा को चकमा देकर वहाँ से निकल आई। आते ही उन्होने अपने भाई को सब कुछ बताया, उनके भाई ने जब बाबा से बातचीत की तो बोला कि ऐसे कैसे मरीज को लेकर आए हो? हम ऐसी महिलाओं का झाड़-फूँक या इलाज नहीं करते हैं। उनके भाई ने भी बोला कि हमको नहीं ज़रूरत है ऐसे झाड़-फूँक या इलाज की, हमारी बहन बिना बच्चे के ही ठीक है। वह बताती है कि वहाँ जितनी भी अन्य महिलाएँ और उनके साथ आए बाकी लोग थे, मैंने उन्हें बताया कि इस तरह की बात बाबा आपसे भी करेंगे और वह हमारी मजबूरी का फायदा उठा रहे हैंl वहाँ बैठे लोग जब यह सुनकर भड़के तो उस गाँव के स्थानीय लोग उन लोगों को ही धमकाने लगे और बोले कि बाबा बहुत पहुँचे हुए हैं, उनके साथ अगर आप लोग कुछ भी गलत करते हैं तो हम आपको नहीं छोड़ेंगे। बाबा के पास गए लोगों की संख्या काफी कम थी, इसलिए वह चुपचाप वहाँ से वापस आ गए।

सुशीला बताती हैं कि इस घटना से उन्हें बहुत ज्यादा ठेस पहुँची, वह कहती है कि उस घटना के बाद उन्हें यह भी लगा कि महिला होना ही सबसे बड़ी गलती हैl वह कहती हैं, “मुझे सबसे ज्यादा यह बात परेशान करती है कि मेरे पति और घर वाले एक बच्चे के लिए अपनी ज़मीन-जायदाद सब कुछ बेचने को तैयार हैंl इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी वह लोग ताने मारने से नहीं चूकते हैं। इससे मैं मानसिक रूप से भी बहुत ज्यादा परेशान रहती हूँ। मेरे अंदर हमेशा एक डर बना रहता हैl”

वह बताती हैं कि मैंने अपने जीवन में सबसे ज्यादा महिलाओं को लेकर अन्य शब्द लोगों को बोलते देखा है। मेरे अलावा मेरे घर में और भी महिलाएँ हैं, उनको लेकर भी परिवार में बस यह बात चलती रहती है कि महिलाएँ सिर्फ काम ही कर सकती हैं। उनका काम है घर वालों को खाना बना कर खिलाना और बच्चे पैदा करना। इन दोनों बातों में अगर वह निपुण नहीं है, तो महिला किसी भी काम की नहीं है। यह बात मुझे बहुत ही ज्यादा अजीब लगती है और अंदर से बहुत ज्यादा परेशान करती हैl सुशीला जी से बात करने के दौरान हमने उनसे पूछा कि आप कैसे इन सब चीजों से निकल कर बाहर आई और क्या रणनीति अपनाई? इस बारे में आपके क्या सुझाव हैं? उन्होंने बताया कि परिवार में सबकी बातें सुनकर बहुत तकलीफ हुई, कभी-कभी बैठकर बहुत ज्यादा रो भी लेते थे। कभी-कभी लगता था कि जीवन को ही खत्म कर दें, लेकिन फिर अपने आस-पास की और महिलाओं को देखकर एक हिम्मत मिली। बाहर निकलने का मन बना कि सबके साथ बैठकर कुछ सीखते हैं, कुछ करते हैं और इन व्यर्थ की बातों को अनसुना कर देते हैंl इस सोच को मैंने अपने परिवार में प्यार से हर बात को रखने का एक जरिया बना लियाl

गोपनियता बनाए रकने के लिए पात्र का असल नाम बादल दिया गया है।

फीचर्ड फोटो प्रतीकात्मक है।

Author

  • शैलेश, उत्तर प्रदेश से हैंl वर्तमान में शैलेश सरजू फाउंडेशन के साथ जुड़कर उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले में काम कर रही हैंl वह महिलाओं, किशोरियों और बच्चों के साथ शिक्षा, आजीविका और संविधान से जुड़ी गतिविधियों के अंतर्गत कार्य करती हैंl शैलेश को कविता और कहानी लिखना अच्छा लगता हैl

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