लड़कियों को परिवारों द्वारा मज़बूत पितृसत्तात्मक मान्यताओं और प्रथाओं के साथ पाला जाता है। कंडीशनिंग ऐसी है कि अधिकांश लड़कियां अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने या अपने रोमांटिक रिश्ते को जारी रखने की इच्छा छोड़ देती हैं। बहुत कम ऐसी होती हैं जो उनके लिए आए प्रस्तावित रिश्तों के प्रति अपनी अनिच्छा व्यक्त करने का साहस करती हैं। इसी के चलते उन्हें बहुत भावनात्मक और शारीरिक दबाव का सामना करना पड़ता है।
रेशमा उन आशावादी लड़कियों में से एक है जिसने कभी नहीं सोचा था कि उसे अपनी आज़ादी के लिए, परिवार से राहत पाने के लिए अपने ही पिता को अदालत में ले जाना पड़ेगा। वह उन कई आशावादी लड़कियों में से एक थी जो अपने माता-पिता की उच्च आशाओं को संजोती आई थी। जब उसे एहसास हुआ कि उसके माता-पिता जाति और समाज के झूठे गौरव को बचाने के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं तो वह हैरान और आश्चर्यचकित हो गई।
उसके लिए आए एक विवाह प्रस्ताव का विरोध करने के बाद भी उसके परिवार द्वारा उसके विवाह कार्ड छपवाए गए थे। दिसंबर 2018 में शादी तय हुई थी। रेशमा, गुरुग्राम में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करती थी और पश्चिमी दिल्ली में अपने माता-पिता के साथ रह रही थी। रेशमा अपने दफ़्तर के एक सहकर्मी के साथ रिश्ते में थीं। फिर भी जबरन शादी के उसके विरोध को रेशमा के परिवार ने नजरअंदाज कर दिया। उसके लिए अपने परिवार के फैसले का विरोध करना बहुत मुश्किल था क्योंकि रेशमा के पिता दिल्ली पुलिस में हैं। इसी पारिवारिक तनाव के बीच, रेशमा को अपनी एक दोस्त के माध्यम से धनक के बारे में पता चला और उसने संभावित मदद के लिए धनक को लिखा।
रेशमा की स्थिति और तय शादी के विरोध को लेकर उसके दृढ़ संकल्प को समझने की भावना से, रेशमा को धनक के कार्यालय में आमने-सामने बैठ कर चर्चा करने का सुझाव दिया गया था। एक युवा और एक डरी सहमी सी लड़की उसी दोस्त के साथ धनक के ऑफिस आई जिसने उसे धनक से संपर्क करने का सुझाव दिया था। उसकी आंखों में डर साफ झलक रहा था। बातचीत के दौरान वह कांप रही थी जब उसने विरोध के कारण अपने पिता द्वारा की गई पिटाई से अपने शरीर पर आई चोटों की कुछ तस्वीरें दिखाईं। सौभाग्य से, वह अपनी नौकरी के बहाने उस दिन सफलता पूर्वक घर से निकल पाई थी और इस बैठक के लिए आई थी।
उसके पास 3 विकल्प थे; किराए के मकान में रहना, कामकाजी महिला छात्रावास में प्रवेश लेना या दिल्ली में महिलाओं के लिए बने आश्रय गृह में जाना। उसने विभिन्न स्थानों पर पेइंग गेस्ट आवास की तलाश करने की कोशिश की और दिल्ली में कामकाजी महिला छात्रावासों में दाखिला लेने की भी कोशिश की। उसी शहर में वैकल्पिक आवास और अपने माता-पिता से गैर-आपत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) की आवश्यकता सभी ने उसको बतायी। इसलिए, उसने अंततः नवंबर 2018 में दिल्ली में शक्ति शालिनी द्वारा चलाए जा रहे एक महिला आश्रय गृह में आश्रय लेने का फ़ैसला किया। उसे अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि जैसे-जैसे शादी का समय नज़दीक आ रहा था तो उसके माता-पिता के साथ-साथ उसके संभावित ससुराल वालों ने भी उसे शादी के बारे में परेशान करना शुरू कर दिया था।
अपना घर छोड़ने के बाद रेशमा ने दिल्ली हाई कोर्ट से सुरक्षा ली और एक हफ्ते तक महिला आश्रय गृह में रहीं। माननीय उच्च न्यायालय से सुरक्षा की मांग करना उसके लिए एकमात्र विकल्प था क्योंकि उसके पिता दिल्ली पुलिस में हैं और केवल अदालत के निर्देशों से उनकी पितृसत्तात्मक मनमानी पर अंकुश लग सकता था। हालाँकि, अपनी बिरादरी (पुलिस समुदाय) में रिश्तेदारी के चलते और अन्य पुलिस कर्मियों की मदद से, उसके पिताजी आसानी से पता लगा पाए कि सुरक्षा प्राप्त करने के बाद रेशमा कहाँ-कहाँ गई और रुकी है।
उसे आश्रय गृह में रहना मुश्किल लग रहा था क्योंकि वह अपनी नौकरी जारी रखना चाहती थी। इसलिए वह धनक के सुरक्षित गृह में चली गई और 2 महीने से अधिक समय तक वहीँ रही। उन्होंने इसी शेल्टर होम में अपने दोस्तों के साथ अपना जन्मदिन मनाया। अंत में, वह एक किराए के मकान में चली गईं और अपनी नौकरी जारी रखी। उसे नौकरी में प्रमोशन मिल गया। आख़िरकार, उसके परिवार ने वास्तविकता से समझौता किया और उसे एक साल बाद अपने मायके लौटने के लिए मनाने में कामयाब रहे।
रेशमा ने पिछले साल अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी कर ली है और वह अपनी नौकरी के सिलसिले में विदेश जाने की योजना बना रही है। उसके परिवार ने बिना किसी पूर्वाग्रह या पिछले अनुभव के उसके पार्टनर (साथी) को स्वीकार कर लिया। और तो और, उन्होंने अपनी बेटी की शादी आम शादी की तरह खूब धूमधाम से की।

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