जीतेन्द्र माझी द्वारा लिखित और राजू द्वारा संपादित:

भारत में प्राचीनकाल से ही असमानताएं रही हैं – लिंग, जाति और धर्म के आधार पर। मुख्य रूप से, लिंग के आधार पर असमानता के बाद जातिगत असमानताएं सबसे ज़्यादा देखने को मिलती हैं। इस कारण सबसे पिछड़ी जातियों पर सबसे ज़्यादा अत्याचार होते आये हैं और अभी भी जारी हैं। हाल ही की बात है, जब मध्य प्रदेश के सीधी में सार्वजानिक स्थान पर एक आदिवासी समुदाय के सदस्य पर तथाकथित सवर्ण जाति के व्यक्ति द्वारा पेशाब करने की घटना सामने आई थी। इसके बाद मध्य प्रदेश में ही एक दलित समुदाय के सदस्य पर सवर्ण जाति के लोगों ने उसके शरीर पर मानव मल लगाकर उसका अपमान किया। यह तो कुछ गिने चुने मामले हैं जो रिपोर्ट हो गए लेकिन ऐसे सैंकड़ों मामले होते हैं जो कभी दर्ज ही नहीं होते और उनका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।

इन्ही ऐतिहासिक अत्याचारों को मद्देनजर रखते हुए डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान में समानता के अधिकार से सम्बंधित प्रावधानों को शामिल किया और छुआछूत का कानूनी रूप से अंत किया। इसके साथ ही व्यवसाय की स्वतंत्रता के सम्बन्ध में कानूनी प्रावधान बनाया ताकि किसी भी व्यक्ति को जातिगत व्यवसाय करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सके। संविधान ने भारत के सभी व्यक्तियों को मानव गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार दिया। इसके साथ ही भारत के संविधान ने संसद को जातिगत रूप से पिछड़े समुदायों की सुरक्षा एवं उत्थान के लिए विशेष कानून बनाने की शक्तियां दी हैं। इन्ही शक्तियों का प्रयोग करते हुए संसद ने वर्ष 1989 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 बनाया।

अत्याचारों के निवारण के लिए विभिन्न सरकारों ने कई प्रयास किए और कई कानून लाए गये। हम अपने लेखों के माध्यम से इस कानून के बारे में जानकारी देंगे और कानून में सुधार की ज़रूरत से संबधित सुझाव देंगे। 

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989

यह अधिनियम दलित और आदिवासी समुदायों को विभिन्न प्रकार के जातिगत अत्याचारों, शोषण और सामाजिक बहिष्कार से बचाने और इन समुदायों को सशक्त बनाने का प्रयास करता है।इस अधिनियम के मुख्य उद्देश्य निम्न हैं:

  1. दलित और आदिवासी समुदायों के खिलाफ़ अत्याचार और भेदभाव को रोकना।
  2. जाति के आधार पर अत्याचारों से पीड़ितों को सुरक्षा और राहत प्रदान करना।
  3. इन समुदायों के खिलाफ़ किए गए अपराधों की त्वरित जांच और सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए विशेष अदालतों की स्थापना करना, इत्यादि।

यह कानून केवल उसी स्थिति में लागू होगा जब किसी दलित या आदिवासी के साथ किसी गैर-दलित/गैर-आदिवासी द्वारा अत्याचार किया जाता है तो अन्यथा नहीं। जैसे कि दलित और आदिवासी के समुदायों का आपस में एक दुसरे समुदाय के साथ अत्याचार करने की स्थिति में यह कानून लागू नहीं होगा।

इस अधिनियम के तहत अपराध:

इस अधिनियम की धारा 3 के तहत अपराधों का उल्लेख किया हुआ है जिसमें से कुछ अपराध निम्न है: 

i. जानबूझकर जातिगत अपमान और धमकी देना: कोई भी गैर-दलित या गैर-आदिवासी व्यक्ति किसी सार्वजनिक स्थान पर दलित या आदिवासी समुदाय के किसी सदस्य को जानबूझकर अपमानित करता है या अपमानित करने के इरादे से डराता है तो यह अपराध है।

ii. हमला और हिंसा: कोई भी गैर-दलित या गैर-आदिवासी व्यक्ति जो दलित या आदिवासी समुदाय के किसी सदस्य को उनके कानूनी अधिकारों का प्रयोग करने से रोकने या ऐसा करने के लिए उन्हें दंडित करने के इरादे से उन पर हमला करता है या बल प्रयोग करता है तो यह अपराध है।

iii. यौन हिंसा: किसी दलित या आदिवासी समुदाय की महिला के साथ बलात्कार, यौन उत्पीड़न, या किसी अन्य प्रकार की यौन हिंसा जैसे कृत्य करना अपराध है।

iv. भूमि और संपत्ति से संबंधित अत्याचार: किसी दलित या आदिवासी समुदाय के सदस्य को उसकी भूमि से अवैध बेदखल करना, उनको अपनी भूमि पर खेती करने से रोकना, या उनकी भूमि पर अवैध कब्ज़ा करना अपराध है।

v. झूठी कानूनी कार्यवाही: जो दलित या आदिवासी समुदाय के किसी सदस्य को उसकी स्वतंत्रता से वंचित करता है या उसके खिलाफ़ झूठी कानूनी कार्यवाही करता है तो वह अपराध है।

vi. सामाजिक या आर्थिक बहिष्कार करना: दलित या आदिवासी समुदाय के सदस्य का सामाजिक या आर्थिक बहिष्कार करना अपराध है।

vii.  बंधुआ मज़दूरी: दलित या आदिवासी समुदाय के किसी सदस्य को बंधुआ मज़दूरी करने के लिए मजबूर करना, ऋण बंधन, या इसी तरह के श्रम शोषण के लिए मजबूर करना दंडनीय अपराध है।

viii. सार्वजनिक स्थानों और सेवाओं का उपयोग करने से रोकना: दलित या आदिवासी समुदाय के किसी भी सदस्य को सार्वजनिक स्थानों जैसे दुकानों, अस्पतालों, स्कूलों आदि में प्रवेश करने या उपयोग करने से रोकना, या उन्हें सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंचने से वंचित करना एक अपराध है।

ix. जल संसाधनों के उपयोग करने से रोकना: सार्वजनिक जल संसाधनों जैसे कुएं, नदी, तालाबों एवं झीलों से पानी लेने से रोकना या इस पानी को दूषित कर देना ताकि दलित एवं आदिवासी लोग उसका उपयोग ना कर सके, ऐसा करना दण्डनीय अपराध है।

x. मैला उठाने का काम करवाना: दलित या आदिवासी समुदाय के किसी भी सदस्य को हाथ से मैला उठाने के लिए मजबूर करना या किसी सरकारी अफसर द्वारा ऐसा करने की अनुमति देना अपराध है।

xi. अपशिष्ट पदार्थों का सेवन करने के लिए मजबूर करना: दलित या आदिवासी समुदाय के किसी भी सदस्य को अपशिष्ट पदार्थ खाने या पीने के लिए मजबूर करना अपराध है।

xii. दलितों या आदिवासियों के घरों में कचरा डालना या मरे हुए जानवरों के शव को उनके घरों के आगे डाल देना अपराध है।

xiii. दलित या आदिवासी समुदाय के सदस्यों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करना, सिर या चेहरे के बालों को ज़बरदस्ती मुंडवाना, या जूते की माला पहनाना दंडनीय अपराध हैं।

xiv. शादी के समय घोड़ी पर बैठने से रोकना अपराध है: दलित या आदिवासी समुदाय के किसी भी सदस्य को शादी के समय पर घोड़ी पर बैठने से रोकना या तंग करना भी अपराध है। 

xv. मूंछ रखने पर मारपीट करना अपराध है: दलित या आदिवासी समुदाय के किसी भी सदस्य को मूंछ रखने की स्वतंत्रता है। यदि उसके साथ मूंछ रखने को लेकर बुरा व्यवहार, या मारपीट की जाती है तो वो अपराध है। 

अगर किसी दलित या आदिवासी समुदाय के सदस्य के साथ गैर-दलित और गैर-आदिवासी समुदाय के सदस्य द्वारा उपरोक्त में से कोई अपराध किया जाता है तो धारा 3 के तहत अपराध की प्रकृति के अनुसार अपराधी को छः महीने से लेकर मौत की सजा तक का प्रावधान हैं।

उपरोक्त में से कोई भी अपराध अगर किसी भी दलित या आदिवासी समुदाय के सदस्य के साथ किया जाता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही करके उसे सजा दिलवानी चाहिए।

लेख की इस सीरीज के माध्यम से हम आपको इस कानून के बारे में जानकारी देंगे। अगले भाग में  क्या कानूनी कार्यवाही की जा सकती है और कहाँ की जा सकती है? शिकायत करने की प्रक्रिया से लेकर जमानत से संबंधित प्रावधानों के बारे में चर्चा करेंगे।

फीचर्ड फोटो आभार: गीक्स फॉर गीक्स

Authors

  • जितेंद्र, ओडिशा के गजपति ज़िले से हैं। वर्तमान में वे नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, ओडिशा से कानून की पढ़ाई कर रहे हैं। वो आई.डी.आई.ए (IDIA- Increasing Diversity by Increasing Diversity) स्कॉलर हैं। साथ ही साथ गजपति युवा एसोसिएशन के सदस्य भी हैं। वो किताबें पढ़ना, लिखना, घूमना, गाना और खेलना पसंद करते हैं।

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  • राजू राम / Raju Ram

    राजू ,राजस्थान के जोधपुर ज़िले से हैं और व्हाई.पी.पी.एल.ई. (YPPLE) के तौर पर सामाजिक न्याय केंद्र के साथ जुड़े हैं। वर्तमान में राजू मध्य प्रदेश में जेनिथ सोसायटी फॉर सोशियो लीगल एम्पावरमेंट संगठन के साथ कार्य कर रहे हैं। वह बास्केटबॉल खेलना एवं किताबें पढ़ना पसंद करते हैं।

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One response to “अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989, भाग – 01”

  1. Shivani Singh Avatar
    Shivani Singh

    Very well written that too in a very comprehensive manner💯👍

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