नीतिशा खलखो:
लेख में व्यक्त किए विचार युवा साथी के स्वयं के हैं
किसी पत्रकार का फ़ोन आता है आदिवासी दिवस मनाने को लेकर।….. प्रश्न पूछा जाता है।
पत्रकार: “हर साल विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। जल, जंगल, जमीन के साथ ही साथ सभ्यता – संस्कृति और परंपरा को बचाए रखने का संदेश देते हुए कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। पर क्या आदिवासियों की स्थिति में सुधार हुआ है। विकास के पथ पर जनजातीय समाज आगे बढ़ रहा है।
- आदिवासी दिवस और आदिवासियों की स्थिति पर आपके विचार देवें.”
आदिवासी एक्टिविस्ट: “सबसे पहले जनजातीय शब्द का विरोध दर्ज करना चाहूंगी।” आदिवासी को आदिवासी बोलिये। यह ज़्यादा ज़रूरी है, क्योंकि इससे उनके यहाँ के प्राचीनतम निवासी होने का भाव बोध छिपा है। जिसे इतिहासकार से लेकर मानवशास्त्री, सत्ता और संविधान निर्माताओं तक ने पहचान को ढँका-तोपा है।
दूसरी बात विश्व आदिवासी दिवस 1993 से मनाया जा रहा है। UNO (संयुक्त राष्ट्र संघ) द्वारा इसे पिछले कई दशकों से पूरा विश्व मना रहा है। वजहें – संसार भर में, हर भौगोलिक क्षेत्र में वहाँ के प्राचीनतम निवासियों के साथ समय-समय पर हमले, अतिक्रमण और उनका संहार हुआ है। इन ऐतिहासिक युद्धों के खिलाफ विश्व के कुछ संवेदनशील सरकारों ने आदिवासियों के हित के लिए इस आदिवासी दिवस का आयोजन शुरू किया है। भारत सरकार, लंबे समय से UN में यही कहती आ रही है कि भारत में कोई ‘इंडिजेनस’ यानि आदिवासी नहीं है, और अगर है तो हर भारतीय ‘इंडिजेनस’ है।
यह कहकर आदिवासी एक प्रकार की ऐतिहासिक हिंसा को झेल रहा होता है जब यहाँ के मूल बाशिंदों को खारिज कर, हर किसी को आदिवासी बताने की मंशा देखी जा रही होती है।
अभी बिल्कुल मणिपुर जल रहा, कारण संसाधनों की लूट के लिए अलग-अलग सरकारी खाँचों में बंटे ओबीसी, एससी, आदि को एसटी बनाने की प्रक्रिया में शामिल करना।
भारत देश के कई अन्य कोणों में भी पूंजीवादी और ब्राह्मणवादी शक्तियां इस प्रकार के खेल खेलती रही हैं।
रिजर्वेशन की रोटी फेंक आपस में उलझाया जा रहा होता है।
जबकि मारे जाने वाले दोनों समूह एक खास एथनिक पहचान और रेस के साथ आते हैं। मणिपुर में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों की लूट में जो बाज़ार और पूँजीपत्तियों को दिक्कत आती है उससे निबटने का आयोजन है यह सत्ता प्रायोजित हिंसा।
जल, जंगल, ज़मीन, सभ्यता, संस्कृति, परम्परा आदि को बचाये जाने से पहले ‘जन’ और ‘उनके जान’ को बचाने की नैतिक जिम्मेवारी एक देश और उसके शासन की होती है। जिसमें यह पूँजी सँचालित, सत्ता प्रेमी नेतागण अक्षम दिखाई पड़ रहे हैं।
अब बात रही कि इन आयोजनों से कोई फायदा होता है या नहीं…..
तो हाँ, ऐसे आयोजन से फायदा यह होता है कि सत्ता की इन चालाकियों पर खुलकर संवाद हो पाता है। अपनी पहचान के साथ लोग आपस में प्रेम व बंधुत्व को पुनर्जीवित कर पाते हैं। सौहार्द्र बढ़ाने में इनकी महत्ती भूमिका है।
अमेरिका में जो यह बात कभी प्रचारित थी कि- “अमेरिका की खोज कोलंबस ने की”, वहीं आज अमेरिका के मूल आदिवासी रेड इंडियन्स कह पाते हैं कि – “कोलंबस तुमने हमें नहीं खोजा बल्कि हमने तुम्हें खोज लिया कि तुम हमारे खोजकर्ता नहीं थे बल्कि तुम हमारे पुरखों के संहारक थे। तुमने हमारे संसाधन व संस्कृति को लूट लिया था। अब और नहीं।”
यही बात अब भारत के आदिवासी भी जान गए हैं कि अपनी पहचान ही सब कुछ है। यही कारण है कि देश की आज़ादी के बाद 75वें साल में राष्ट्रपति का पद एक आदिवासी महिला के हिस्से आ सका है। इसके लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ा आदिवासियों को।
किन्तु आज भी इंतज़ार है कि भारत के प्रधानमंत्री के बतौर एक आदिवासी नेतृत्व कब भारत की जनता उन्हें शीर्ष नेतृत्व दे सकती है ?
तुष्टिकरण से काम नहीं चलेगा। बल्कि इन आयोजनों से सच को सच कहने का दम और उसकी स्वीकार्यता हर भारतीय में कब तक आ पाती है, यह देखना, जानना अभी बाकी है।। आदिवासियों के प्रति ईमानदारी से ही इस देश का भविष्य स्वर्णिम रचा जा सकेगा।”
पत्रकार: “जो मैंने सवाल किया था बस उतना छपेगा मेम, केवल 100 शब्दों में। बाकी बातें नहीं छप पाएंगी। भविष्य में उन विषयों पर, टॉपिक आता है तो आपके विचार जरूर प्रकाशित करेंगे।”
खानापूर्ति के लिए तैयार रहें, आप और हम आदिवासी।
पत्रकार का अखबार भी अपने काम को तुष्टिकरण के तहत पूरा कर गया, और एक्टिविस्ट की बातें कहीं अधूरी, बिखरी उनके व्हाट्सएप में कँटी छंटी पड़ी रह गईं।
फीचर्ड फोटो आभार: वेक्टर स्टॉक और विंग्स

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