पावनी लोधियाल:
कहीं धारों से, कहीं कुओं से,
कहीं नहरों से, तो कहीं लहरों से,
कहीं पानी, कहीं जल, तो कहीं नीर कहा गया,
हर धर्म में पानी को देवता माना गया।
खोया बहुत कुछ पानी है,
और दिया, लिया और लूटा भी पानी ने
कई दास्ताने सुनी पानी की,
कहानियों में सुना गया,
कविताओं में पढ़ा गया,
शायरों से तारीफ और,
पहाड़ से सुख-दुख पानी का दोनों बटोरा गया।
वह हर जगह है,
बारिश की बूंदों में भी, शहर के नालों में भी,
पहाड़ के नौलौं में भी, गंगा के पानी में भी,
जमुना के झाग में भी, प्रेमी की आँखों में भी,
आँखों से गिरकर ज़मीन के सोख लेने तक के सफर में भी,
पानी सब कुछ याद रखेगा।
वह उन सितारों से भी पहले से था,
जिन से पहले कुछ न था,
वह धरती से भी पहले था,
जिससे पहले हमारा अस्तित्व भी ना था,
ना तुम थे, ना मैं थी,
ना हम थे ना कोई और था,
वह उन सब किस्से, कहानियों, कविताओं,
प्यार, जन्म, मृत्यु और आँसुओं से भी पहले से था।
वो आपदाओं में है,
वह पीड़ित की प्यास में भी है,
बंजर ज़मीन में भी है,
भूखे के भीतर भी है,
इन सब में भी है,
लेकिन पानी एक है।
कमी से लेकर बर्बादी तक भी है,
वो उस कमी को भी याद रखेगा,
उस बर्बादी को भी याद रखेगा,
क्योंकि अंत में सब भूलकर,
पानी सब कुछ याद रखता है।

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