अमित:
जो भी जाड़िया भाई से मिला है वह उनके भरे पूरे शरीर, लंबी सफेद धोती और मुस्कुराते चेहरे को कभी नहीं भूलेगा। मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में सतपुड़ा की पहाड़ियों में बसे उमेदड़ा गाँव के रहने वाले श्री जाड़िया जमरे, अचानक 2 जुलाई 2023 को हम सब को छोड़ कर चले गए।
जाडिया भाई ने आधारशिला की स्थापना में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जब स्कूल बन रही थी तो कड़ी गर्मी में वो और कुस्मियाँ गाँव के खूमसिंह भाई, मांडवे के नीचे बैठकर काम की देखरेख करते थे। उन्होंने गाँव से लोगों की टोलियाँ लाकर श्रमदान में नींव भरने का काम करवाया था। आधारशिला की नींव रखने वालों में से एक थे वे। स्कूल बनने के बाद भी वे चयन समिति व आधारशिला की संरक्षक समिति के प्रमुख सदस्य रहे। हर मुसीबत के समय वे हमारा साथ देते थे और स्कूल के अध्यापकों व अन्य कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करते थे।
वे हम सब के लिए एक आदर्श थे जिन्होंने अपना जीवन समाज के लिए समर्पित कर दिया। हर मीटिंग व संघर्ष में तो वे उपस्थित रहते ही थे उन्होंने अपने निजी जीवन से भी समाज के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत किए। उन्होंने अपनी तीनों बेटियों के विवाह बिना दहेज़ लिए करे। उनका कहना था कि लड़कियों का दहेज़ लेना उन्हे बेचने जैसा है और यह नहीं होना चाहिए। अपनी बेटियों को पढ़ाने के लिए उनके मन में जितनी तीव्र इच्छा थी उतनी हमने पिछले 25 वर्षों में किसी पालक में नहीं देखी। सबके मना करने पर भी वे अपनी दोनो बेटियों को आधारशिला में छोड़ गए। केवल पढ़ाई ही नहीं, वे चाहते थे कि ये समाज के लिए कुछ करें।
जाड़िया भाई बड़वानी जिले के आदिवासी मुक्ति संगठन के वरिष्ठ कार्यकर्ता थे। संगठन के माध्यम से उन्होंने गत तीस वर्षों से समाज की विभिन्न समस्याओं को हल करने के लिए संघर्ष किया। बाद के समय में सामाजिक काम के साथ-साथ वे आध्यात्मिक जीवन की ओर आकर्षित हो गए और उसमें भी समय देते थे।
जाडिया भाई का अचानक हम सब के बीच से चले जाना समाज के लिए तो बहुत बड़ा नुकसान है ही, हमें भी व्यक्तिगत रूप से बहुत बड़ा धक्का लगा है। हमारा एक बहुत अच्छा मित्र और साथी बिछड़ गया। जाडिया भाई हमारी यादों में सदा बने रहेंगे और आदिवासी बच्चों की नई शिक्षा के लिए आधारशिला शिक्षण केंद्र को बनाने में उनके योगदान को हम कभी नहीं भुला पाएंगे।

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