अंकुश गुप्ता:
कूड़े की समस्या को समझते हुए मुझे इस बात का एहसास हुआ कि अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग पदार्थ कूड़े में जमा होते हैं। और कहीं-कहीं तो कूड़े में जमा पदार्थों की उपयोगिता के बारे में वहाँ के लोगों को एहसास तक नहीं होता। अगर एहसास होता तो यकीनन वे पदार्थ वहाँ न होते। जैसे जिन इलाकों में लोगों को गोबर की उपयोगिता के बारे में पता होता है वहाँ गोबर कूड़े के ढेरों में जमा नहीं होता। इसी तरह जिन जगहों में बालों का इस्तेमाल होता है, वहाँ बाल कूड़े में नहीं दिखते। तो मेरे लिए कूड़े पर शोध में एक मुख्य चुनौती यह रहती है कि जिन चीज़ों को लोग बेकार मानते हैं उनको उपयोगिता के बारे में कहाँ से और किससे जाना जाए। डॉक्ट्रेट स्तर की उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद और वह भी भारत और विश्व के सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में, यह समझा जाने लगता है कि आपके पास हर जानकारी का स्त्रोत होगा। लेकिन वास्तविक जीवन को छोटी-छोटी चीज़े ऐसे मिथकों को आसानी से तोड़ सकती हैं। खैर, यहाँ मैं मानव-मूत्र यानि पेशाब की उपयोगिता खोजने की मेरी कोशिशों के बारे में बताना चाहूँगा।
बचपन से हम यह तो सुनते आये थे कि पेशाब का कई बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होता है। यह भी सुना था कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई अपने इलाज के लिए अपना ही पेशाब पीते थे। बाद में यह भी पता चला कि इस चिकित्सा को हिंदी में स्वयंभू (खुद का) चिकित्सा कहा जाता है। और इसके पीछे कारण यह बताया जाता है कि जिन अपशिष्ट पदार्थों को हमारा शरीर रात में पेशाब द्वारा बाहर फेंकता है उनको फिर से अन्दर लेने से हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। परन्तु इस चिकित्सा के फायदे और नुकसानों के बारे में मेरी समझ अभी तक नहीं बन पाई है। इसलिए इसके बारे में और कुछ कहना नहीं चाहूँगा और ना ही किसी को अपनाने के लिए कहूँगा।
इन्टरनेट पर ढूँढ़ते हुए पिछले साल मुझे स्वीडन देश के स्टॉकहोम एनवायरनमेंट इंस्टिट्यूट की एक रिपोर्ट में विभिन्न अनाज व सब्ज़ियों की फसलों में पेशाब डालने के फायदे और दुनिए के अलग-अलग हिस्सों में इसके प्रयोगों के बारे में जानकारी मिली। यह रिपोर्ट देखकर मुझे काफ़ी आश्चर्य हुआ क्यूँकि आमतौर पर यूरोप तथा अमरीका से किसी नई चमकती-धमकती बिजली से चलने वाली तकनीकों की उम्मीद रहती है। इन देशों में पेशाब के उपयोग जैसे विषय पर इतना काम हो रहा होगा, यह मैंने सोचा भी नहीं था। पेशाब में भारी मात्रा में यूरिया होता है जिसके कारण यह अनेक पेड़-पौधों के लिए अमृत का काम करता है। इस रिपोर्ट में स्वीडन और कई अन्य देशों के उदहारण दिए गए थे जहाँ पेशाब को बड़ी मात्रा में इकट्ठा कर ट्रेक्टर आदि द्वारा खेतों में छिड़का जाता है। इसमें सबसे मज़ेदार था स्टॉकहोम के विशेषज्ञों द्वारा पश्चिमी अफ्रीका के नाईजर देश में चलाया गया एक कार्यक्रम। आजकल बाज़ारों में यूरिया खाद के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं और यह गरीब किसानों की पहुँच के बाहर पहुँच रही है। तो नाईजर देश के लोगों को बताया गया कि 8-9 व्यक्तियों के एक परिवार के द्वारा एक साल में फेंके गए पेशाब में करीब 200 किलो यूरिया फ़ेंक दी जाती है। यदि इस पेशाब को इसमें उपस्थित यूरिया के ही दाम पर बेचें तो यह आय का एक अच्छा साधन बन सकता है। इस सलाह को वहाँ के कई लोगों ने अपनाया और आमदनी का एक नया ज़रिया निकाला।
यह पढ़कर मुझे लगा कि भई वाह, यूरोप वाले तो दुनिया के सभी देशों से आगे निकल गए। पर मन में यह सवाल बना रहा कि क्या इतिहास में किसी और देश वालों के दिमाग में पेशाब के इस्तेमाल का ख़याल नहीं आया? इसके बाद कुछ दिनों में मुझे ऐसे कई लेख मिले जिनमें इतिहास में कई देशों में पेशाब के व्यवसाय के होने का पता चला। रोमन सभ्यता, जिसको सबसे पहला लिखित कानून बनाने का श्रेय जाता है, में पेशाब के उपयोग की व्यवस्था का सबसे पहला उदहारण मिला। वहाँ के राजा ने पेशाब कर यानि टैक्स लगाया था। इसके लिए नगर के बीच में सार्वजनिक मूत्रालय बनवाए गए थे। इनसे जुड़े थे पेशाब इकट्ठा करने के बड़े टैंक। आम नागरिकों को यह आदेश था कि वे अपना पेशाब उन टैंकों में ले जाकर डालें। इस पेशाब को कोई भी किसान ख़रीद सकता था और इस बिक्री से हुई आमदनी सरकारी खज़ाने में जाती थी। यह पेशाब केवल खेती के लिए ही नहीं बल्कि कपड़े धोने के लिए विशेषकर राजा और मंत्रियों के कपड़े धोने के लिए (विशेष रूप से राजा और मंत्रियों के सफ़ेद कपड़ों को धोने के लिए जिन्हें टोगा कहा जाता था), चमड़ा उत्पादन में, बारूद बनाने के लिए, बाल धोने आदि के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था। बाद में मुझे पता चला कि इन सभी उपयोगों में पेशाब से निकलने वाली अमोनिया गैस काम आती है। (आजकल भी इन सभी कार्यों में अमोनिया गैस का इस्तेमाल होता है, परन्तु यह अधिकतर अन्य रासायनिक तरीकों से बनाई जाती है।)
पेशाब का खरीदना-बेचना आगे चलकर चीन, जापान, और यूरोप के हॉलैंड देश में भी फैला। चीन में व्यापारी शहरों से पेशाब इकट्ठा कर गाँवों में ले जाकर बेचते थे। वहाँ गाँवों में किसान भी अपने घरों से बाहर शौचालय बनवाते थे और गली में आने-जाने वाले लोगों को अपने शौचालय में बहुमूल्य पेशाब और मल करने के लिए आमंत्रित करते थे। जापान में तो परिवार का मूत्र और मल भी संपत्ति के रूप में देखा जाता था। जब कोई किराएदार कमरा या मकान किराये पर लेता था तो किराया इस बात पर भी निर्भर करता था कि किराएदारों का मूत्र और मल उनकी संपत्ति होगा या मकान-मालिक की। यदि यह मकान-मालिक की संपत्ति होगा तो किराया कम हो जाता, क्यूँकि इसकी बिक्री से मकान-मालिक को अलग से आमदनी हो सकेगी।
इस सब से यह तो साबित हो गया था कि कई सभ्यताओं में पेशाब का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल व व्यापार भी होता था। परन्तु मेरे मन में कई सवाल रह गए थे। क्या पेशाब, इस्तेमाल करने वालों के लिए हानिकारक नहीं होता? आजकल इतनी बीमारियों के बारे में सुनते हैं, क्या पेशाब के इस्तेमाल से बीमारियाँ नहीं फैलती होंगी? इससे बदबू आती किस कारण से है?
मुझे लगा कि इन सवालों का जवाब रसायन शास्त्र की किताबों में मिल जाएगा। परन्तु अभी तक की पढ़ाई में ऐसी कोई किताब हाथ नहीं लगी, जिसमें इस पर चर्चा हो। मुझे कुछ निराशा सी हुई। परन्तु कुछ ही महीनों में इन प्रश्नों के उत्तर मुझे एक ऐसे विभाग से मिले जिसके बारे में मैंने कभी सोचा ही नहीं था। यह विभाग था जनपद अभियांत्रिकी यानी सिविल इंजीनियरिंग। मेरे लिए सिविल इंजीनियरिंग मकान, इमारतें, सड़क, पुल, आदि बनाने के विषय को ही कहा जाता था। कुछ परिस्थितिवश मैंने आई.आई.टी. रुड़की (जो पहले रुड़की विश्वविद्यालय था) के जनपद अभियांत्रिकी विभाग में काम करना शुरू किया था। यहाँ आकर मुझे एहसास हुआ कि इस विभाग में और भी कई विषयों पर काम होता है जिनमें पर्यावरण और कूड़ा प्रबंधन महत्वपूर्ण विषय हैं।
बातों-बातों में आई.आई.टी. कानपुर के एक पूर्व प्रोफेसर ने बताया कि किसी ज़माने में (लगभग 100 साल पहले) जब इंजीनियरिंग अपने शुरूआती दौर में थी, तब केवल दो तरह की इंजीनियरिंग हुआ करती थी – सेन्य यानि मिलिट्री इंजीनियरिंग और जनपद याह्नी सिविल इंजीनियरिंग। जिस कसी चीज़ का लेना-देना सेनाओं से होता था उसे तो सैन्य अभियांत्रिकी के कोर्स में पढ़ाया जाता था। बाकी सब विषयों को जनपद अभियांत्रिकी के कोर्स में पढ़ाया जाता था। इस चर्चा को जारी रखेंगे अगले अंक में।
यह लेख मूल रूप से चकमक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
फीचर्ड फोटो आभार – किल्ड विक.कॉम व प्लांट्स बैंक.कॉम

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