श्रेया कुमारी:

सामाजिक परिवर्तन शाला (अग्रेज़ी में स्कूल फॉर सोशल चेंज या एसएससी) के शिविर में आने के बाद मेरी ज़िंदगी मे बहुत सारे बदलाव आए है। यह पहला समय था, जब मैं अपने घर से और गाँव से इतना दूर कहीं ट्रेनिंग के लिए जा रही थी। जब मुझे यह पता चला कि मेरा नाम इस बार एसएससी के शिविर में डाल दिया है, तो मैं बहुत खुश हुई, क्योंकि ये पहली बार था कि मैं इतने दूर जाने वाली थी और कुछ नया सीखने को मिलने वाला था तो मेरे अंदर तो बहुत सारी उत्तेजना जाग रही थी। 

जब यह बात घर में बताई तो माँ ने साफ़ मना कर दिया कि मैं इतना दूर नही भेजूंगी अपनी बेटी को! वो और भी बहुत सारी बाते बोलने लगी कि शहर में ऐसा होता है, वैसा होता है, लड़कियों को उठा लेते है और बहुत कुछ तो फिर मेरा भी मन घबराने लगा। मैने माँ को समझाने की बहुत कोशिश की पर वो नहीं मानी, और बिल्कुल मना कर दिया कि मैं नही भेजूंगी, जिसको जाना है वो अपने मन की कर ले! फ़िर पिता जी ने कहा कि मैं तुझे ट्रेनिंग में भेज रहा हूँ और तू मेरी ज़िम्मेदारी पर जाएगी। फ़िर घर वाले आए बस में बैठाने, जैसे ही बस में बैठी तो माँ रोने लगी। पर जैसे तैसे हम आ गए दिल्ली और फिर हमें वहाँ और भी साथी मिले। दिल्ली से हम पहले झिरी गाँव (राजस्थान) के ट्रेनिंग सेंटर पहुँचे और फिर शिविर की शुरुआत हो गई। 

पहले दिन में सभी का एक दूसरे से परिचय हुआ। इस पहले शिविर में बहुत कुछ सीखने को मिला, मैने पहली बार जाना कि पृथ्वी का निर्माण भगवान द्वारा नहीं किया गया है, बल्कि पृथ्वी का निर्माण अंतरिक्ष में हुआ है। यह जानने से मेरी सोच में बहुत सारा बदला हुआ, मेरे अंदर बहुत से प्रश्न उठने लगे, और मैं जानने लगी कि पृथ्वी का निर्माण किस तरह से हुआ है। हमें शिविर में पृथ्वी के निर्माण से लेकर जीवों के उत्पत्ति तक सारी बातें बताई।झिरी में हुए शिविर से मैंने यह जाना कि किस तरह से आप दूसरों से बातचीत करने से मन में बहुत से प्रश्न उठते हैं, और उनके उत्तर भी आपको मिल जाते हैं। 

शिविर में मैंने अलग-अलग जगहों से आए लोगों की भाषाएँ उनका खान-पान उनका रहन-सहन व बहुत सारी अन्य जानकारी भी प्राप्त की और एक जगह से दूसरी जगह के बदलाव को भी देखा। शिविर से मैंने अपनी सोच में वैज्ञानिक दृष्टि की और होते परिवर्तन को पाया। किसी भी घटना को देखने के लिए एक वैज्ञानिक सोच को अपने अंदर देखा, कोई भी घटना हो रही है वह क्यों हो रही है, कैसे हो रही है, इसका कारण क्या है, इससे होने वाले नुकसान और फायदों के बारे में भी मैंने सोचना शुरू किया। मैंने अपने बड़ों से तरह-तरह के अंधविश्वासों के बारे में भी पूछना शुरू किया, भगवान के बारे में पूछना शुरू किया। अंधविश्वास के कारण हो रहे अत्याचारों के बारे में सोचना शुरू किया उनके बारे में जानना शुरू किया। 

पहले मैं थर्ड जेंडर के बारे बहुत अलग तरह की सोच रखती थी, पहले उनको बहुत ही गंदा मानती थी पर शिविर में पढ़ने के बाद, उनको अपनी तरह ही जानना और मानना शुरू किया। जलवायु परिवर्तन से हो रहे नुकसान की तरफ भी मेरा ध्यान गया और कम से कम कार्बन उत्सर्जन के बारे में भी सोचने लगी। पर्यावरण को बचाने के लिए अपनी तरफ से किए जाने वाले सहयोग के बारे में भी जाना। 

शिविर से मेरे भीतर एक बड़ा बदलाव यह आया कि किसी भी घटना के बारे में मैं तर्क से विचार करने लगी और वैज्ञानिक सोच का विकास हुआ। टीवी में आ रहे प्रोग्राम, न्यूज़ आदि को भी मैं वैज्ञानिक सोच के आधार पर देखने लगी। यह भी समझ आया कि किस तरह से टीवी प्रोग्राम, न्यूज़ आदि में पितृसत्ता को बढ़ावा दिया जा रहा है। शिविर में जाने से मेरे घर में भी बदलाव हुआ, दो-तीन बार बाहर शिविर के लिए आने के कारण माँ के मन का डर भी निकल गया, अब वह भी बिना कुछ कहे, बिना कुछ बोले हँसते हुए मुझे भेज देती है। 

इससे यह बात पता चलती है कि लड़कियों को बाहर भेजने से रोकने के लिए समाज ने इस तरह की बातें प्रचलित की जाती हैं। जिसे बस एक बार तोड़ने की जरूरत होती है। एक जानकारी यह भी पता चली कि समाज में हर रोज़ लड़कियों के साथ किसी ना किसी तरह का शोषण व शारीरिक हिंसा होती है। पर महिलाएँ व लड़कियाँ अपनी इज्जत खराब ना हो जाए या परिवार की इज्जत खराब ना हो जाए, इस कारण कुछ नहीं कहती हैं। वह उस हिंसा को सह लेती हैं। इन सब बातों को जानकर मुझमें यह बदलाव आया है कि अब मैं समझ चुकी हूँ कि लड़कियों को कभी भी अपने साथ हो रहे हिंसा के बारे में चुप नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका सामने से विरोध करना चाहिए। अगर वह चुप रहेंगी तो दोबारा भी उस पर यह हिंसा होगी, इसलिए अब कभी भी मेरे साथ कोई भी घटना हो, चाहे वह कितनी ही छोटी क्यूँ ना हो मैं उसका विरोध करती हूं। ट्रेनिंग में हमें यह बताया गया कि हम किस तरह से अपनी बात को लोगों तक कविता से, गानों से, नारों से या पोस्टर बनाकर पहुँचा सकते हैं, लोगों को अपने साथ जोड़ सकते हैं। भविष्य में, मैं भी इनका प्रयोग करूंगी। ट्रेनिंग के लिए आने-जाने से मेरा शहर मैं अकेले जाने का डर खत्म हो गया है। अकेले आपको किस तरह अपने घर के सदस्यों के अलावा दूसरे लोगों से किस तरह रिश्ता बनाना है मैंने यह भी समझा है, यह भी मेरे अंदर आया एक बहुत बड़ा बदलाव है। 

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  • श्रेया, हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वर्तमान में श्रेया अपनी ग्रेजुएशन कर रही हैं और पिछले एक साल से क्षेत्रीय संगठन से जुड़कर काम भी कर रही हैं।

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