आरज़ू:
सामाजिक परिवर्तन शाला (स्कूल फॉर सोशल चेंज या एसएससी) के शिविरों के दौरान मुझे अपने अंदर बहुत से बदलाव देखने को मिले और साथ ही काफी कुछ सीखने को भी मिला है। एसएससी के दौरान अलग-अलग राज्यों में जाने का भी अवसर मिला और साथ ही उन राज्यों के बारे में काफी कुछ जाना-समझा।
एसएससी का पहला शिविर राजस्थान के झीर गाँव में हुआ था, वैसे तो मैं हमेशा अपने परिवार के साथ ही यात्रा करती रही हूँ, लेकिन यहाँ मैं परिवार के साथ नहीं गई थी। पहली बार मुझे अपने शहर के बाहर अकेले कहीं जाने का मौका मिला और मैं एक आज़ाद पंछी की तरह महसूस कर रही थी। राजस्थान जाने के लिए पहले फैजाबाद से हमने दिल्ली तक के लिए बस ली और फिर दिल्ली से कोटा तक के लिए ट्रेन ली। सफर में भी हमें काफी ऐसे साथी मिले, जिनसे हम पहली बार मिल रहे थे और हम उन्हें जानते भी नहीं थे। उनसे हमारी ज़्यादा बातचीत नहीं थी। मेरे साथ गए साथियों बबली और शुभम से ही मेरी ज़्यादा बातचीत हो रही थी।
झिरी गाँव के मंथन स्कूल में हमारे ठहरने का इंतज़ाम था, और शिविर भी वहीं आयोजित हुआ। वहाँ पर आए अलग-अलग राज्यों के लोगों से हम मिले और उनसे उनके बारे में जानने की कोशिश की, लेकिन भाषा अलग होने के कारण मैं उनसे कुछ ज़्यादा जानकारी मिल नहीं पा रही थी और इस वजह से हमारी बातचीत भी कम हो रही थी। अगले दो दिन हमें कुछ अच्छा नहीं लग रहा था, लेकिन जब हम लोगों को ग्रुप में बाँटा गया तब हमारी अन्य प्रतिभागियों से बातचीत बढ़ने लगी। फिर भी हम ज़्यादा अच्छे से बात नहीं कर पा रहे थे; अखबार, पोस्टर, रिपोर्ट, व्यवस्था आदि जैसे काम ग्रुप में मिलते थे, जिन्हें करने में हमें कठिनाई भी हो रही थी। हम ग्रुप में अपनी बात रखने को लेकर भी असुरक्षित महसूस कर रहे थे।
एसएससी के दौरान अगर नई जानकारी की बात करें तो हमने बहुत कुछ जाना है, जैसे पृथ्वी की उत्पत्ति, जीवन की उत्पत्ति, अंग्रेज़ों के समय ग़ुलामी कैसी थी, आज़ादी के बाद भी कुछ ऐसे राज्य थे जो अधिक समय तक गुलाम बने रहे। धर्म-जाति कब से शुरू हुई हमें इसकी जानकारी मिली, जल-जंगल-ज़मीन से जुड़े मुद्दों पर गहराई से जानने का मौका मिला और हमने यह भी जाना कि महिलाओं के साथ उनके कामों के आधार पर किस तरह से उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। पोस्टर बनाना, रिपोर्टिंग करना, अखबार बनाना, ज्ञापन देना और भाषण देने का तरीका भी यहाँ पर हमने सीखा। दिन भर में जो हमने जाना-सीखा, उसे हम एक्टिंग के ज़रिए कैसे अन्य लोगों तक पहुंचा सकते हैं, यह भी हमने सीखा। इंटरनेट पर जानकारी खोजने के तरीके और लेख लिखने के बारे में भी हमने सीखा।
पहले मुझे ट्रेन की जानकारी बिल्कुल भी नहीं थी, क्योंकि मैं अकेले कभी कहीं गई नहीं थी। कहीं भी जाती तो परिवार के साथ जाती थी, इसलिए ट्रेन की ज़्यादा जानकारी लेने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी, लेकिन एसएससी के शिविरों के लिए अलग-अलग राज्यों में जाना होता था, इसलिए ट्रेन के बारे में इंटरनेट से जानकारी कैसे खोजी जाती है, यह भी शिविर के दौरान ही सीखा।
बदलाव
मैं पहले बात करने में हिचकिचाहट महसूस करती थी और किसी से अपनी बात नहीं कह पाती थी। लेकिन दूसरा शिविर ख़त्म होते-होते मैंने अपने अंदर कई बदलाव महसूस किए और अब मैं सभी से अच्छे से बात कर पाई हूँ। मेरे मन में बहुत से सवाल होते थे, लेकिन मैं उन्हें पूछने का साहस नहीं कर पाती थे, अब स्थिति यह है कि मुझमें सवाल पूछने का साहस आ गया है। पहले, जो पढ़ाया गया है, मैं उसी को सही मानकर उस पर सोचती नहीं थी, लेकिन अब जब नए शब्द सुनने को मिलते हैं तो इंटरनेट पर उसे सर्च करके मैं उस पर चर्चा करने की कोशिश करती हूँ, इस तरह मेरे अंदर एक बहुत बड़ा बदलाव आया है।
एसएससी शिविर की जर्नी मेरे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण रही, क्योंकि इस साल में मैंने बहुत कुछ सीखा और अलग-अलग राज्यों के लोगों से दोस्ती करने का अवसर मिला। उनकी बोली-भाषा, रहन-सहन, खान-पान और संस्कृति के बारे में गहराई से जान पाई। पहले मैंने आदिवासी शब्द सुना ज़रूर था, और मुझे लगता था कि वह लोग सिर्फ जंगल में रहते हैं। लेकिन इन शिविरों के दौरान मुझे देश के विभिन्न आदिवासी समुदायों के लोगों से मिलने का भी अवसर मिला और यह भी समझ आया कि वह लोग भी शिक्षित होते हैं और आदिवासी समाज के लोग इतने बड़े संगठन भी चला रहे हैं। एसएससी के पाँचवे शिविर में पहले मैं नहीं जा पा रही थी, क्योंकि बीच में ईद का त्यौहार पड़ रहा था। लेकिन फिर मैंने अपने परिवार को कनविन्स करके उत्तराखंड हुए पांचवे शिविर में हिस्सा लिया और इस बार की ईद भी वहीं शिविर के साथियों के साथ ही मनाई।

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