सिम्मी व आफ़ाक़:
वैसे तो पहाड़ों के साथ अपना रिश्ता कोई नया नहीं हैं। हिमाचल से उत्तराखंड और नेपाल के पहाड़ों में कुछ-कुछ दिनों के लिए कई अलग-अलग दोस्तों के साथ रहने का मौका मिला। इसलिए पहाड़ी जीवन और पहाड़ी लोगों से एक अपनेपन जैसा रिश्ता महसूस करता हूँ। जो भी मेरे पहाड़ी दोस्त बने वह भी मैदानी दोस्तों से ज़्यादा सहज और सरल स्वभाव के हैं। पहाड़ों में जाते हुए लगभग 20 साल हो गया है। कहीं भी कोई तकलीफ़ या परेशानी नहीं हुई है।

इस बार, पहली बार शिमला के संजौली कस्बे में जाना हुआ। कई दिन ठहर कर मेरा पहाड़ों में रहने का यह पहला अवसर था। संजौली कस्बा शिमला से लगभग 7-8 किमी ऊपर है। यह जगह शिमला में ही आती है। इस पूरी घाटी में छोटे-छोटे डाम्पूनुमा घर बने हुए हैं। यहाँ पर्यटकों के लिए बहुत होटल नहीं हैं, पर हाँ होम स्टे के लिए काफी जगहें हैं। इससे यहाँ के लोग बहुत सहज हैं, उनको पता है कि काफी संख्या में लोग यहाँ आते हैं। अपने परिवार, दोस्तों के साथ रहते हैं। दुकानदार जो आपको ज़रूरत के समान देता है, वह यदि बच जाता है, तो बिना किसी दिक्कत के वह वापस लेकर पैसे दे देता है।
हमारा एक दिन बिरयानी बनाना हुआ, पर हमारे पास बिरयानी बनाने लायक कोई बर्तन नहीं था। हमने अपनी छत से देखा कि नीचे कुछ बच्चे खेल रहे हैं, चलो इनसे बर्तन के लिए बात किया जाए। हमने बच्चों से बातचीत ही करते हुए कहा कि हमको बिरयानी बनानी है और हमारे पास उसको पकाने के लिए बर्तन नहीं हैं। इस बात को सुनते ही एक बच्चे ने फौरन कहा कि आप हमारे घर चलिए और उसने घर पहुँच कर अपनी माँ से हमारा परिचय और हमारी ज़रूरत दोनों को बताया। पहले बच्चे के घर वालों ने हमको चाय और बिस्किट खिलाया और पतीले के साथ ढक्कन और एक बड़ी कल्छुल भी दिया। इस एक घटना से आप यहाँ के लोगों के बारे में अंदाज़ा लगा सकते हैं। इसलिए आप अपने परिवार, दोस्तों के साथ जाइए। कोई घर ले लीजिए और बनाइये, खाइए और कुछ दिन यहीं के होकर रह जाइए।
संजौली कस्बे से माल रोड तक लगभग 4 किमी की शानदार पैदल वॉक का रास्ता है, जहाँ घूमते-टहलते आइस्क्रीम-कुल्फी खाते हुए पहुँच जाइए। अभी इस प्रकृतिक रास्ते को सुंदर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। पूरा रास्ता एक हटनुमा गली की तरह से बनाया जा रहा है। शिमला का माल रोड, नैनीताल और मसूरी के माल रोड जैसा नहीं हैं। यहाँ कोई हाट-बाज़ार नहीं है। एक बड़ा सा पहाड़ों के ऊपर मैदान है, जिसमें गाँधी जी, इंदिरा जी और अटल जी की प्रतिमा है। एक लाइब्रेरी और एक गिरजाघर है। यहाँ हज़ारों पर्यटक रोज़ आते हैं। जहाँ पर मैंने देखा हर तरफ लोग सिर्फ नज़रों से देखने की बजाए, फोटो लेने में अधिक रुचि लेते दिखे।

यहाँ से पैदल नीचे उतरते ही लकड़मंडी है, जिसको देखने से पता चलता हैं कि यह एक बहुत पुराना बाज़ार है, जहाँ लकड़ी के सामानों के साथ अन्य सामान भी मिलते हैं। यह स्थानीय बाज़ार है, जहाँ उचित दाम में सामान मिल जाते हैं। इससे थोड़ा और नीचे उतरने पर बहुत बड़ी फल मंडी (पहाड़ों के हिसाब से) है, जहाँ पहाड़ी फलों के साथ मैदानी फल भी मिलते हैं। हाँ यह थोड़ा हमको, आपने यहाँ के दाम से ज़्यादा मालूम होता है। यहीं से थोड़ा नीचे कुरैसी मीट शॉप है, जहाँ मुर्गे और बकरे का गोश्त मिलता है। यहाँ गोश्त को बनने में काफी वक्त लगता है, इसलिए गोश्त बनाकर खाने के लिए पर्याप्त समय का होना बहुत ज़रूरी है। हमने तो जल्दबाजी में कच्चा-पक्का गोश्त ही खाया।

लगभग 6-7 किमी नीचे उतरने के बाद, फिर से ऊपर चढ़ने की कोशिश करने में बहुत परेशानी होती है। इसलिए थोड़ा और नीचे उतर जाइए, जहाँ से आपको पुनः संजौली कस्बे के लिए बस मिल जाएगी। अन्य जगह के पहाड़ों की तुलना में शिमला में यात्रा के बेहतर संसाधन हैं। नियमित सरकारी और गैर सरकारी बस मिलती है जो सस्ते में पहाड़ों के घुमावदार रास्तों की आपको सुरक्षित सैर करा सकती है। चूँकि ज्यादा वक्त मैं संजौली कस्बे में रहा तो इस जगह का काफी अवलोकन किया। यहाँ अधिकांश लोग सहारनपुर, रुड़की से आकर फल, सब्जी और अन्य दुकानों पर काम करते हैं। पूरी तरह से पहाड़ों की घाटी में बसी होने के कारण यहाँ मज़दूरों के लिए विभिन्न सामानों को ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर लाने का काम मिलता है। यह काम अधिकतर नेपाल और कारगिल के मजदूर करते हैं। यह बहुत मेहनत का काम है, क्योंकि जहाँ व्यक्ति को खुद ही ऊपर-नीचे चलने में समस्या होती है, वहीं यह मज़दूर 50 किलो से लेकर एक कुंटल तक का सामान लेकर चलते हैं। इस तरह से यहाँ आस-पास के, नेपाल और कारगिल के हज़ारों लोग काम करते हैं। इनको यहाँ ठीक-ठाक काम नियमित मिलता है। यहाँ बारिश भी काफी होती है, तो बारिश में मज़दूरों को काम नहीं मिलता है। यहाँ की महिलाएँ छाता लेकर चलती हैं, जो धूप और बारिश दोनों से बचाता है।
एक चीज मैंने और देखी कि यहाँ आप किसी भी दुकान से कुछ सामान खरीदिए। वह आपको कागज के लिफ़ाफ़े में ही सामान देते हैं। यहाँ गोश्त को भी कागज के लिफ़ाफ़े में दिया जाता है। इसलिए यहाँ के लोग झोला लेकर चलने के आदि हो गए हैं। लगभग हर दुकान के सामने डस्टबिन आम तौर पर मिलती है। बेतरतीब कोई गाड़ी खड़ी नहीं करता है। पुलिस वाले बस और गाड़ियों के ड्राइवर के साथ प्रेम भाव के साथ बात करते हुए दिखाई देते हैं। बच्चों के स्कूल जाते समय और छुट्टी के समय सड़क पर बड़े वाहनों के आवागमन पर रोक लगा दिया जाता है, जिससे बच्चों को परेशानी ना हो। यहाँ के बाज़ार और दुकाने थोड़ा जल्दी बंद हो जाते हैं। इसलिए कि यहाँ जो लोग काम करते हैं, वह आस-पास के गाँवों से आते हैं, मज़दूर भी संजौली कस्बे में नहीं रहते हैं। उनके लिए यह जगह काफी महँगी है, इसलिए पास के गाँव में जाकर रहते हैं। ये सुबह जल्दी ही संजौली कस्बे में आते हैं, जिससे इनको काफी काम सुबह-सवेरे ही मिलने लगता है।

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