अवध पीपल्स फोरम, उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद (अब अयोध्या) में स्थानीय युवाओं के साथ शिक्षा, वैज्ञानिक चेतना, रोज़गार और स्वास्थ्य जैसे कई मुद्दों आर काम कर रहा एक संगठन है। ‘मशीनीकरण और बेरोज़गारी’ के विषय पर आयोजित चर्चा के दौरान युवाओं ने इस पर आपने विचार व्यक्त किए। उन्हें इस पोस्ट में संकलित किया गया है।

इरशाद अहमद: 

दूध बेचने और गाय-भैंस पालने का कारोबार

बचपन में मैंने अपने घर में भी गाय-भैंस देखी हैं, हमारी पहले 3 भैंस और 2 गाय थी। रोज़ सुबह जहाँ भैंस-गाय रहती थी, उस जगह की सफाई होती थी। इसे हमारी दादी और बुआ मिल कर किया करते थे। पशुओं को चारा देने का काम हमारे चाचा करते थे और दूध निकालने का काम भी वही करते थे। दूध लेने के लिए ग्राहक घर पर ही आते थे, उन्हें दूध देने का काम दादी का था। कुछ ग्राहक ऐसे भी थे जिसके घर पर ही दूध पहुँचना पड़ता था, मेरे बड़े भाई ये काम किया करते थे। गाय के गोबर की कंडी (उपले) बनाने का काम बुआ करती थी और उसे बेचती भी थी। लोगों के घरों में पहले चूल्हा जलाने के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता था। गोबर जब खाद बन जाता था तो उसका खेतों में भी इस्तेमाल किया जाता था। गाँव के लोग उसे खरीदकर भी ले जाते थे। 

दूध निकालने के बाद गाय-भैंस को चराने के लिए ले जाया जाता था, गाँव के अन्य लोग भी अपने पशु चराने के लिए आते थे और बैठकर बातें किया करते थे। एक-दूसरे के दु:ख-सुख भी समझते थे, जिससे लोगों के आपसी संबंध मजबूत होते थे। जो लोग दूध खरीदने आते थे, उनसे भी हमारे रिश्ते बहुत अच्छे होते थे, जिनसे कई सालों तक रिश्ता चलता था। घर की महिलाएं भी जब बाहर गोबर फेंकने के लिए जाती थी, तो वहाँ महिलाएं इकट्ठा होकर काम करती थी और आपस में बातें भी करती थी। 

आज के समय में ऐसे व्यवसायों का मशीनीकरण होता जा रहा है, डेरी उत्पादन के कई काम अब मशीनों द्वारा होने लगे हैं। शहरीकरण बढ़ने से गाँव, गाँव के लोग और दूध बेचने और पशुपालन जैसे कई व्यवसाय गायब होते जा रहे हैं। अब बड़े-बड़े डेरी फॉर्म बन गए हैं, जहाँ एक साथ 40-50 गाय-भैंस एक ही जगह पर पाले जाते हैं। उनका खयाल रखने के लिए कुछ मज़दूर रखे जाते हैं। दूध निकालना, चारा काटना जैसे कई काम मशीनों से होते हैं, और उनके उत्पाद भी सीधे लोगों के पास नहीं बल्कि दुकानों और बड़ी-बड़ी डेरियों में जाते हैं। आपसी लेन-देन से लोगों के बीच जो पहले संबंध बनते थे, अब वह भी नहीं बन पाते। पहले अपने ही खेतों से निकली प्राकृतिक चीजें जैसे घास, गेहूँ के भूसा आदि पशुओं को खिलाया जाता था या उनको बाहर ले जाकर चलाते थे, लेकिन अब बाज़ार में जो पशु आहार मिलता है, फार्म में पशुओं को वही खिलाया जाता है। अब वह सब चीजें जो पहले होती थी, नहीं हो रही हैं। पहले के कारोबार में और अब के कारोबार में काफी फर्क आ गया है। रोज़गार तो घटे ही हैं, लोग भी एक-दूसरे से दूर हुए हैं।  

लकड़ी का कारोबार

लकड़ी का काम पहले बहुत मुश्किल से होता था। जैसे एक दरवाजा बनाने में लकड़ी काटना, उस पर रंदा मारना, और उसे रंगना आदि यह सब हाथों से किया जाता था। फर्नीचर बनाने या लकड़ी के किसी भी और काम में 10 से 15 दिन का समय लग जाता था। इसी एक काम के लिए लगभग 6-7 आदमी भी लगते थे। तब जाकर कहीं वह काम पूरा होता था। इस तरह के लकड़ी के बहुत से काम में बहुत मजदूरों की ज़रूरत पड़ती थी, और अच्छी फिनिशिंग भी नहीं आ पाती थी। 

लेकिन अब, इन कामों को करने में बहुत फर्क आ गया है। अब मशीनों से बड़े-बड़े काम भी जल्दी हो जाते हैं हो जाते हैं और उसमें ज्यादा आदमियों की ज़रूरत भी नहीं पड़ती है। इसी तरह एक पलंग बनाने में पहले 10 से 15 दिन लगते थे। लेकिन अब बहुत कुछ बदल गया है, हर काम मशीन से होता है और मशीन से काम करने के लिए एक या दो आदमी की ही ज़रूरत पड़ती है, चाहे बड़ा काम हो या फिर छोटा। साथ ही अब काम में फिनिशिंग भी बहुत अच्छी आती है। काम जल्दी हो जाता है, लोग भी कम लगते हैं तो काम का दाम भी कम होता है। सस्ते दामों के लिए लोग भी सब काम मशीनों से ही करवाते हैं, लेकिन पहले जो 6-7 आदमी को काम मिलता था, वो तो अब बंद हो गया ना!

Author

  • इरशाद अहमद इंटीरियर डेकोरेशान का काम करते हैं और अवध पीपल्स फोरम के साथ जुड़े हुए हैं। उन्होने 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की है। वह अपने जैसे कामगारों को संगठित करने का प्रयास कर रहे हैं। इन्होंने अभी कुछ युवा कामगारों के साथ संबंध निर्माण की प्रक्रिया भी शुरू की है। इरशाद अपना काम करते हुए सामाजिक बदलाव की दिशा में कामगारों के साथ काम करने को लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं।

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