मनिषा शहारे:

महाराष्ट्र में अलग-अलग तरीके से होली और धुलीवंदन का त्यौहार मनाया जाता है। होली के दिन होली को जलाया जाता है, और धुलीवंदन को रंग खेला जाता है। गोंदिया ज़िले में स्थित हमारे क्षेत्र में बच्चे परस के पेड़ के फुल तोड़कर लाते हैं। फूलों से रंग तैयार करने के लिए, फूलों को एक दिन पहले घर में लाकर मिट्टी के मटके में भिगाया जाता है। हमारे यहाँ पहले हर मोहल्ले में होली जलाई जाती थी। हर मोहल्ले में, हर घर से लकड़ी जमा करके होली जलाई जाती थी। होली जलाने के बाद लड़के, बुजुर्ग, पुरुष होली के पास बैठकर रातभर जागते थे। होली जलाते वक्त अपने घर से जो भी घर में पकवान बनाया जाता है, वो थाली में लेकर आते है और सबको साथ में मिलाकर होली को दिया जाता है। बचा हुआ पकवान साथ मिलकर वहीं खाते है। 

हमारे क्षेत्र में उड़द दाल के वड़े और चने के दाल की पूरणपोली खास तौर पर बनाते हैं, क्यूंकि  होली के समय खेत में उड़द, चना निकलने लग जाता है। हमारे यहाँ हर घर में होली के दिन वड़ा और पूरणपोली बनाई जाती है। बीते वर्षों के मुकाबले अब होली जलना कम हो गया है। इसका एक कारण है जंगलों की कटाई भी है, साथ ही फारेस्ट अधिकारी लकड़ी लाने नहीं देते। जलाने की लकड़ी भी कम मिलती है तो गाँव के एक या दो मोहल्ले में ही अब होली जलाई जाती है। होली जलाते वक्त खेत का सूखा हुआ घास और हर लकड़ी जमा करके लायी जाती है। होली की पूजा गाँव का पुजारी करता है, और होलिका के तरह जिसके मन में घंमड है, वो जल जाये ऐसे बोला जाता है। 

होली के दूसरे दिन धुलीवंदन का त्यौहार मनाया जाता है और इस दिन रंग भी खेला जाता है। इस दिन गाँव में चिकन, मटन बनाया जाता है और पीने वाले पीते हैं। हमारे क्षेत्र में खासकर, छोटे-बड़े सब बच्चे रंग खेलते हैं। खासकर महिला-पुरुष, लड़के-लड़कियां एक साथ होली नहीं खेलते। अभी कुछ लड़कियां भी रंग खेलती हैं, पर हमारे यहाँ महिलाएँ रंग नहीं खेलती हैं। महिलाएँ दिनभर घर के कामों में ही व्यस्त रहती है। अगर वो रंग खेलना भी चाहे तो ननद, जेठानी, पति या भाभी के साथ ही खेल सकती हैं और वो भी घर के अंदर। बुज़ुर्ग लोग बोलते हैं कि होली इज्ज़तदार लोगों की नहीं बुरे लोगों की है। ऐसे माना जाता है कि कोई रंग भी लगाता है तो बुरी नज़र से देख कर लगाता है। अतः हमारे यहाँ महिलाएँ अगर रंग खेलती हैं तो घर के लोगों से उन्हें गाली सुननी पड़ती है। 

हमारे क्षेत्र में, होली के समय चना खेत में तैयार रहता है। तो दस-बारह लड़के झुंड बनाकर दूसरे के खेत का चना चुराने जाते है। इसलिए घर के बुज़ुर्ग या घर के अन्य पुरुष रात 12 बजे तक खेत में चने की रखवाली करने जाते हैं। फिर भी ये लड़के खेत में जाकर, रखवाली करने वाले के साथ एक-दो लड़के बात करके उसका ध्यान भटकाते हैं और बाकी चना चुरा लेते है, जिसे फिर वे चने के भूंज को बांटते हैं। होली खेलते वक्त ढपली लेकर हर घर जाकर डान्स करते हैं और चावल और पैसा मांगते हैं। दूसरे दिन जंगल में जाकर सब लोग मिलकर खाना बनाके साथ में खाते हैं।

आदिवासी समाज के लोग पहले सेमरक का पेड़ लाकर होली में रखकर पूजा करते थे। पर अभी इनका कहना की, पाहदी पारी कुवार लिंगो (एक आदिवासी पूर्वज) ने सेमरक पेड़ के नीचे कुछ लड़कों को प्रशिक्षित किया था, तो अभी इस पेड़ को जलाते नहीं, ऐसा बताते हैं।

फीचर्ड फोटो प्रतीकात्मक है।

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  • मनीषा, महाराष्ट्र के गोंदिया ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वह कष्टकारी जन आन्दोलन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम कर रही हैं।

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