शंभू लाल भील: 

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले के गाँव सजनपुरा की भील बस्ती में 38 वर्षीय आदिवासी भील जनजाति की महिला पारसी बाई भील को सोते समय एक जहरीले जीव ने काट लिया था। उसका परिवार उसे अस्पताल ले जाने के बजाय झाड़-फूंक करवाने के लिए देवरे नामक स्थान पर ले गया। वहाँ वह 2 दिन तक जीवित रही लेकिन अंधविश्वास के चक्कर में तीसरे दिन उसकी मृत्यु हो गई। इस तरह की कई प्रकार की घटनाएं यहाँ अक्सर होती रहती हैं। शारीरिक व मानसिक बीमारी होने पर लोग लोग इलाज के लिए अंधविश्वास की ओर बढ़ते जा रहे हैं। 

वर्तमान समय में राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के कई गाँवों के लोग अभी भी अंधविश्वास के कारण आर्थिक रूप से और कमज़ोर होते जा रहे हैं। गाँवों में ऐसी व्यवस्था का प्रचलन बढ़ रहा है, बीमारियों को ठीक करने के नाम पर लोगों को बहकाया जाता है और उनको बीमारी ठीक कराने का विश्वास दिलाया जाता है। इसके बदले में लोगो को कपड़े, खाना-पीना, और अन्य कई चीज़ें भेंट करने को कहा जाता है। साथ ही उन्हें कई तरह के नियम मानने को कहा जाता है जिंका कोई वैज्ञानिक आधार भी नहीं होता, जैसे सवा महीने सुबह शाम दो समय पर नहाना, पैदल चलना और किसी पराए घर नहीं जाना आदि। परिवार के सभी सदस्य को एक साथ बैठ कर झाड-फूँक करनेवाले बाबा के कहने पर उनको बारी बारी से बुलाया जाता है। पैसा ना भी होने पर लोग कर्ज लेकर बाबा के कहे कार्यों को पूरा करते हैं और देवरे में बाबा के पास जाते हैं।

भेंट-चढ़ावे और अनुष्ठान की सामग्री बाबा द्वारा बताए गए स्थान से ही लेनी पड़ती है।  बची हुई सामग्री को वहीं छोड़ना पड़ता हैं नहीं तो जीवन सफल ना होने की बात कही जाती है। इस तरह की ठगने वाली व्यवस्था बनाकर रखी गई है। इससे आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों की हालत और खराब हो जाती है, और उन्हें इससे कोई फाइदा भी नहीं मिलता। पारिवारिक समस्याएं भी पैदा हो जाती हैं। 

मेरे परिवार में हम पांच भाई हैं, और हमारे चार भाई इसी चक्कर में पड़ गए हैं। मैंने अपने इन चारों भाइयों को बहुत समझाने का प्रयास किया लेकिन इसके उलट वह गाँव के अन्य लोगों के साथ मिलकर हमें भी इस चक्कर में मिलाने की कोशिश करते हैं। वो कहते हैं कि परिवार के सभी सदस्यों को इस कार्य में जुड़ना होता है, नहीं जुड़ने पर परिवार, रिश्तेदारों को डराया जाता है कि देवता तुम्हें भी बीमार कर देगा। जब मैं इन सब में शामिल नहीं होता तो परिवार के अन्य लोगों के साथ अनबन और क्लेश पैदा होता है। कई बार ऐसे कारणों से खाने-पीने की कमी भी हो जाती है और पारिवारिक रिश्तों में दरार भी पड़ जाती है। 

इस तरह के अंधविश्वास और रूढ़िवादी परंपराएं आदिवासी, दलित और शोषित वर्ग में मानसिक बीमारियों का मुख्य कारण हैं। देश और समाज में अंधविश्वास के हावी होने का एक मुख्य कारण ग्रामीण इलाकों में आज भी सरकारी अस्पतालों की कमी है। कमज़ोर आर्थिक स्थिति के कारण शोषित और पीड़ित मज़दूर-किसान लोग शहरों के बड़े अस्पतालों में जाने में असमर्थ होते है। सरकारी अस्पताल में सही इलाज की सुविधाओं की कमी के चलते और बड़े स्तर पर शिक्षा की कमी के कारण लोगों के बीच अंधविश्वास बढ़ता चला जा रहा है।  

अंधविश्वास के बढ़ते खतरों का सामना करने के लिए, इसे जड़ से मिलाने और लोगों को जागरूक बनाने के लिए  के लिए हम संगठन के लोग बड़े स्तर पर कदम उठाएंगे। बड़े स्तर पर शिक्षा व्यवस्था को आगे बढ़ाएंगे, लोगों को सामाजिक हितों की जानकारी वाली शिक्षा व्यवस्था को लागू करेंगे।  समाज में व्याप्त अंधविश्वास को समाप्त करने के लिए शिक्षा के पाठ्यक्रम में इनकी जानकारी को शामिल करने का प्रयास करेंगे। जन संगठन का निर्माण करेंगे, जिससे लोग समय-समय पर संगठित होकर जागरूक बन पाएँ। एक ऐसी व्यवस्था को बनाने का प्रयास करेंगे जो अंधविश्वास को धरातलीय स्तर पर रोकने में सक्षम हो। 

Author

  • शम्भु लाल भील, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं। शंभू एक जागरूक युवा वार्ड पंच हैं और चित्तौड़गढ़ ज़िले में प्रतिरोध संस्था से जुड़कर, भील आदिवासियों की स्वास्थ्य संबंधित व अन्य समस्याओं को हल करने में लगे हैं। वे ‘हमारा स्वास्थ्य हमारे हाथ’ कार्यक्रम से जुड़े हैं।

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