महेश हेंब्रम: 

संविधान हमारे लिए ज़रूरी हैं, संविधान से देश चलता है। संविधान गरीब वर्ग के लिए है। धर्म से देश नहीं चलता है। धर्म एक आस्था है, धर्म अलग-अलग समुदाय में अलग-अलग माना जाता है । देश में अनेक समुदाय, जातियाँ हैं, सबके धर्म-परम्पराएँ अलग-अलग हैं। धर्म आस्था है, मन की शांति के लिए है, लेकिन संविधान देश की शांति को बनाए रखने के लिए है। पूरे भारत में संविधान एक है, धर्म अनेक हैं। आज के समय से देखा जाए तो संविधान गरीब के लिए है। पूंजीवादी अमीर लोग संविधान नहीं मानते, पूंजीवादी गरीब की ज़मीन हड़पकर गरीबों का जीना भी मुश्किल कर देते हैं। इसलिए कह सकते हैं पुंजीवादी लोग संविधान नहीं मानते हैं और संविधान गरीब लोगों को सुरक्षित करता है। 

संविधान में लोगों को रहने का अधिकार है, जीने का अधिकार है, कपड़ा पहनने का अधिकार है, घूमने का अधिकार है, स्वेछा से धर्म मानने का अधिकार है, धर्म का प्रचार करने का अधिकार है। जल-जंगल-ज़मीन का अधिकार है, जाति, अपना धर्म, रीती-रिवाज़, अपनी संस्कृति बचाने का अधिकार है। संविधान सबको समान अधिकार देता है। आज ये कथित धर्म गुरु धर्म के नाम पर गरीब, आदिवासी और अन्य परंपरागत मूल निवासियों की ज़मीन, जल, जंगल, पहाड़ हड़पना चाहते हैं। यह हड़प रहे हैं और गरीबों का अधिकार खत्म कर रहे हैं। 

संविधान सब के लिए है, देश में कुल जितने समुदाय हैं संविधान में सबको समान अधिकार हैं। संविधान जिसने बनाया वो भी इंसान था और जिसने धर्म बनाया वो भी इंसान था। संविधान में ये भी लिखा है संविधान चाहे- अच्छा बना या खराब बना, अगर चलाने वाले अच्छे होंगे तो देश को अच्छी दिशा में ले जाएंगे। अभी के समय में हमको लगता है कि संविधान चालाने वाले देश को गलत दिशा में लेके जा रहे हैं। उसमें जो लिखा है हम उसे सही मानते हैं, लेकिन धर्म के ठेकेदार धर्म के नाम पर बिजनस कर रहे हैं। मतलब गलत दिशा में लेके जा रहे हैं। हम देखते हैं कि धर्म के बारे में लोगों को बहुत पढ़ाया जाता है अथवा उसका पालन सिखाया जाता है, लेकिन संविधान के बारे में गाँव-देहात में लोगो को नहीं सिखाया जाता है। अगर सिखाया गया होता तो सबको जानकारी होती कि संविधान क्या हैं? मेरा मानना है कि संविधान की सबको जनकारी होनी चाहिए तभी लोग अपना हक और अधिकार समझ पाएंगे और मेरा मानना है कि सभी लोगों को संविधान का पालन करना चाहिए।

फीचर्ड फोटो आभार : विकाश कुमार और अंकुर शाश्वत

Author

  • महेश, बिहार के बांका ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। अपने क्षेत्र के संगठन- आदिवासी मजदूर किसान मुक्ति वाहिनी के साथ मिलकर अपने समुदाय के लिए काम करते हैं।

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