स्वप्निल:

हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में कहा कि पोसको (POSCO) कानून का उद्देश्य बच्चों (नाबालिगों) को लैंगिक अपराधों से बचाने का है, ना की युवा जोड़ों को अपराधी घोषित करने का। न्यायालय ने एक युवा लड़के (जिस पर पोसको कानून, अपरहण और रेप जैसे संगीन आरोप लगे थे) को रिहा कर ज़मानत प्रदान करी।

आइए पहले जानते है की कोर्ट ने ऐसा कहा क्यूँ? 

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने संबंधी अधिनियम (Protection of Children from Sexual Offences Act– POCSO), 2012 में लागू हुआ। इसका मुख्य उद्देश बच्चों को लैंगिक  अपराधों (sexual offences) से बचाने का है। 

पोसको कानून बहुत ही महत्वपूर्ण कानून है। पर हर एक अच्छे कानून का दुरुपयोग जनता/समाज कर ही लेती है। इसकी गाज गिरती है उन युवा जोड़ों पर जो अपनी स्वेच्छा से प्रेम के सम्बंध में होते हैं। ज़्यादातर मामलों में लड़की की उम्र 18 वर्ष से कम  होती और लड़के की 16 से 20 के बीच। अगर किसी भी प्रकार का यौन संबंध स्थापित हो गया तो मान लीजिए कि लड़के को लंबी सज़ा मिलना निश्चित है। होता ऐसा है कि यदि कोई युवा जोड़ा घर छोड़ भाग जाता है या यौन सम्बंध बना लेता है तो, लड़की का परिवार पुलिस के पास जाकर अपरहण, बलात्कार और पोसको कानून के अंतर्गत – किशोरी को बहला फुसलाकर उसके साथ ग़लत काम करने की रिपोर्ट दर्ज करवा देता है। पुलिस हरकत में आकर लड़के को गिरफ़्तार कर लेती है और लम्बे समय तक ऐसे लड़कों को ज़मानत नहीं मिलती है।

जब ऐसा मामला कोर्ट में आता है तो लड़के को ही दोषी ठहराया जाता है। इन धाराओं में सज़ा छोटी-मोटी नहीं बल्कि उम्र क़ैद, 10 बरस तक होती है, और कई ऐसे बालक हैं, जिन्हें प्यार करने की इतनी बड़ी सज़ा मिली है। ऐसा देखा गया है कि लड़कियों की स्वेच्छा से ही सम्बंध स्थापित होता है और परिवार, समाज, पुलिस और कोर्ट, इस पर ना ही गौर करता है और ना ही इन तथ्यों को मानता है। शायद कानून का मानना ये है कि 18 से पहले कोई भी किशोर ऐसे फ़ैसले लेने में असक्षम है। और समाज तो लड़कियों को कोई भी फ़ैसला लेने योग्य मानता ही नहीं। कई मामलों में लड़कियों ने साफ़ बयान दिए हैं कि वह लड़के से प्रेम करती है, स्वेच्छा से घर से गयी थी या यौन सम्बंध किए थे, पर कोर्ट इन बातों को नहीं मानता। लड़का यदि 18 वर्ष से कम हुआ तो उसे किशोर जेल में 3 साल तक रहना पड़ता है और यदि 18 से ऊपर है, तो उम्र क़ैद या 10 साल तक की सज़ा भुगतनी पड़ती है। 

दिल्ली हाई कोर्ट ने पहली बार लड़की के परिवार द्वारा होते पोसको कानून के दुरुपयोग को माना है। ज़रूरी है कि कोर्ट ऐसे मामलों में संवेदनशील रहे और हर केस के तथ्यों को बारीकी से समझ कर ही फ़ैसला दे। 

सेक्स एजुकेशन पर भी गौर करना ज़रूरी है। हम यदि भारत को प्रगतिशील बनाना चाहते है तो हमें युवाओं को संवेदनशील और सेक्स एजुकेशन के प्रति जागरूक बनाना है, ना कि उन्हें अपराधी घोषित कर जेलों में सड़ने देना है।

Author

  • श्रुति से जुड़े मध्य प्रदेश के संगठन जेनिथ सोसाइटी फॉर सोशियो लीगल एम्पावरमेंट को बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले स्वप्निल, संगठन के कार्यकर्ता हैं। स्वप्निल पेशे से वकील हैं जो क्षेत्र के युवाओं के साथ मिलकर अलग-अलग मुद्दों पर काम की पहल कर रहे हैं। उन्हें खेलकूद करना और फोटोग्राफी करना पसंद करते हैं।

    View all posts

Leave a Reply

Designed with WordPress

Discover more from युवानिया ~ YUVANIYA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading