तरुण जोशी:

महिलाएं उत्तराखंड की आर्थिकी की हमेशा से ही रीढ़ बनी रही हैं। यहाँ की आर्थिकी में किसी भी तरह के परिवर्तन का सबसे ज्यादा प्रभाव महिलाओं पर ही पड़ता है। यही कारण रहा है कि उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन काल से लेकर अब तक चले सभी आंदोलनों में महिलाओं की एक मुख्य भूमिका रही है। राज्य आंदोलन में भी महिलाओं की भूमिका पुरुषों से अधिक ही रही है, कम नहीं और तत्कालीन सत्ताओं द्वरा किए गए दमन को भी उन्हें ही अधिक झेलना पड़ा है।

राज्य बनने के पश्चात यह उम्मीद थी कि महिलाओं के योगदान को देखते हुए उनके पक्ष में कुछ विशेष नीतियों को लागू किया जाएगा ताकि उनके स्तर और स्तिथि में कुछ वृद्धि हो सके पर आज भी हम देखते हैं कि पर्वतीय क्षेत्र की महिलाओं की दिनचर्या पूर्व की तरह कायम है। सुबह उठकर जंगल जाना, लकड़ी-चारे की व्यवस्था  करने के लिए जूझना और बचे समय में घर की दिनचर्या में व्यस्त रहना।

ऐसा नहीं कि सरकार ने महिलाओं के लिए कुछ विशेष प्रयास नहीं किए। घस्यारी योजना इसी उद्देश्य के साथ लाई गई थी परन्तु इस योजना की धरातल में स्थिति से सभी वाकिफ हैं। महिलाओं के समग्र विकास के लिए उत्तराखंड महिला विकास योजना भारी भरकम उद्देश्यों के साथ शुरू की गई थी, परंतु वास्तव में इससे कितना परिवर्तन आया वह शोध का विषय है। महिलाओं को स्वरोज़गार से जोड़ने के लिए भी सरकारों द्वारा कम प्रयास नहीं किए गए। मुख्यमंत्री स्वरोज़गार योजना, वीर चंद्र सिंह गढ़वाली पर्यटन स्वरोज़गार योजना जैसी कई योजनाओं में महिलाओं को प्रमुख अवसर प्रदान करने की इच्छा ज़ाहिर भी की गई। इसके अतिरिक्त स्वयं सहायता समूह के माध्यम से भी महिलाओं को स्वरोज़गार से जोड़ने के प्रयास सरकार के द्वारा लगातार किए जा रहे हैं। 

कुछ महिला समूहों द्वारा इस क्षेत्र में बहुत लगन से काम भी किया गया और स्थानीय उत्पाद तैयार किए गए। हेडिया गांव की हेमा जोशी ऐसे ही एक स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हुई हैं और कंपोस्ट खाद, झाड़ू, बैग तथा खिलौने जैसे कई उत्पाद ना सिर्फ़ स्वयं तैयार कर रही हैं वरन क्षेत्र के कई अन्य स्वयं सहायता समूहों को भी इन कार्यों के लिए प्रेरित कर रही हैं। हेमा जोशी का कहना है कि उत्पादों को तैयार करने में महिलाएं अपना पूरा योगदान दे रही है परंतु उनके सामने जो मुख्य समस्या आ रही है वह बाज़ार की है। सरकार द्वारा कुछ स्थानों पर उनके उत्पादों की बिक्री की व्यवस्था की गई है, परंतु यह इतना नाकाफी है कि इसके स्थान पर होना यह चाहिए कि महिलाओं के द्वारा उत्पादित सामानों को सरकार एक निश्चित मूल्य पर खरीदे और फिर इनकी बिक्री करे। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो बाज़ार के अभाव में स्वयं सहायता समूहों द्वारा चलाई जा रही गतिविधियां ज़्यादा दिनों तक नहीं चल पाएंगी। इसके अतिरिक्त उनका यह भी सुझाव था कि पर्यटन स्थलों पर तथा स्थानीय बाज़ारों में महिलाओं को जगह उपलब्ध कराई जानी चाहिए। 

महिला समूह के साथ पिछले कई सालों से कार्य कर रही चंपा उपाध्याय का मानना है की महिला उद्यमियों को सबसे बड़ी समस्या बैंकों से मिलने वाले ऋण को लेकर हे। महिलाओं के नाम पर कोई संपत्ति नहीं है इसलिए महिलाओं को बैंकों से ऋण नहीं मिल पाता है। उनका यह भी कहना था कि पूर्व सरकार द्वारा पैतृक जमीन पर महिलाओं को बराबरी का हक देने की बात की गई थी, यदि यह हो जाता तो महिलाओं को किसी भी कार्य को करने के लिए बहुत सुविधा हो जाती। परंतु सरकार द्वारा इस संबंध में किया गया संशोधन लागू नहीं किया जा रहा है। उन्होंने ज़मींदारी विनाश अधिनियम में किए गए संशोधन को तत्काल लागू करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि सरकार द्वारा महिलाओं के विकास के लिए योजनाएं तो आरंभ की गई हैं, परंतु सही क्रियान्वयन के अभाव में महिलाओं को इन योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। अतः यह आवश्यक है कि इन योजनाओं का क्रियान्वयन सही ढंग से किया जाए ताकि महिलाओं की स्थिति और स्तर में परिवर्तन आ सके।

फोटो आभार: thethirdpole.net

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