तरुण जोशी:

गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ का नाम लेते ही आपके सामने जो तस्वीर उभरती है वो एक बेहद नम्र, खुशनुमा और सही अर्थों में कहें तो एक उम्दा इंसान की है, जिससे आप मिलने के बाद हमेशा मिलना चाहते हैं और मिलने के बाद उसकी यादें आपके दिलों में घर कर जाती हैं। उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के जूली गाँव से शुरू हुआ गिरीश तिवारी का सफर, गिर्दा में बदलने तक कई सारे पड़ाव से होकर गुज़रा है। इन पड़ावों से गुज़रकर ही वह एक उम्दा इंसान बन पाए, फिर चाहे वह रिक्शा चलाना हो या मुंशीगिरी करना।

उनके व्यक्तित्व के इतने सारे पहलू थे कि जब तक आप एक को समझते और उससे प्रभावित हो रहे होते थे तो उनके व्यक्तित्व का कोई अन्य पहलू आपको फिर से प्रभावित करने के लिए आ जाता था। इस संदर्भ में मुझे याद आ रहा है कि इस वर्ष उत्तराखंड के एक आलोचक महोदय द्वारा गिर्दा के ऊपर काफी कुछ लिखा गया। उन्होंने गिर्दा को कवि भी मानने से इनकार किया, जन कवि तो दूर की बात थी। पर उनके द्वारा की गई आलोचनाओं में भी वह इस बात से इंकार नहीं कर सके कि गिर्दा एक अच्छे रंगकर्मी थे। इस बात को यहाँ लिखने का उद्देश्य आलोचना के संदर्भ में बात करना नहीं, वरन सिर्फ गिर्दा के व्यक्तित्व के पहलू से जुड़ा हुआ है कि प्रखर आलोचक होने के बावजूद भी उनके व्यक्तित्व के किसी ने किसी पहलू से आप प्रभावित हो ही जाते थे।

गिर्दा से मेरी पहली मुलाकात उनके नैनीताल के एक गोठनुमा घर में हुई थी। तब तक उनके बारे में हम निर्मल जोशी जी से इतना कुछ सुन चुके थे कि उनके बारे में कोई कल्पना कर पाना हमारे लिए संभव नहीं था। झूलती हुई चारपाई में बहुत ही तन्मयता से प्याज के बारीक टुकड़े काटते हुए गिर्दा की पहली तस्वीर आज भी मेरी आंखों के सामने है। प्याज, आमलेट के लिए काटा जा रहा था और मैं मन ही मन सोच रहा था कि इतना बारीक प्याज आखिर किस चीज के लिए? बाद में जब गिर्दा से आत्मीयता बढ़ी तब मैंने उनसे एक दिन यह प्रश्न पूछ लिया और उन्होंने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, “बब्बा जो भी काम करना है उसे अगर दिल से नहीं किया जाए तो उसका कोई अर्थ नहीं है।”

वह आपसे मिलने पर आपके साथ नितांत व्यक्तिगत बातों से शुरू करते थे और कब आपकी यह चर्चा अंतर्राष्ट्रीय फलक तक फैल जाती थी, आपको पता ही नहीं चलता था। उस ज़माने में जब इंटरनेट जैसी तत्काल जानकारी जुटाने वाली चीजें मौजूद नहीं थी, गिर्दा आपके लगभग हर सवाल का जवाब कहीं न कहीं से ढूंढ ही लाते थे। उनके सिरहाने में रखी हुई ढेर सारी किताबें सिर्फ सजावट की चीजें नहीं हुआ करती थी, वह उनको सिर्फ पढ़ते ही नहीं थे, वरन एक तरह से सिर्फ अपनी बातों से ही हमें भी वह पढ़वा दिया करते थे।

सन मुझे याद नहीं है पर वह 15 अगस्त का दिन था और उस दिन उन्होंने तय किया कि आज नैनीताल की सड़कों पर “कौन आजाद हुआ” गीत गया जाएगा। तल्लीताल से मल्लीताल तक बिना रुके वह यह गीत गाते हुए निकल गए और ठहर गए वो सब लोग जो रास्ते में चल रहे थे।

अपने किसी भी साथी के लिए, चाहे छोटा हो या बड़ा उनके मन में हमेशा बराबरी का सम्मान रहता था। ‘मेरी बात मानी ना जाए लेकिन सुन ली जाए’ के अपने तकिया कलाम के साथ किसी भी बैठक में जब वह अपनी बात रखते तो अन्य साथियों के लिए वह एक पत्थर की लकीर बन जाती। उर्मूल ट्रस्ट द्वारा आयोजित एक पदयात्रा में हम लोग बीकानेर से जैसलमेर तक शामिल हुए। दिल्ली में थोड़ा समय था तो गिर्दा का फरमान हुआ कि आज लाल किले में ध्वनि और प्रकाश कार्यक्रम देखा जाएगा। तब तक इसके बारे में हमारी कोई जानकारी नहीं थी, हमने न सिर्फ कार्यक्रम देखा बल्कि गिर्दा के द्वारा तत्कालीन मुगल शासकों की वास्तुकला से लेकर उनके पतन तक का पूरा इतिहास भी सुन लिया। 

इस यात्रा के समापन में एक बड़ा कार्यक्रम होना था, जिसमें राजस्थान की कई बड़ी हस्तियों को भी शामिल होना था। गिर्दा के गीत से कार्यक्रम आरंभ होना था और शुभम गिर्दा से पूछने लगा कि कार्यक्रम में कौन सा गीत गाया जाए? मैंने जो गीत सुझाया उस पर गिर्दा बोले, “या बब्बा यह गीतो! यह गीत तो आंदोलन के लिए ठीक था यहाँ पर तो कुछ चुभने वाला होना चाहिए।” हमारे पास देने के लिए कोई सुझाव था नहीं और कार्यक्रम में गिर्दा ने जो गाया वह था, “पानी बिच मीन पियासी खेतों में भूख उदासी उलट बासिया नहीं कबीरा खाली 486 486 चाल।” 

एक बार हम लोग तिलोनिया की यात्रा पर थे तो अचानक गिर्दा को याद आई, “यार बब्बा यहाँ तो कस्तूरी मिलती है” अब हमें क्या पता कस्तूरी क्या होती है? पर गिर्दा का आदेश था तो हमने खोजबीन की और उनकी कस्तूरी आखिर मिल ही गई और हमें सुनने को मिला कस्तूरी का इतिहास। ऐसे किस्से अगर लिखे जाए तो शायद एक पूरी किताब बन सकती है, पर मुझे लगता है कि उसके व्यक्तित्व के जिस पहलू ने न सिर्फ उत्तराखंड वरन पूरे देश को प्रभावित किया वह उसका जनकवि वाला पक्ष था। उनकी खासियत यह थी कि वह न सिर्फ जन कवि थे बल्कि उनके लिखे गए गीत, उनके द्वारा गाए जाने पर जिस संप्रेषण के साथ अपना अर्थ देते थे, वह शायद किसी दूसरे के द्वारा गाए जाने पर संभव नहीं था। पर यहाँ पर भी अपने परफेक्शन वाले पक्ष से कभी उन्होंने समझौता नहीं किया। 

उन्होंने हमारे द्वारा किए जाने वाले कई सारे नाटकों का निर्देशन किया था, पर जब कभी मंचीय नाटक की बात आती तो वह जब तक संतुष्ट नहीं हो जाते थे तब तक हमें लगातार रिहर्सल करनी होती थी। कई बार एक ही शब्द के लिए हमने उन्हें जिस तरह से जूझते हुए देखा है, वह अपने आप में अद्भुत था। परंतु यहीं पर जब जन आंदोलनों के दौरान किए जाने वाले नुक्कड़ नाटक की बात आती तो वह बिल्कुल बदल जाते थे। एक बार मैंने उनसे प्रश्न किया कि नुक्कड़ नाटक में वह हमें जिस तरह की छूट दे दिया करते थे, वह मंचीय नाटकों में क्यों नहीं? तब उन्होंने हमें इस गहरे भेद को समझाया कि मंचीय नाटक कला है और नुक्कड़ नाटक कथ्य। जन आंदोलन के दौरान आपको अपनी बात लोगों तक पहुंचानी है, यहाँ पर यह मायने नहीं रखता है कि आपने कितना अच्छा अभिनय किया बल्कि आपने कितनी अच्छी तरह से बात पहुंचाई यह मायने रखेगा।

उनके लिखे गीतों में यह आशा और विश्वास हमेशा बना रहता था कि एक दिन यह व्यवस्था अवश्य बदलेगी। इसी पर उनका लिखा हुआ गीत जो कि जन आंदोलनो के द्वारा काफी प्रचारित-प्रसारित हुआ, “जेता इक दिन तो आलो ऊ दिन या दुनी में” आशावाद का सर्वोच्च गीत है। चाहे हम रहे या ना रहे लेकिन जब अच्छे दिन आएंगे तब हम भी उन अच्छे दिनों में किसी ना किसी तरह से मौजूद होंगे।

उनका एक और गीत, “उत्तराखंड मेरी मातृभूमि”  से कुछ लोगों की सहमति नहीं रही लेकिन लोगों के बीच यह गीत इतना लोकप्रिय है कि आज उत्तराखंड के स्कूलों में सुबह की प्रार्थना इसी गीत के साथ की जाती है। सामान्य जन से लेकर विशिष्ट जन तक किस तरह उनसे जुड़े हुए थे, इसका प्रमाण उनकी अंतिम यात्रा है जिसमें न जाने कितने विशिष्ट लोग शामिल हुए। वहीं नाव से लेकर रिक्शा चालकों तक का समूह उनकी अंतिम यात्रा में जिस तरह से शामिल हुआ, उस तरह की अंतिम यात्रा शायद बहुत ही कम लोगों को नसीब होती है। यह शायद हम लोगों का सौभाग्य ही था कि गिर्दा का साथ हमें नसीब हुआ। उनकी यादें और गीत हमेशा हमारे दिल में बसे रहेंगे।

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