सत्यम: 

कविता क्या है? जब हम यह सोचने एक दिन बैठे तो कई खयाल आए। लेकिन जब हमें हिन्दी के बड़े विद्रोही कवि सुदामा पाण्डेय उर्फ धूमिल ने बताया कि –‘कविता, भाषा में आदमी होने की तमीज़ है’ तब से मेरे लिए कविता के मायने बदल गए। फिर उन्हीं धूमिल से मैंने परिचय और बढ़ाया तो पाया कि कविता कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे किसी कवि सम्मेलन में या साहित्य के बड़े बड़े मंचों या सभागारों में सुना जाता है, जिसे लिखने वाला, रचने वाला बहुत बड़ा इंसान होता है। कविता, गीत, शायरी, दोहे, ग़ज़ल या तराने हम सभी के हैं। हमें लेकिन वैसी कविता या शायरी ज़्यादा अपनी लगती है जो हमारी बात करती है। हमें ढाढ़स देती है, हमारी परेशानियों को, हमारी तकलीफ़ों को शब्द देती है, हमें उन चुनौतियों से जूझने का माद्दा देती है जो हमें अपने आस-पास कोई और नहीं देता। कई बार ऐसा लगता है कि एक यही कवि या शायर है जो हमें ठीक वैसे देख पा रहा है जैसा हम अभी महसूस कर रहे हैं। ऐसे शायर और कवि हमें ताक़त देते हैं। 

हम जैसे गरीब, वंचित और हर तरफ से उत्पीड़ित लोगों के लिए इंसाफ की बात करती कविता हमें आपस में जोड़ती है। हमें हमारे दुखों के धागों से जोड़ती है। जब ऐसे जनकवि बृजमोहन कहते हैं- “धीरे धीरे ही सही, दुख जोड़ेगा हमें” तो यह जोड़ना किसी बड़े बदलाव के लिए ज़मीन तैयार करता है। कल तक हम जिस वजह से दुखी थे आज इस कविता से हौसला पकार हम अपने दुखों को जोड़ने लग जाते हैं। दुख एक मुक्ति का मार्ग बन जाता है। 

यह कविता फिर एक व्यक्ति की नहीं रह जाती बल्कि यह ऐसे सभी लोगों की आवाज़ बन जाती है जो इस समाज में, इस देश में, इस व्यवस्था के शिकार हैं। जिन्हें हर तरफ से केवल और केवल अपमान, उपेक्षा, उत्पीड़न ही मिलता है। ऐसी वंचित जनता का हिस्सा हमेशा ज़्यादा रहा है जिनके शोषण पर यह पूरी व्यवस्था चंद लोगों के लिए सारा वैभव रचती है। ऐसे में अदम गौंडवी साहब हम सबकी तरफ से सत्ता से आँख मिलाकर सीधा सवाल पूछते हैं-

“सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद हैं, दिल पर रखकर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है”?  

यहीं धूमिल भी हम सब की तरफ से देश की संसद से ही पूछ डालते हैं कि ये बताइये –

“एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ–
‘यह तीसरा आदमी कौन है ?
मेरे देश की संसद मौन है”

ठीक ऐसा ही सवाल एक और जनकवि और शायर दुष्यंत भी पूछते हैं- 

“कहाँ तो तय था चरागां हर एक घर के लिए, कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए”। 

और जब संसद कुछ जवाब नहीं देती। सत्ता इन सवालों को अनसुना कर देती है और मलाई खाता हुआ समाज ऐसी आवाज़ों को जान-बूझकर सुनने से इंकार कर देता है तब हमारे बीच के ऐसे अदीब, शायर, कवि खुद ही जनता के बीच जाकर इन चुभते सवालों के जबाव बताते हैं। 

दुष्यंत कहते हैं कि – “यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां,हमें मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा”। ऐसे ही अदम गौंडवी साहब कहते हैं कि-  

“जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे 

कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे” 

यहीं हमारे समय के जनकवि महेश कटारे सुगम बताते हैं कि 

“बड़ी उम्मीद थी इनसे मिलेंगी सब्ज़ सुविधाएँ
मगर इन जेबकतरों से मिली ख़ाली निराशा है।

रियायत दी गई सारी बड़े उद्योगपतियों को,
बज़ट में प्यार उन पर ही लुटाया बेतहाशा है।

किसानों और श्रमिकों ने दिया था वोट भूले तुम,
नहीं उनको मिला कुछ भी अँधेरा है कुहासा है।”

हमारे बीच पैदा हुए हमारे समय के और हमारे समय से पहले के समय के और उससे भी पहले के समय के ऐसे कवि हमें सिखाते हैं, बताते हैं, समझाते हैं, पढ़ाते हैं इस व्यवस्था की चाल-बाज़ियाँ, इसकी कारिस्तानियां और इसमें चलते दांव-पेंच। ये हमें वो सब बताते हैं जो हमारे लिए जानना ज़रूरी है। जिन्हें ठीक से जाने बगैर हम इनसे लड़ नहीं सकते। जिन्हें समझे बगैर हम अपनी दशा बदल नहीं सकते और इसी तरह चक्की के पाटों की तरह पिसते रहने को मजबूर बने रहते हैं। ये हमें बहुत कुछ ऐसा सिखाते हैं जो हमारी नियति बदल सकते हैं शर्त बस इतनी है कि हम इन्हें सुनें, इनके कहे पर कान धरें, और इनके बताए रास्ते पर अमल करें। 

जब दुष्यंत कहते हैं कि –

“अब तो इस तालाब का पानी बदल दो

ये कंवल के फूल मुरझाने लगे हैं”

तो उनका संदेश बहुत साफ है कि अब कुछ बदलने की ज़रूरत है। यह बदलाव हम ही से संभव है। क्योंकि हमें अपनी परवाह खुद करना है। ऐसी बात हमारे जनकवि इसलिए कह पाते हैं क्योंकि उन्हें हम पर यकीन है। हमारी जीने की इच्छा पर यकीन है और यह भरोसा है कि हम ही कुछ बदल सकते हैं क्योंकि हम फौलाद से बने हैं। हम मेहनतकश हैं। हम धूप, बारिश और जाड़ों में काम करते हैं निरंतर। इस बात को हिन्दी के एक और जनकवि केदारनाथ अग्रवाल बहुत सरल ढंग से कहते हैं- 

“जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है
जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है
जो रवि के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा
 
जो जीवन की आग जला कर आग बना है
फौलादी पंजे फैलाए नाग बना है
जिसने शोषण को तोड़ा शासन मोड़ा है
जो युग के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा”

केदारनाथ हमें यह भरोसा देते हैं कि हम यूं ही नहीं मर जाएँगे क्योंकि हम तो जीवन की धूल चाट कर बड़े हुए हैं। अपनी एक और कविता में केदारनाथ जी हमारे जन्म को इस तरह देखते हैं कि वह ही है जो हमें इस व्यवस्था की प्रताड़ना से मुक्ति देगा। अपनी एक कविता मजदूर का जन्म में वो हमारी इसी ताकत का ज़िक्र करते हैं। देखिये- 

एक हथौड़े वाला घर में और हुआ !
हाथी सा बलवान,
जहाजी हाथों वाला और हुआ !
सूरज-सा इन्सान,
तरेरी आँखों वाला और हुआ !!
एक हथौड़े वाला घर में और हुआ!
माता रही विचार,
अँधेरा हरने वाला और हुआ !
दादा रहे निहार,
सबेरा करने वाला और हुआ !!
एक हथौड़े वाला घर में और हुआ !
जनता रही पुकार,
सलामत लाने वाला और हुआ !
सुन ले री सरकार!
कयामत ढाने वाला और हुआ !!
एक हथौड़े वाला घर में और हुआ !

बल्ली सिंह चीमा जैसे जनकवि को तब हौसला मिलता है जब इस बदलाव के लिए लोग अपने हाथों में मशालें उठा लेता हैं। क्या खूब कहते हैं वो कि –

“ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के ।
अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के ।
कह रही है झोपडी औ’ पूछते हैं खेत भी,
कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गाँव के ।
बिन लड़े कुछ भी यहाँ मिलता नहीं ये जानकर,
अब लड़ाई लड़ रहे हैं लोग मेरे गाँव के ।
कफ़न बाँधे हैं सिरों पर हाथ में तलवार है,
ढूँढने निकले हैं दुश्मन लोग मेरे गाँव के ।
हर रुकावट चीख़ती है ठोकरों की मार से,
बेडि़याँ खनका रहे हैं लोग मेरे गाँव के ।
दे रहे हैं देख लो अब वो सदा-ए-इंक़लाब,
हाथ में परचम लिए हैं लोग मेरे गाँव के ।
एकता से बल मिला है झोपड़ी की साँस को,
आँधियों से लड़ रहे हैं लोग मेरे गाँव के ।
तेलंगाना जी उठेगा देश के हर गाँव में,
अब गुरिल्ले ही बनेंगे लोग मेरे गाँव में”। 

जनता की कविता महलों और कोठियों में नहीं रहती। वह हमारी झोड़ियों, खेतों और खलिहानों में रहती है और हमारे खून में बहती है। हमारे आंसू उस कविता के शब्द और छंद होते हैं। मिर्ज़ा ग़ालिब जिसे कहते हैं- “रगों में दौड़ने फिरने के हम नहीं कायल, जो आँख ही से न टपका वो लहू क्या है?” हमारी कविता हमारी आँखों से टपकता आँसू है जो खून बनकर बदलाव की कहानी लिखती है। 

ऐसी कविता हमारे साथ रहती है, हमें जीने का हौसला देती है और हमें अपनी किस्मत खुद लिखने का माद्दा देती है। दुष्यंत इसे ही कहते हैं- “जिसे मैं ओड़ता-बिछाता हूँ, वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ।” 

ऐसी कविता और ऐसे कवि ही हमारे जीवन में रंग भरते हैं जिसे वो खुद अपने रोज़ के आचरण में बरतते हैं। 

यह अंक ऐसे ही कवियों को एक बार फिर पढ़ने समझने का एक अवसर है। लेकिन इस अंक की सार्थकता तब होगी जब हम इन कवियों को ढूंढ-ढूंढ कर पढ़ें और इनकी कविताओं, शायरियों और कलामों से दोस्ती करें।

Author

  • सत्यम, मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से हैं। वे पूर्व में दिल्ली की संस्था श्रुति से जुड़े रहे हैं। सत्यम एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और वर्तमान में भोपाल में काम कर रहे हैं। वे नियमित रूप से समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं और गीत गाने-गुनगुनाने में भी रुचि रखते हैं।

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