तेजस्विता द्वारा संकलित:

हिंदुओं की ‘लालेश्वरी’ और मुसलमानों की ‘अल आरिफ़ा’

लल्लेश्वरी या लल्ल-द्यद (1320-1392) के नाम से जाने जानेवाली चौदवहीं सदी की एक भक्त कवियित्री थी जो कश्मीर की शैव भक्ति परम्परा और कश्मीरी भाषा की एक अनमोल कड़ी थीं। उनके जन्म को लेकर इतिहासकारों में स्पष्ट राय नहीं है। प्रो. जयलाल कौल के अनुसार माना जाता है कि इनका जन्म साल 1317 से 1320 के बीच हुआ था। लल्ला का जन्म श्रीनगर से दक्षिणपूर्व मे स्थित एक छोटे से गाँव के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके जीवन के बारे में अत्यधिक प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती है। उन्हे कई नामों से जाना जाता है लल्लेश्वरी, लाल, लल्ला आरिफ, लल्ला योगेश्वरी, लालीश्री इत्यादि।

जिस दौर में उनका जन्म हुआ, उस समय कश्मीर में बालविवाह का रिवाज़ था। उनके माता – पिता ने एक कश्मीरी पंडित के बेटे से उनका विवाह बारह वर्ष की अवस्था में ही कर दिया था। ससुराल में पति और सास ने बहुत दुर्व्यवहार किया इनके साथ, और उनको कईं यातनाएं का सामना करना पड़ा। ससुराल में कष्ट ही कष्ट मिले, और ससुराल वालों के इन्हीं दुर्व्यहार और कष्टों की वजह से लल्लेश्वरी ने घर त्याग दिया। वैवाहिक जीवन सु:खमय न होने की वजह से लल्ला घर त्याग देने के बाद छब्बीस साल की उम्र में ही उन्होंने संत श्रीकंठ महाराज जी से दीक्षा ली।

कश्मीरी संस्कृति और कश्मीर के लोगों के धार्मिक और सामाजिक विश्वासों के निर्माण में लल्लेश्वरी का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। वे अनेक सूफ़ी संतों के लिए प्रेरणा रहीं। ललद्यद की काव्य—शैली को ‘वाख’ कहा जाता है। वाख कश्मीरी भाषा का एक छंद है, जिसमें चार पंक्तियों में कवि अपनी बात कहता है। लल अपनी एक वाख में कहती हैं,

‘मैंने अपने गुरू से सिर्फ
एक ही पाठ सीखा है,
कि बाहर से भीतर की ओर देखो.
आत्म साक्षात्कार का पाठ..’

जिस तरह हिंदी में कबीर के दोहे, मीरा के पद, तुलसी की चौपाई और रसखान के सवैये प्रसिद्ध हैं, उसी तरह ललद्यद के वाख प्रसिद्ध हैं। उन्होंने उस दौर में पितृसत्तात्मक समाज में अपने लिए स्थान बनाया, रूढ़ियों को तोड़ा और धार्मिक मतभेदों को कम किया। अपने वाखों के ज़रिए उन्होंने जाति और धर्म की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर भक्ति के ऐसे रास्ते पर चलने पर ज़ोर दिया जिसका जुड़ाव जीवन से हो। उन्होंने धार्मिक आडंबरों का विरोध किया और प्रेम को सबसे बड़ा मूल्य बताया।

लेखक रंजीत होसकोटे के अनुसार लगभग 700 सालों तक ललद्यद की कविताएं और कथाएं कश्मीर में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच गाई जाती रही हैं। निश्चित ही वे कश्मीरी इतिहास की सबसे बेहतरीन धार्मिक- साहित्यिक नेतृत्व करने वाली महिला थीं। उन्होंने समाज में ब्राह्मणों का वर्चस्व ख़त्म कर मूर्ति पूजा जैसे आडम्बरों पर भी प्रहार किया था। उनकी कविताओं में महिलाओं और सामाजिक विकृतियों का गहरा परिचय मिलता है।

लोक-जीवन के तत्वों से प्रेरित ललद्यद की रचनाओं में तत्कालीन पंडिताऊ भाषा संस्कृत और दरबार के बोझ से दबी फ़ारसी के स्थान पर जनता की सरल भाषा का प्रयोग हुआ है। यही कारण है कि ललद्यद की रचनाएँ सैकड़ों सालों से कश्मीरी के जनजीवन में, हिंदुओं और मुसलमानों दोनों की स्मृति और वाणी में आज भी जीवित हैं। वे आधुनिक कश्मीरी भाषा का प्रमुख स्तंभ मानी जाती हैं।

साल 1392 में इस महान, बहादुर, सशक्त महिला की मृत्यु हो गई। उनकी स्मृतियां कश्मीरी ज़ुबान आज तक सहेजे हुए हैं।

(1)
लल बो द्रायस कपसि पोशचि सेत्चेय.
कॉडय ते दून्य केरनम यचय लथ.
तेयि येलि खॉरनम जॉविजॅ तेये.
वोवेर्य वाने गयेम अलान्जेय लथ..

हिंदी अनुवाद: मैं लला कपास के फूल की तरह एक शाख पर उगी थी. पर माली ने मुझे तोड़ा और मुझे इस बेदर्दी से झाड़ा कि कपास पर लगी सारी गर्त झड़ गई. उस स्त्री ने अपने चरखे की महीन सूईं में पिरोकर मेरी आत्मा को तब तक काता जब तक वह महीन धागे में न बदल गई. और धागा उठाकर बुनकर ले चला अपने करघे की ओर. जिस पर चढ़ा कर उसने यह कपड़ा तैयार किया है.

(2)
दोब्य येलि छॉवनस दोब्य कनि प्यठेय.
सज ते साबन मेछनम येचेय.
सेच्य यलि फिरनम हनि हनि कॉचेय.
अदे ललि म्य प्रॉवेम परमे गथ..

हिंदी अनुवाद: मुझ पर साबुन लगा कर धोबी ने घाट के पत्थर पर बहुत बेदर्दी से पटका. दर्जी ने पहले मुझे अपनी कैंची से टुकड़े-टुकड़े कर दिया और फिर तीखी सूईं से मेरे टुकड़ों को अपनी मर्जी से सी दिया. ये सब मैं चुपचाप देखती रही, भोगती रही और अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गई हूं. अब मैं अपने परमेश्वर में पूरी तरह विलीन हो रही हूँ.

(3)
गुरु ने बात एक ही कही
बाहर से तू भीतर क्यों न गई,
बस, बात यह हृदय को छू गई
और मैं निर्वस्त्र घूमने लगी।

(4)
पढे-लिखे को भूख से मरते देखा
पतझर से जीर्ण-शीर्ण ज्यों इक पत्ता,
मूढ द्वारा रसोइए को पिटते देखा बस,
तभी से मन मेरा बाहर निकल पडा।

(5)
थल थल में बसता है शिव ही,
भेद न कर क्या हिन्दू-मुसलमां।
ज्ञानी है तो स्वयं को जान,
यही है साहिब से पहचान।।

कवयित्री भेद-भाव, हिन्दू-मुस्लिम इत्यादि समाज में व्याप्त बुराइयों का बहिष्कार करने का संदेश दे रही है। उनके अनुसार शिव (ईश्वर) हर जगह बसा हुआ है, चाहे वो जल हो या आकाश या फिर धरती हो या प्राणी यहाँ तक कि हमारे अंदर भी ईश्वर बसा हुआ है। वह किसी व्यक्ति को ऊँच-नीच, भेद-भाव की दृष्टि से नहीं देखता, बल्कि वह हिन्दू-मुसलमान को एक ही नजर से देखता है।

(6)
प्रेम की ओखली में हृदय कूटा
प्रकृति पवित्र की पवन से।
जलायी भूनी स्वयं चूसी
शंकर पाया उसी से।। — (अनुवाद: फूल चन्द्रा)

फीचर्ड फोटो आभार: हिन्दू ब्लॉग

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  • तेजस्विता, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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