सलोमी एक्का:

मैं झारखंड राज्य के रांची ज़िले के लोधमा गाँव के एक आदिवासी किसान परिवार से आती हूँ। परिवार में पाँच भाई बहनों में मेरा स्थान चौथा है। पिताजी साक्षर थे लेकिन माँ तो कभी भी स्कूल तक पहुंची ही नहीं। फिर भी आज हम यहाँ तक पहुंचे और गाँव से निकलकर शहर के लोगों से जुड़ सके हैं। मुझे स्कूल में दाखिला दिलाने में मेरी बड़ी दीदी कि सबसे बड़ी भूमि रही है, ऐसा मालूम होता है। किसान परिवार होने के वजह से हमारे घर में गाय-बैल, बकरियां आदि पशु थे, जिन्हें खेती के समय चराना (उनकी देख-भाल करना) होता था। घर वाले कहते थे कि सलोमी पशुओं का देखभाल करेंगी। तब दीदी ने कहा हम सभी भाई-बहन स्कूल जाते हैं तो इसे भी पढ़ाएंगे। तब जाकर गाँव के स्कूल में ही मेरा दाखिला हुआ। 

5वीं क्लास पास करने के बाद मैंने प्रखण्ड के स्कूल में 6वीं क्लास में गदाखिला लिया, जिसके लिए मुझे गाँव से 6 किमी पैदल आना -जाना होता था। मेरे गाँव में, गाँव में ही रह कर पढ़ाई करने वाली पहली लड़की मैं ही थी। लेकिन जब मैं कॉलेज जाने लगी तो मैने साइकिल चलाना सीख लिया और कुछ समय बाद मेरे लिए एक साइकिल खरीद दिया गया। गाँव से 6 किमी साइकिल से जाती थी, फिर साइकिल को एक जगह रखकर आटो या बस से कॉलेज जाती थी। 

जहाँ पर मैं अपनी साइकिल रखती थी, उस जगह पर रविवार के दिन में कुछ लड़के-लड़‌कियाँ ग्रुप बनाकर नृत्य-गीत करते थे। इस ग्रुप के लीडर जिसे सभी लोग विद्यार्थी सर के नाम से पुकारते थे, वह बिहार के औरंगाबाद के रहने वाले थे। उनके साथ एक लड़की भी थी जो लोगों को लीडरशिप देती थी, दोनों ने मुझे भी बैठक में शामिल होने को कहा। एक दिन मैं उनके साथ मीटिंग में गई तो मुझे काफी अच्छा लगा। उसके बाद तो हम तीनों की काफी जमने लगी। कई बार हम लोग साइकिल से दूर-दूर तक निकल जाते थे। कभी-कभी उनके साथ ही रात बीतती और सामाजिक समस्याओं और मुद्दों पर चर्चा हम करते। 

इसके बाद एक दिन मेरे गाँव और आस-पास के गाँवों में यह अफवाह फैल गई कि गाँव में रात को नक्सली आते हैं। गाँव वाले रात में बारी-बारी से रखवाली करने लगे। कुछ लोगों का कहना था कि गाँव की कुछ लड़कियां नक्सलियों से मिली हुई हैं, हालांकि बाद में मामला शांत हो गया।

मैंने कक्षा 6 में ही A B C D सीखी और 10वीं तक ही अंग्रेजी पढ़ी, फिर आगे की पढ़ाई हिन्दी और मुंडारी भाषा में ही की। मैट्रिक के बाद आगे की पढ़ाई मैंने अपनी खुद की आय से ही की, जिसके लिए कभी मजदूरी की तो कभी किसी के खेतों में काम किया। अभी मैं एक किराए के मकान में रहती हूँ, कभी-कभी घर आना- जाना होता है, बाकी का समय समाज और आजीविका अर्जन करने में देती हूँ।

Author

  • रांची झारखंड से आने वाली सलोमी, केंद्रीय जन संघर्ष समिति के साथ मिलकर स्थानीय आदिवासी मुद्दों पर काम कर रही हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं।

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