देवानंद बोयपई:
आदिवासी शब्द को तोड़कर देखें तो, आदि+वासी – यानि जल जंगल और ज़मीन पर आदि काल से निवास करने वाले विशेष समुदाय। इनका प्रारंभिक जीवन काफी संघर्षपूर्ण था, खाद्य संग्रह, आखेट और कंद-मूल से इन्होने अपना जीवन-यापन शुरू किया। आज भी आदिवासियों की यह विशिष्ट पहचान और इसके उदाहरण देखने को मिल जाते हैं। दोलमा बुरू शिकार, कंद मूल का सेवन, खेती आदिवासियों की पेशा है। हमारे पूर्वज नए-नए खाद्य साग सब्जी, जंगली फल-फूल का निरंतर सेवन करते आ रहे हैं। समाज में सभी सांस्कृतिक रीति रिवाज और परंपरा अभिन्न है। समानता वाली परम्परा आदिवासी समुदायों की विशेषता है, त्योहारों में महिला और पुरुष दोनों समान रूप से हिस्सा लेते हैं और ग्राम सभा में भी महिलाओं को निर्णय लेने का अवसर होता है। हम आदिवासी शुभ मुहूर्त अपने अनुसार ही तय करते हैं, इन कार्यों में स्व निर्मित बांसुरी, बनम, ढोल-नगाड़ा, मांदर की थाप पर थिरकते हुए प्रकृति से संबंधित कार्यों को गीत-संगीत से व्यक्त करते हैं।
समूह और कस्बों में ग्राम मुंडा, डकुवा, दियूरी, मड़ाकी, दियूरी महिला, हागा मिसी की प्रधानता होती है। लेकिन वर्तमान समय में पारंपरिक सांस्कृतिक रीति रिवाजों में अब मनुस्मृति हावी हो रही है, बहुत ही तेजी से आदिवासी समुदायों में परिवर्तन हो रहे हैं। हमारे क्षेत्र में इन सभी लड़ाई को लड़ने के लिए बिरसा मुंडा, सुला पूर्ति, मछुआ गगराई, महेश्वर जमुदा, सेरेंग सिया घाटी में शहीद लोग भी शामिल हैं।
आदिवासियों के अस्तित्व के सामने आज विस्थापन सबसे बड़ा खतरा बनकर सामने आया है। आदिवासी समुदायों के बीच पिछले कुछ समय से धर्म परिवर्तन, भाषा का लुप्त होना, और पारंपरिक भोज्य पदार्थ में फास्ट फूड का प्रवेश तेजी बढ़ा है। विस्थापन के कारण आदिवासी लोगों के संवैधानिक अधिकारों का हनन बढ़ा है, ग्राम सभाओं की शक्तियों में भी इससे कमी आई है। अपने त्योहारों को छोड़ना, सामाजिक सामूहिक कार्यों से फासला बढ़ने आदि से हम सभी आदिवासी समुदायों को नुकसान हो रहा है।
वर्तमान में आदिवासियों की परंपरा, और उनके सांस्कृतिक रीति-रिवाज खतरे से बाहर नहीं हैं। आज हम स्वास्थ्य के क्षेत्र में ओझा-गुणी के चंगुल में फंस चुके हैं और ये ओझा लोग मनु स्मृति और ब्राह्मणों के नियमों के आधार पर पूजा करते हैं और आदिवासी समाज को भी इसी तरह चलाना चाहते हैं।
फीचर्ड फोटो आभार: unbumf.com

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