सिद्धार्थ:

9 अगस्त को भारत सहित दुनिया भर में विश्व आदिवासी दिवस मनाया गया। लेकिन आदिवासी हैं कौन? ट्राईबल, इंडिजीनियस, मूलनिवासी, अनुसूचित जनजाति और वनवासी जैसे कई शब्द हमने आदिवासी समुदायों के लिए प्रयोग होते हुए देखे, सुने और पढ़े होंगे। एक आम अवधारणा यह है कि जो लोग किसी भूखंड (क्षेत्र या देश) में सबसे पहले बसे वह आदिवासी हैं। भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में हमें विभिन्न आदिवासी समुदाय मिल जाते हैं। संविधान में इन समुदायों को जनजातीय समुदाय कहा गया, और उनके विकास के लिए आरक्षण जैसे प्रावधान भी किए। लेकिन इसकी ज़रूरत ही क्यूँ पड़ी? ऐसे कई सवाल हैं जिन पर एक लंबे समय से चर्चाएँ होती रही हैं। एक और सवाल यह भी है कि क्या ऐसे समुदाय केवल भारत में ही हैं? 

निश्चित रूप से दुनिया के सभी आदिवासी समुदायों के बारे में बस एक ही लेख में लिख पाना संभव नहीं है। यह लेख, लैटिन अमेरिका (दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप, कैरेबियन द्वीप समूह और मध्य अमेरिका) के आदिवासी या मूलनिवासी समुदायों के इतिहास पर नज़र डालने का एक छोटा सा प्रयास है जो एक दक्षिण अमेरिकी देश उरुग्वे के पत्रकार एड्वार्दो गालियानो की प्रसिद्ध किताब ‘ओपन वेन्स ऑफ लैटिन अमेरिका’ के पहले अध्याय से प्रेरित है। एक तरह से कहें तो यह लेख, इस किताब के पहले अध्याय के कुछ हिस्सों की समरी या सारांश ही है। 

गालियानो ने अपनी इस किताब में, 500 सालों तक लैटिन अमेरिका की धरती, वहाँ के संसाधनों के दोहन और वहाँ के लोगों के यूरोपीय देशों द्वारा किए गए शोषण के इतिहास को संकलित किया है, जिसकी शुरुआत स्पेन के खोजी कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज से शुरू होती है। कोलंबस पश्चिमी समुद्र मार्ग से एशिया की खोज में निकला था, और जब वह 1492 में बहामस के तट पर पहुंचा तो उसे लगा कि वह जिपांगो (जापान) के किसी द्वीप पर पहुंचा है। कोलंबस मरने तक भी यही सोचता रहा कि उसने एशिया पहुँचने का दूसरा रास्ता खोज लिया है। 15वीं सदी के अंत से 16वीं सदी में प्रवेश का यह समय, स्पेन के औपनिवेशिक विस्तार के लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण दौर था। पिछले 800 सालों से विभिन्न चरणों में इस्लाम और ईसाई धर्म के लोगों के बीच वर्चस्व और ज़मीन की लड़ाई चल रही रही थी, जिसे यूरोपीय देशों में क्रूसेड या होली वॉर कहा गया। यूरोप का रोमन कैथोलिक चर्च इस लड़ाई को बढ़ावा देनी वाला मुख्य संस्थान था जो अलग-अलग समय पर यूरोप की अलग-अलग राजशाहियों को इसकी कमान सौंपता रहा और इस दौर में क्रूसेड की कमान स्पेन के हाथ में थी, जिसमें बड़े स्तर पर खर्चा हो रहा था। ऐसे में अमेरिका की खोज स्पेन के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण साबित हुई।  

1492 में इस नई दुनिया की खोज करने के 3 साल बाद कोलंबस फिर एक नए अभियान पर निकला और इस बार वह हैती द्वीप पर पहुंचा जहाँ उसने केवल 200 से 300 लोगों की सेना के दम पर पूरे द्वीप पर कब्ज़ा कर लिया, लूट-पाट मचाई और वहाँ के 500 से भी ज़्यादा मूलनिवासियों को बंदी बनाकर स्पेन ले गया जहाँ उन्हें गुलाम के रूप में बेच दिया गया। स्पेन के धार्मिक लोगों ने जब लैटिन अमेरिकी लोगों को गुलाम बनाए जाने का विरोध किया तो 16वीं सदी की शुरुआत में बस नाम के लिए इस पर पाबंदी लगाई गई, लेकिन असल में इसका बस रूप बदल दिया गया था। अब जब भी स्पेन के लोग दक्षिण अमेरिका की इन जगहों पर आक्रमण करते तो वहाँ के मूल निवासियों को स्पेन की भाषा में कहा जाता कि यदि वह तुरंत ईसाई धर्म स्वीकार नहीं करेंगे तो उन्हें मिटा दिया जाएगा या फिर गुलाम बनाकर बेच दिया जाएगा। इस तरह स्पेन के लोग लैटिन अमेरिका के मूल निवासियों को लूटते रहे और गुलाम बनाकर उनकी जानवरों की तरह खरीद-फ़रोख्त करते रहे। ऐसा नहीं था कि स्पेनी आक्रांताओं ने लैटिन अमेरिका की खोज के तुरंत बाद ही वहाँ लूट-पाट मचाना शुरू कर दिया था। पहले उन्होने वहाँ के लोगों का जायजा लिया, उनकी खूबियों और कमज़ोरियों को समझा, यह भी पता किया कि उनके पास लूटने के लिए सोना-चांदी या अन्य कीमती चीज़ें हैं भी या नहीं। और जब उन्हें पता चला कि लैटिन अमेरिका की यह धरती कीमती चीजों से भरी पड़ी है, तो फिर उनकी लूट का सिलसिला अगले 500 सालों तक चलता ही रहा।   

अपने शुरुआती अभियानों में स्पेन के इन कथित खोजियों ने लैटिन अमेरिकी मूल निवासियों से सुरक्षा या कहें उनकी जान के एवज में बड़ी मात्रा में सोना और चाँदी वसूला, मना करने वालों को बेरहमी से मार दिया जाता। 1519 में ऐसे ही एक स्पेनी आक्रांता कोर्टेज़ ने (दक्षिणी मेक्सिको का एक साम्राज्य) एज़टेक साम्राज्य के सोने के भंडार के बारे में स्पेन के लोगों ने बताया। 15वीं सदी की शुरूआत में मेक्सिकन पठार के इलाके से बड़ी मात्रा में सोना और चाँदी जहाज के जहाज भरकर स्पेन भेजा गया। इसके 15 साल बाद एक अन्य स्पेनी फ्रांसिस्को पिज़ेरो ने (मौजूदा पेरु देश के पर्वतीय इलाके की एक सभ्यता) इंका साम्राज्य के राजा से एक कमरा भर सोना और दो कमरा भर चाँदी वसूला और फिर इंका राजा आताहुआल्पा की गला घोट कर हत्या कर दी। इसी तरह 15वीं सदी के मध्य तक आते-आते कैरेबियन द्वीप समूहों के मूलनिवासियों ने स्पेनी आक्रांताओं को सोने-चाँदी की यह भेंट देना बंद कर दिया क्यूंकी तब तक वह पूरी तरह से समाप्त ही हो चुके थे। खानों से सोना-चाँदी निकालना एक खतरनाक काम था, दिन भर कमर तक के पानी में रहकर सोने और चाँदी से मिश्रित बालू को निकालना और उसमें से इन कीमती धातुओं को अलग करना एक थका देने वाला काम था। मौत को ऐसे जीवन से बेहतर समझकर, हैती के मूलनिवासियों ने अपने बच्चों को अपने ही हाथों से मार डाला और सामूहिक आत्महत्या कर ली। स्पेन के 16वीं सदी के इतिहासकार ‘फेरनांदेज़ दे ओवियादो’ ने हैती के मूलनिवासियों के इस मानवसंहार का ज़िक्र कुछ ऐसे किया है – “काम करने की जगह इन लोगों ने या तो ज़हर खा लिया या फिर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।”

स्पेन ने लैटिन अमेरिका की इस लूट की शुरुआत ज़रूर की लेकिन कुछ समय बाद पुर्तगाली और डच (नेदरलैंड या हॉलैंड के) लोग भी इसमें शामिल हो गए। यूरोप के देशों ने दक्षिण अमेरिका के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर बेतहाशा संपत्ति अर्जित की और वहाँ के लोगों का शोषण इस हद तक किया कि आज वहाँ बस नाम भर के ही मूलनिवासी बचे हैं। ब्रिटिश यानि कि इंग्लैंड के लोगों ने यही उत्तरी अमेरिका में किया। 2010 की जनगणना के अनुसार पूरे दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप सहित लैटिन अमेरिका में बस 8% ही मूलनिवासी बचे हैं। इस तरह से केवल 500 सालों में महान यूरोपीय शक्तियों ने ईसाई धर्म प्रचार की आड़ में एक महाद्वीप के 92% मूलनिवासियों की हत्या कर डाली। 

गलियानो के यह किताब पढ़ना शोषण को समझना भी है, हाँ भाषा ज़रूर एक बाधा बन सकती है लेकिन आप अगर अंग्रेज़ी पढ़ पाते हैं तो ‘ओपन वेन्स ऑफ लैटिन अमेरिका’ नाम की इस किताब को पढ़ने का एक प्रयास ज़रूर करें।       

फीचर्ड फोटो आभार: bullisglobalhistoryspain.weebly.com 

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  • सिद्धार्थ, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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