पुरुषवादी समाज से टक्कर लेती सोनिया भील

कार्यकर्ता परिचय

सोनिया भील:

मेरा नाम सोनिया भील है, मेरे पिताजी का नाम स्वर्गीय श्री नारायण लाल है, मेरी माता का नाम कस्तूरी बाई है। मेरे गाँव का नाम केसरपुरा है, जो राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले में है। मेरा गाँव चारों ओर से पहाड़ों से घिरा हुआ है। मेरे परिवार में 5 सदस्य थे। मम्मी, पापा और हम तीन बहनें। मैंने बचपन से ही अपने परिवार में लड़ाई-झगड़े के अलावा कुछ नहीं देखा। क्योंकि मेरे पापा के हम तीन लड़कियाँ हैं। पापा अफीम खाते थे इस वजह से हमारे घर की स्थिति ठीक नहीं थी। हम तीनों के लड़कियाँ होने के कारण आज भी मेरे दादा-दादी, बड़े पापा, चाचा लोग कुछ ना कुछ हमें बोलते ही रहते हैं।

मेरी मम्मी को भी हमेशा ही नीचा दिखाया जाता था, कि तेरी तो लड़कियाँ ही पैदा हुई हैं। हमारा घर कुल्लू, मिट्टी पत्थर व लकड़ियों का बना था जिसमें इंदिरा आवास योजना के तहत छत पर टीन की शीट डाली है। मुझे आज भी याद है कि जब भी कभी बारिश होती थी तो हमारे पूरे घर में पानी भर जाता था। एक-एक रात निकालना हमारे लिए बहुत मुश्किल हो जाता था। अफीम खाने की वजह से पापा ने हमारी सारी बकरियां एक-एक कर बेच दी, जिस कारण हमारे घर की ऐसी हालत हो गई थी कि हमें दो वक्त का भोजन भी नसीब नहीं हो पता था। मुझे आज भी याद है कि कई बार हम भूखे पेट ही सो जाते थे।

हमारे गाँव में कोई स्कूल नहीं था। जब गाँव में एक स्कूल बना, तब मेरी बड़ी बहन ने पांचवी कक्षा तक की पढ़ाई की। लेकिन आर्थिक स्थिति सही नहीं होने के कारण उसने स्कूल छोड़ दिया और घर का काम करने लगी।

हम तीनों बहनों की शादी बचपन में ही कर दी गई। मैंने भी जैसे-तैसे पांचवी पास की। उसके बाद 2 साल तक पढ़ाई छोड़ दी, क्योंकि पापा को टीबी की बीमारी हो गयी थी और इलाज कराने के चलते घर की हालत और अस्थिर हो गई थी। फिर मैंने भी मम्मी के साथ खेतों में काम करना शुरू कर दिया। एक ही साल में मेरे पापा की मृत्यु हो गई। उसके बाद तो घर के हालत और भी बुरे हो गए, क्यूंकी घर में कमाने वाला कोई नहीं था। किसी और का कोई सहारा भी नहीं था। हमारे लिए तो एक ही रास्ता बचा, मज़दूरी करो और खाओ। दो साल बाद, फिर मेरी गाँव की स्कूल टीचर ने मेरा एडमिशन कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय, नाहरगढ़ में कराया। जब मुझे आवासीय विद्यालय में भेजा गया, तो मेरे चाचा ने शराब पीकर बहुत झगड़ा किया। अब तो झगड़ा करना रोज़ का काम सा हो गया। घर की परेशानी की वजह से मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगता था, लेकिन फिर भी जैसे-तैसे मैंने 12वीं पास करके घर का काम व साथ-साथ सिलाई का काम करना शुरू किया। जब कभी भी खेतों में काम होता तो मज़दूरी करने चली जाती थी। इसके कारण मेरी पढ़ाई निरंतर नहीं हुई।

स्वर्गीय श्री खेमराज सर ने फिर से मुझे स्नातक तक दाखिला करा कर पढ़ाया। इस बीच मैंने 6 महीने तक आधारशिला स्कूल, अमरपुरा में बच्चों के साथ काम किया। वहीं पर रहकर मुझे वहाँ के ‘खेतीहर खान मज़दूर संगठन’ के बारे में पता चला और मैं संगठन के साथ जुड़ गई। लेकिन अभी तक, मैं अपने घर पर ही काम कर रही हूँ। इस बीच एक बार नागपुर गयी थी एक शिविर में, यह मेरा पहला शिविर और अनुभव था।

आज भी मेरी माँ को मेरे परिवार वालों ने ज़मीन में हिस्सा नहीं दिया है। परिवार के लोगों का कहना है कि तेरी तो बेटियाँ हैं, क्या करेगी ज़मीन का। बचपन से लेकर आज तक बस हम मज़दूरी करके ही अपना पेट पाल रहे हैं। मेरी माँ ने बहुत तकलीफ़ उठाई है और आज तक भी उठा रही हैं। हमारे घर में ज़मीन को लेकर झगड़ा चल रहा है। ना तो गाँव वाले हमारा साथ दे रहे हैं और ना ही परिवार वाले। वैसे तो बाकी लड़कियों जैसे मेरा भी बाल विवाह हुआ है, लेकिन मैं ससुराल नहीं जाती हूँ, अपनी मम्मी के साथ ही रहती हूँ। मैं अपने हिसाब से अपन जीवन जीना चाहती हूँ।

Author

  • सोनिया, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वह भदेसर गाँव में शुरू हुआ स्थानीय स्कूल- आधारशिला विद्यालय में कुछ समय शिक्षिका रही हैं। सोनिया खेतिहर खान मज़दूर संगठन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम भी कर रही हैं।

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