जसिंता केरकेट्टा:

एक दिन ईश्वर 

मेरी आदत में शामिल हो गया 

अब मेरी आदत में ईश्वर था

जैसे मेरी आदत में तंबाकू 

जिस दिन कुछ लोगों ने मिलकर ईश्वर के ही घर में 

नन्ही बच्ची के साथ दुष्कर्म किया 

बच्ची ने दिल से ईश्वर को याद किया 

मगर वह मंदिर के कोने में खड़ा रहा 

और दुष्कर्म के बाद आदतन उस दिन भी 

लोगों ने सबसे पहले ईश्वर को ही प्रणाम किया 

मजदूर जब अपने अधिकार के लिए उठे 

तो कुछ ईश्वर भक्तों ने उनसे 

हाथ जोड़कर प्रार्थना करने को कहा 

मजदूरों ने कहा अब प्रार्थना का समय नहीं है 

वो जीवन-भर प्रार्थना करते रहे अपने मालिक से 

पर ईश्वर को मानने वाला उनका मालिक बेरह निकला 

वह मजदूरों की नहीं सुनता 

पर यह ज़रूर कहता 

ईश्वर पर भरोसा रखो 

वह देगा इससे भी बेहतर दुनिया 

मगर इस दुनिया में वह

उन्हें उनका हक नहीं देना चाहता   

उस दिन जिस आदमी ने 

प्रार्थना की शुरुआत की 

उसकी प्रार्थना इतनी लंबी और उबाऊ थी

की लोग नींद में डूबने लगे थे 

मगर हिम्मत किसी में न थी की उसे सच बता सके

इस तरह चुपचाप हर बात स्वीकार कर लेना 

मेरी आदत-सी बन गई

जैसे मेरी आदत में मेरा ईश्वर 

जैसे मेरी आदत में तंबाकू 

मुझे अच्छा बने रहने के लिए 

ईश्वर की ज़रूरत थी 

और बुरे कामों के बाद 

बचने के लिए भी ईश्वर का रास्ता 

हत्या और दया 

लूट और दान

सबकुछ साथ-साथ चलता 

मैं उससे दोनों तरह के काम लेता 

इस सच को नकारता हुआ 

की दुनिया में दो तरह के लोग हो सकते हैं

भले या फिर बुरे

और कितनी अजीब सी बात है 

भले और बुरे दोनों ही आदमियों के पास 

एक बात बिलकुल एक सी है 

की दोनों की आदत में

शामिल है एक ही ईश्वर 

यह कविता जसिंता के कविता संकलन ‘ईश्वर और बाज़ार’ से ली गई है।

Author

  • जसिंता केरकेट्टा एक आदिवासी स्वतंत्र पत्रकार और कवि हैं। रांची, झारखंड  की रहने वाली हैं और वह कुरुख / उरांव समुदाय से हैं। कई विदेशी भाषाओं में इनकी कविताओं का अनुवाद किया जा चुका है।

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