गाँव की एक शाम

जसिंता केरकेट्टा: वो लकड़ी ढोकर उतरती है पहाड़ से,उसके पीछे धीरे-धीरे सूरज भी उतरता है।दोनों को उतरते देखती है चुपचाप पहाड़ी नदीऔर उसकी साँसों में

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पहाड़ और सरकार – एक कविता

जसिंता केरकेट्टा: हम नहीं जानते थे कैसी होती है कोई सरकारजन्म लेते और होश संभालते ही हमने देखा सिर्फ़ जंगल और पहाड़हमें बताओ साहब, कैसी

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