समाज की विडंबना

दीपा शुक्ला:

हमारे समाज में किसी बात को लेकर सहमति जताई जाती है तो किसी बात का विरोध। पर मन में ख्याल आता है कि जब समाज में कोई भी गतिविधि होती है तो वो किसी एक व्यक्ति की पहल होती है। अगर उसके नजरिए से देखा जाए तो वो हर बात उसके लिए सही होती है तभी तो वह अपने लिए किसी भी मामले में समाज के सामने अपना पक्ष रख कर उसको समाज को मनाने के लिए पहल करता है। मगर इसी समाज में वो लोग भी हैं जो उस बात का खंडन करते हैं तो क्या वो उस व्यक्ति की तरह नहीं सोचते या वो व्यक्ति सब की तरह नहीं सोचता। अगर दोनों की सोच नहीं मिलती और दोनों ही अपने मन का करना चाहते हैं तो कुछ बातों को लोग क्यों सदियों तक सिर्फ यह सोचकर करते रहते हैं। भले ही उनकी खुशी सहमति ना हो मगर वह ढ़ोते रहते हैं उन आदर्शों को जो इनको उस समय ही मन में डाल दी गई थी कि यही करना है, समाज इसी को मानता है। और हद तो तब हो जाती है जब सब उन बातों को मानते हुए एक ही दिशा में जा रहे होते हैं और उन बातों, आदर्शों का ढिंढोरा पीटने वाले अपने पर और अपने बच्चों पर आने वाले हर उस बात का कटाक्ष करते हुए खंडन कर के उसको सहमति देते हैं जो समाज में आदर्शो का राग अलापते हैं।

तब सब की आँखें खुलती है कि हम जिस दिशा में जा रहे थे उसका तो मुखिया ही गिरगिट निकला। वो चालबाजियाँ करता रहा और हम देख कर भी अनदेखा करते रहे। हमारे समाज में विवाह और पारिवारिक मामलों में आज कल यही हो रहा है। व्यक्तियों और परिवारों से मिल्क बना हुआ समूह जिसे समाज का नाम दिया गया। उन परिवारों में प्रतेक परिवार अपने लिए कुछ और सोचता है और अपने आस पास परिवारों के लिए अलग सोच रखता है। बात खुद पर आये तो मेरा परिवार, मेरे बच्चे, मेरा फैसला..तब कोई कुछ नहीं बोल सकता। और बात जैसे ही किसी पड़ोसी परिवार की आई तो वो समाज का पाठ सिखाने बैठ जाता है। हमारे समाज की ये कैसी विडंबना है….?

यह एक प्रतिनिधि छवि है। फीचर्ड फोटो आभार: मैप्स ऑफ़ इंडिया

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  • दीपा, मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले के छोटे से कस्बे हरपालपुर में निवास करती है। टीचर बनने के सपने को पूरा करने के लिए टी.ई.टी. (TET) परीक्षा की त्यारी कर रही है। उन्हें गाना गाने का शौक है और कढ़ाई और सिलाई से अपने परिवार का आर्थिक रूप से सहयोग करती है।

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