अपने पुरखों की ज़मीन से जबरन विथापित किए जा रहे छत्तीसगढ़ के महासमुंद ज़िले के वनआश्रित समुदाय

मंजुलता मिरी:

मेरा नाम मंजुलता मिरी है। मेरे पति का नाम परसराम मिरी है। मैं दलित समुदाय से हूँ। छत्तीसगढ़ के महासमुंद ज़िले के पिथौरा ब्लॉक के ग्राम पिलवापाली की निवासी हूँ। हम 1980 के पूर्व 3 पीढ़ी से अपनी ज़मीन पर काबिज़ हैं। तब से पिलवापाली में निवास कर, काबिज़ ज़मीन पर खेती कर एवं वनोपज संग्रहण कर अपना जीवन यापन करते आये है। तथा अपनी ज़मीन पर उरद, मूंगफली, धान बोते है और वहीं पर मकान बनाकर रह रह रहे हैं। मेरे परिवार में कुल 7 सदस्य है। 

2000 में आधे लोगों को ज़मीन का अधिकार पत्र मिला है, इन्हीे के पास ज़मीन का नक्षा-खसरा है। 2010 में खेती कर रहे थे तब अचानक एक दिन पिथौरा से फुन्नु सेट (लक्ष्मीचरण अग्रवाल) का एक आदमी आया और घर में घूसकर कहने लगा की घर-ज़मीन बेच दो। तब ग्रामवासीयों ने दबाव डालकर बोले कि हम अपना घर-ज़मीन नहीं बेचेंगे। इसके बाद उनका कहना बंद हो गया। इस बात के कुछ ही दिन बाद उन्होंने हमारे गांव के दो लोगों को अपने साथ में कर लिया। फोन कर किसका कौनसा ज़मीन है पूछकर चले गये। 

2011 में घर-घर जाकर वे सबको बोले कि ज़मीन बेचना है कि नहींं? तब भी ग्रामवासियों का कहना था कि हमें अपनी ज़मीन नहींं बेचना है। इसके बाद फुन्नु सेठ के आदमी डराने-धमकाने लगे और बोले ज़मीन दे दो, हम ज़मीन के अनुसार किसी को 10 लाख, 12 लाख, 15 लाख और 30 लाख देंगे का लालच देकर चले गए । तब भी ग्रामवासी बोले की हम ज़मीन नहीं बेचेंगे। लोगों की अस्वीकृति को देखते हुए उन सेठ के आदमियों ने बाद में लोगों को डरा-धमका कर उनके दस्तखत करवा लिये और ज़मीन के बदले में पैसे भी नहींं दिये। उसके बाद जितना ज़मीन बचा था, उसको अपना ज़मीन बता करके शाम 4 बजे के समय दो-चार लोगों को लेकर के ग्राम वासी के ज़मीन को रातों-रात बेच दिये। ज़मीन को दूसरे गांव के छोटे -छोटे बच्चों के नाम करवा कर रजिस्ट्री भी करवा दिये। 

तब भी ग्रामवासी खेती कर रहे थे। सन 2012 में खेती करने गए ग्राम वासी तो राम कुमार साहु ने कहा आपकी ज़मीन को तो बेच दिये है, फिर क्यूँ खेती कर रहे हो? इस पर ग्राम वासी का जवाब था हम अपने ज़मीन को नहींं बेचे हैं। इसके बाद ग्रामवासी द्वारा ज़मीन के बारे में पता लगाना शुरू कर दिये  कि ज़मीन कौन बेचा? जब एक दूसरे को पूछा गया तो बोले हम ज़मीन नहींं बेचे हैं। कुछ दिन बाद पता चला कि हमारे गाँव के एक-दो लोग थे जो फुन्नु सेठ के साथ मिलकर ज़मीन को बेच दिये हैं। तब तक जिंदल ने धान बेचने के लिए पट्टा भी बनवा लिया था। इसके बाद भी ग्राम वासी अपने-अपने खेत में काम करना बंद नहींं किये। और आज तक भी अपनी ज़मीन में खेती-किसानी कर रहे हैं। तब फाॅरेस्ट गार्ड वाले आये और ग्रामवासियों को बोले कि यह ज़मीन तुम्हारा नहींं है और ये बोलकर घर से जाने के लिए धमकी देने लगे! फारेस्ट गार्ड के साथ हमारे गाँव की वन सुरक्षा समिति व वन विभाग वाले साथ में आते थे और सब के खेतों और घरों में पौधा लगाने बोले। फिर एक दिन वन विभाग वाले आये और बोले कि घर खाली करो यह ज़मीन हमारा है। तब परसराम मिर्री ने कहा हम क्यूँ अपना घर खाली करेंगे, यह घर और ज़मीन हमारा है। 

10 मार्च 2019 में हम लोग फिर सरपंच को फोन कर बताये की वन विभाग वाले हमारे घर तोड़ने की बात कर रहे हैं। तब सरपंच ने अपने हाथ खड़े कर दिए और बोले की मैं कुछ नहीं कर सकता, मेरे बस की बात नहीं है। हम लोग घर में थे, दोपहर 12 बजे मैं खाना बनाना चालू की थी, जब मेरे परिवार को वन विभाग के रेंजर ने गंदा-गंदा गाली दिया अैार घर खाली करने के लिए धमकाया। हम लोग सफाई में बताये भी कि हम तीन पीढ़ी से यहाँ पर रहते-काम करते रहे हैं। आप लोग अभी आकर बोलते हो की यहाँ से हटो, हम यहाँ से नहीं हटेंगे, हम छोटे-छोटे बच्चों को लेकर कहाँ जायेंगे। इसके बाद वन विभाग द्वारा बोला गया कि हमने कहा था क्या कि बच्चा पैदा करो। यह तुम लोगों के बाप की ज़मीन है क्या जो यहाँ पर बसेरा डाले हो? जब वन विभाग घर तोड़ने आये तो सरपंच और गाँव वालों को इसका पता था। जब हमारे घर तोड़ने की बात पर अड़ गए तो हम थाना गए। लेकिन थाने वाले भी हमारी मदद नहीं किये। घर तोड़ने के लिए 4 गाड़ी में वन विभाग वाले आये। महिलाओं के बाल खींचकर घर से उनको निकाल दिये। हम लोगों के साथ मारपीट किये व हमारे घर के सामन को जब्त कर लिये। तब हम लोगों ने मिडीया वाले को बुलाया, और फिर एसडीएम भी आये। तो जाकर वन विभाग वाले बचे हुए लोगो के घर नहीं तोड़े।  इसके बाद मिडिया वाले बिना हमसे कुछ बात किए चुपचाप चले गए। 

किन्तु हम लोग हारे नहीं। फिर से हम लोग पुनः अपनी ज़मीन पर झोपड़ी बनाकर रहने लगे और खेती कर अपना जीवन यापन करने लगे। हम लोगों ने हमारे साथ वन माफिया द्वारा की गयी हिंसा को भूल भी नहीं पाये थे कि 9 अप्रैल 2020 में वन विभाग वालों को वन सुरक्षा समिति के द्वारा खाना व बकरा मार कर, परसराम मिरी के यहाँ पर  खिलाया गया। सब कर्मचारी शराब बहुत ज़्यादा पीये थे और दारू के नषे में दोबारा घर तोड़ने आये। उस समय हम लोग खाना खा रहे थे।  परिवार वाले सब घर के अंदर थे और वन विभाग वाले घर के उपर चड़के, घर तोड़ने लगे। हमारा खाना, बर्तन सभी को फेंका व फिर से हमारे घर को तोड़ा गया । हमें बाल खींचकर मारा गया व पुरूषों को भी मारा गया। घर तोड़ने के बाद वन विभाग वाले बोले कि इस कागज़ पर दस्तखत कर दो कि हम लोग यह ज़मीन छोड़कर अपनी मर्ज़ी से जा रहे हैं। तब हम लोगों ने कहा कि हम दस्तखत नहीं करेंगे, हमारे बच्चों की पुस्तक व अंकसूची दे दो। इस पर वन विभाग वालों द्वारा बोला गया कि दस्तखत करो और अंकसूची ले जाओ। पर हम लोगों ने दस्तखत नहीं किये तो विभाग वाले घर का पूरा समान ले गये। परसराम का एक भाई विडियो बनाया तो वन विभाग वाले उसको गंदा-गंदा गाली दिये और मोबाइल छिनकर ले गये। रेंजर ने फोन के विडियो को डिलीट कर दिया।

हम लोग थाना गए लेकिन हमारी कोई सुनवाई नहीं हुई। हमारे घर का पूरा समान, यहाँ तक की धान को भी ज़ब्त कर पिथौरा ले गए। हमारे छोटे-छोट बच्चे सब रो रहे थे। हमारे साथ इतना हिंसा होने के बावजूद हम वहीं पर ही. खुले आसमान के नीचे बच्चों के साथ रहे। गाँव के कुछ लोगों को दया आयी, तो उन्होंने पका हुआ भोजन दिया जिसे हम सभी मिलकर आधा पेट खाते थे। कभी-कभी भूखा भी सो जाते थे। फिर भी हम लोगों ने अपनी ज़मीन नहीं छोड़ी। बीच-बीच में वन विभाग वाले ज़मीन छोड़ने के लिए दबाव बनाते है। पर हम लोग भी ठान लिए हैं कि भले ही हमारी जान चली जाए लेकिन हम अपनी ज़मीन नहीं छोड़ेंगे। अभी इस ज़मीन पर कुल 12 परिवार अपना घर बनाकर खेती किसानी करते है। 

एक सप्ताह बाद पुलिस आयी लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की गयी। हम लोग एसडीएम ऑफिस गये, वहाँ भी कोई सुनवाई नहीं। हमारे उपर दबाव बनाया जा रहा था की जिंदल को यह ज़मीन बेच दिया गया है, यहाँ पर फैक्ट्री बनेगी। तब हम 12 परिवार ने कहा की हम अपनी ज़मीन नहीं बेचेंगे व फैक्ट्री नहीं बनने देंगे।

वर्तमान परिस्थिति में वन अधिकार कानून के तहत 31 लोगों का व्यक्तिगत दावा फॉर्म भरा गया है। अनुविभागीय अधिकारी के पास भरकर जमा किया गया है। उन्हें दावा भरने के बाद अनुविभागीय अधिकारी को  ज़मीन का चिन्हांकन करने के लिए व वन अधिकार पट्टा देने हेतु गाँव के पूरे 62 लोगों को लाकर अनुविभागीय अधिकारी पर दबाव बनाया गया। गाँव में बैठक कर ग्राम सभा किया गया एवं सभी काबिज लोगों का प्रस्ताव बनाकर दिया गया। साथ में ग्राम सभा प्रस्ताव किया गया है कि जिंदल को यहाँ फैक्ट्री बनाने नहीं देंगें। वन विभाग द्वारा जो तार बंदी किया गया था, उसे तोड़कर हम लोग जीविकापार्जन हेतु महुआ बिन रहे हैं।

ज़मीन हमारी शान और अभीमान है। 
जिंदल और वन विभाग बेईमान है।। 
जल जंगल और ज़मीन, 
ये हो जनता के अधिन।।

ग्राम पिलवापाली के साथियों द्वारा महासमुंद ज़िला के पिथौरा ब्लॉक के अनुविभागीय अधिकारी से मिलकर वनाधिकार कानून के तहत चर्चा किया गया कि -‘‘हमने वन अधिकार कानून के तहत काबिज़ ज़मीन का व्यक्तिगत दावा भरा है, उसका अभी तक ज़मीन का नाप नहीं हुआ है। इसके लिए हमने आपको आवेदन भी दिया है।‘‘ इस पर अनुविभागीय अधिकारी द्वारा बोला गया -‘‘कि जो आपने दावा भरा है उसका वन अधिकार समिति के अध्यक्ष सचिव का साइन लेकर आओ‘‘। तब हम लोगों ने अनुविभागीय अधिकारी से बोला कि आपके पास जो दावा फॉर्म जमा किये है, उसमें वन अधिकार समिति के अध्यक्ष व सचिव का साइन है। तब एसडीएम मैडम द्वारा बोला गया कि कब जमा किये हो तो पावती रसीद दिखाओ। हमने जिस काबिज़ ज़मीन का दावा भरकर जमा किया था, उसकी पावती रसीद को दिखाये तब अनुविभागीय अधिकारी देखकर बोले – ‘‘कि आप लोगों के ज़मीन की नाप जल्द ही की जायेगी, इस पावती का फोटो काॅपी मुझे दे दो।‘‘

वन अधिकार समिति में, ग्राम पंचायत के सचिव को समिति का सचिव बनाया गया है। जब हमने इस बात को क्षेत्र में समुदायों के हकों के लिए काम कर रहे संगठन, दलित आदिवासी मंच से जुड़ी राजिम दीदी को बताया कि ग्राम पंचायत सचिव को वन अधिकार समिति का सचिव बनाया गया है, तो राजिम दीदी बतायी कि यह वन अधिकार कानून के खिलाफ है। ग्राम पंचायत सचिव, वन अधिकार समिति का सचिव नहीं बन सकता। यह जानकार हम लोगों ने इस सचिव को हटाने के लिए एसडीएम अधिकारी, पिथौरा में आवेदन दिया। इसके लिए ग्राम पिलवापाली में विशेष ग्राम सभा रखने के लिए ग्रामीण बैठक भी करे। 

इसके बाद हम वन विभाग के रेंजर अधिकारी से मुलाकात किये और उनसे जवाब मांगे कि हमने काबिज़ ज़मीन का दावा भरकर ज़मीन के नाप के लिए आवेदन दिये थे, उसका अभी तक ज़मीन नाप शुरू क्यों नहीं किया गया है? तो रेंजर साहब द्वारा बोला गया कि “आप लोगों के काबिज़ ज़मीन का चिन्हांकन हमारे द्वारा जल्द किया जायेगा।” अनुविभागीय अधिकारी एवं वन विभाग के अधिकारीयों के पास कई बार आवेदन देने के बाद अभी 12 व्यक्तियों  द्वारा वन अधिकार कानून के तहत व्यक्तिगत दावा भरा गया है और अभी सीमांकन के लिए तैयार हुए है। यह सभी प्रक्रिया में महिलाओं ने बढ़कर भाग लिया है। इस काम में उनके पुरूष साथी द्वारा भी सहयोग किया गया और वे महिलाओं के साथ हर कदम पर साथ रहे है। 

पिथौरा एस.डी.एम. के पास जा कर ज़मीन नाप के लिये 3 पावती ले लिये हैं। फिर भी कुछ नहीं हुआ तब फिर वन विभाग के रेंजर के पास ज़मीन नाप के लिए आवेदन दिये और ज़मीन का चिन्हांकन करने को बोले और पावती दिए फिर भी कुछ पता नही चला। ज़मीन का नाप भी नहीं हुआ। तब वन मंत्री के पी.ए. मनोहर से बात किए फिर जाकर पिलवापाली का ज़मीन नाप करने का आदेश निकाला गया और पटवारी द्वारा ज़मीन का नाप हो गया। संगठन कि ताकत से तारबंदी के अंदर की ज़मीन भी नापा गया। इस लम्बे संघर्ष के बाद शायद अब हम सब गरीब बहुत खुश हैं और आगे आराम से अपनी ज़मीन पर जीवन-यापन कर पायें!

Author

  • मंजुलता, छत्तीसगढ़ के महासमुंद ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वर्तमान में मंजु, दलित आदिवासी मंच के साथ जुड़कर जल-जंगल-ज़मीन के मुद्दों पर काम कर रही हैं।

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