खनन की व्यथा, स्थानीय साथियों की जुबान

युवानिया डेस्क:

बबीता अपने व्यक्तव्य में गेवरा ज़िले में चालू खदानों का क्षेत्र, समाज और समुदायों में प्रभाव पर अपनी बात रखती हैं । लग्भव 50 वर्षों से खनन से प्रभावित, वह दूसरों के जैसे आज तक भी उचित मुआवजे और पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रही है जिसके वे हकदार हैं। हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के साथ भी जुड़ी बबिता वहाँ के स्थानीय आन्दोलनरत आदिवासियों को समर्थन देते हुए सचेत करती हैं कि जिस तरह से वह हशिय पर धकेल दिए गए हैं खनन के चलते, अपने जल-जंगल-ज़मीन-संस्कृति-रोज़गार से कोसों दूर फ़ेंक दिए जा चुके हैं, हसदेव के साथी अपनी लिए वह रास्ता ना चुनें और अपने जंगलों को खनन के हत्थे चड़ने से रोक लें।


हाल ही में नए परसा कोल ब्लॉक और पूर्व संचालित परसा ईस्ट केते बासेन कोल ब्लॉक के दूसरे चरण में खनन की अनुमति हेतु छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा दी गई अंतिम वन स्वीकृति से लगभग 6 हजार एकड़ क्षेत्रफल में 4 लाख 50 हजार पेड़ों को काटा जायेगा l स्वीकृति मिलने के बाद से 10 साल से भी लम्बे चल रहे खनन परियोजनाओं के विरुद्ध में स्थानीय संघर्ष ने तेज़ी पकड़ी l बता दें कि हसदेव अरण्य समृद्ध, जैवविविधता से परिपूर्ण वन क्षेत्र है l इसमें कई विलुप्त प्राय वन्यप्राणी आज भी मौजूद हैl यदि इस क्षेत्र में किसी भी खनन परियोजना को स्वीकृति दी गई तो मानव हाथी संघर्ष की स्थिति को संभालना लगभग नामुमकिन होगा l ग्राम फतेहपुर भी प्रभावित गाँव में से एक है, जहाँ के लोगों को विस्थापित किया जाएगा खनन के चलतेl इस खनन से होने वाले विनाश और प्रभाव के खतरे पर बार-बार प्रकाश डाला जा रहा है l रामलाल अपनी बातचीत में हसदेव के क्षेत्र का एक ब्यौरा देते हैं और कैसे स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों को दरकिनार किया जा रहा है वह भी साझा करते हैंl

विडियो आभार – एनएपीएम: जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय

एनएपीएम पर क्लिक करके आप पूरी बातचीत को सुन सकते हैं

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