अनिश्चितता के घेरे में मज़दूर वर्ग: एक संक्षिप्त इतिहास और कुछ सुझाव

राहुल: 

आधुनिक औद्योगिक पूॅंजीवाद को अपनी स्थापना के समय एक बड़ी समस्या का सामना करना पड़ा – काराखानों में काम करने के लिए श्रमिकों की कमी। मॉंग और आपूर्ति नियम के चलते श्रमिकों की कमी का मतलब है कि इनकी मज़दूरी अधिक होगी। पूंजीपतियों नें सोचा कि इस समस्या का हल निकालने के लिये तो किसानों को खेती से निकालना पड़ेगा। उस समय इंग्लैंड में सामंती प्रथा के तहत, किसान एक सामंत की ज़मीन से बंधे रहते थे। अपनी मर्ज़ी से वे मालिक नहीं बदल सकते थे। पूंजीपतियों ने राज्य की ताकत का प्रयोग करके इस सामंती व्यवस्था को तोड़ा, जिससे बहुत बड़ी संख्या में किसान मुक्त हो गये और उद्योगों के लिये मज़दूर मिल सके। मज़दूरों की संख्या जैसे ही बढ़ गई मज़दूरी की दरें घट गई और इससे कारखाने के मालिकों को फ़ायदा हुआ।

पूॅंजीवादी व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि मांग की तुलना में हमेशा श्रमिकों की संख्या अधिक हो क्यूंकी इस स्थिति में मालिक लोग मज़दूरी की दर को कम कर सकते हैं। रोज़ा लक्ज़ेमबर्ग के अनुसार यह सूत्र, पूॅंजीवाद की एक बुनियादी विशेषता है।

श्रमिकों को जल्द ही अहसास हो गया कि यदि वे अपनी मज़दूरी और काम करने की स्थिति में सुधार लाना चाहते हैं तो उहें पॅूंजिपतियों और उनका साथ देने वाली सरकार के खि़लाफ़ संगठित होना पड़ेगा। हम देखते हैं कि उन्नीसवीं सदी के मध्य तक श्रमिकों के हकों के लिये लड़ने के लिये ट्रेड यूनियनों का उदय हुआ। यूनियनों और सरकार-पूॅंजीपतियों के बीच बहुत से संघर्ष हुए। 4 मई 1886 को अमरीका के शिकागो शहर में मज़दूरों के एक विशाल प्रदर्शन पर सरकार की हिंसात्मक कार्रवाही के चलते बहुत से मज़दूर मारे गये। इस संघर्ष की याद में वहॉं की कम्यूनिस्ट पार्टी ने 1 मई को मज़दूर दिवस के रूप में मनाना शुरू किया। तब से यह दिन मई दिवस के नाम से मनाया जाता है।

इन मज़दूर यूनियनों के मज़बूत संघर्षों के कारण काम की परिस्थितियों को बेहतर बनाने वाले अनेक कानून बने जिनमें न्यूनतम मज़दूरी तय करना, काम के घण्टे सीमित करना आदि भी थे। ये कानून बड़े उद्योगों में तो लागू हुए लेकिन अधिकतर जगहों पर मज़दूरों का शोषण बरकरार रहा, खासकर भारत जैसे देशों में, जहॉं अर्थव्यवस्था का बहुत छोटा हिस्सा ही संगठित क्षेत्र का था। साथ ही, केवल कुछ ही विशेष व्यवसायों को छोड़ कर, जिनमें काम करने की योग्यता वाले लोग कम थे, अधिकांश व्यवसायों के लिये उपलब्ध मज़दूरों की संख्या, मांग से अधिक थी, इसलिये उनकी मज़दूरी की दरें कम ही रहीं।

1990 के बाद से मज़दूर यूनियनों को बड़ा झटका लगा जब अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण की नीतियॉं लागू होने लगीं और कम्प्यूटर व इन्टरनेट का विकास हो गया। इनके कारण यह सम्भव हो सका कि उत्पादन के काम को ऐसी जगह पर करवाया जाये जहॉं मज़दूरों की संख्या अधिक हो व सरकार के नियम ढीले हों क्योंकि ऐसी जगहों पर मज़दूरी कम होगी। विश्व अर्थव्यवस्था के इन बदलावों के कारण उत्पादन कार्य पश्चििमी देशों से बाहर चला गया। भारत जैसे देशों में भी परम्परागत उत्पादन केन्द्रों से यह कार्य दूसरी जगहों पर स्थानान्तरित हो गया। साथ ही अधिकतर उत्पादन केन्द्रों में अस्थायी ठेका मज़दूरों से काम लिया जाने लगा। भारत में मज़दूरों को संगठित न होने देने के लिये प्रवासी मज़दूरों से काम करवाया जाने लगा। उदाहरण के लिये पश्चिम बंगाल के मज़दूरों को वहॉं काम नहीं मिलता था। वे महाराष्ट्र पलायन कर रहे थे काम के लिये और बंगाल में बिहार के मज़दूर आकर काम कर रहे थे। 

भारत में इस समय बहुत बड़ी संख्या में अदृश्य प्रवासी मज़दूर हैं। अदृश्य इसलिये क्योंकि न तो सरकारी रिकॉर्ड में और ना ही उनसे काम करवाने वाले उद्योगों में उनका नाम कहीं लिखा जाता है। उनसे कुछ समय के लिये ठेकेदारों के माध्यम से काम करवाया जाता है और फिर छोड़ दिया जाता है। कारखाने के रिकॉर्ड में कहीं उनका नाम नहीं चढ़ता। 2020 में लॉकडाउन में कुछ समय के लिये प्रवासी मज़दूरों की तस्वीरें पूरे देश नें देखी थी, लेकिन अब फिरसे सब उन्हे भूल गये हैं।

यह सब जो हो रहा है वह पूरे विश्व में चल रहा है, इसलिये मज़दूरों की लड़ाई लगभग असंभव सी होती जा रही हैं। जो भी कम्पनी मज़दूरों के श्रम के शोषण से पूॅंजी संचय के नियम से नहीं चलेगी वह बाज़ार में टिक ही नहीं सकेगी, क्योंकि वह उन कम्पनियों से प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जायेगी जो कम मज़दूरी पर काम करवा रही हैं। सरकारें भी इन कम्पनियों में श्रमिकों के शोषण को नियंत्रित नहीं करना चाहतीं क्योंकि ऐसा करने पर वे अपना कारोबार कहीं दूसरी जगह ले जायेंगी। 

इस तरह हम देख रहे हैं कि स्थितियॉं बहुत बदल गई हैं। अब ऐसा कोई मज़दूर वर्ग नहीं है जिसके पास उसकी नौकरी का आश्वासन हो और उसे केवल अपने काम व मज़दूरी को बेहतर करने के लिये संघर्ष करना पड़ता हो। अब एक ऐसे मज़दूर वर्ग का निर्माण कर दिया गया है जिसके काम की कोई निश्चितता नहीं है और उसके काम की स्थितियां बद से बदतर हो गई हैं। इस अनिश्चितता के कारण वे अ़पनी मज़दूरी बढ़ाने का संघर्ष भी नहीं कर पाते। कम मज़दूरी व काम की अनिश्चितता के साथ, काम के बदलते स्थानों के कारण इनको संगठित करना भी बहुत कठिन हो गया है। संगठन को चलाने के लिये जो धनराशि पहले मज़़दूरों के सहयोग से इकठ्ठा होती थी वह भी अब संभव नहीं हो रहा। संगठन में शामिल होने में उन्हे यह भी डर रहता है कि जो काम मिला है वह भी हाथ से न निकल जाये।

यह काम इस बात से और जटिल हो गया है कि मज़दूर वर्ग की बाज़ार पर निर्भरता बहुत अधिक बढ़ गई है विशेषकर स्वास्थ्य के लिये। साथ ही इस वर्ग में भी चारों तरफ़ की उपभोगवादी संस्कृति को देख कर सामान के लिये आकर्षण बढ़ा है। इन ज़रूरतों और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिये मज़दूर ज़्यादा पैसे कमाने के लिये और लम्बे समय के लिये काम करने को तैयार हो जाते हैं। काम की स्थितियों को बेहतर बनाने और उनके शोषण को रोकने के लिये संगठित होकर लड़ने में उनकी रूचि भी कम दिखती है और रोज़ काम करने की मजबूरी भी। सत्ता वर्ग द्वारा मज़दूरों की एकता को तोड़ने के लिये लगातार उन्हे जाति और धर्म के आधार पर बॉंटा जाता है। दूसरी जातियों व धर्मों के लोगों के खि़लाफ़ सोशल मीडिया पर इतना ज़हर उगला जाता है कि लोगों को अपने हकों के लिये लड़ने के बजाय एक दूसरे के साथ लड़ने जैसा माहौल होता है।

मज़दूरों की इस अनिश्चितता में झूलती ज़िंदगी का एक ही इलाज हो सकता है कि उन्हे सरकार से यूनिवर्सल बेसिक इनकम मिले। पूॅंजीवादी अर्थव्यवस्था की मुक्त बाज़ार की नीतियों के कारण जब 1930 में विश्व अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ठप हो गई थी तब कल्याणकारी पूॅंजीवाद की बात सामने आई। इस व्यवस्था में राज्य नें आम लोगों को मुफ़्त स्वास्थ्य, शिक्षा व बेरोज़गारी भत्ता दिया। हालॉंकि पिछले कुछ दशकों में इन खर्चों को सरकारों ने लगातार कम किया है, लेकिन अभी भी यह सभी अर्थव्यवस्थाओं का हिस्सा है। पश्चिम के देशों में बहुत अधिक है हमारी तुलना में।

क्योंकि पूॅंजीपतियों के मुनाफ़े बढ़ाने का एकमात्र रास्ता श्रम के शोषण का ही है, यह व्यवस्था और मज़दूरों की यह हालत जल्दी नहीं बदलने वाली। इसलिये सरकारों को यह ज़िम्मेदारी उठानी होगी और सभी वयस्कों को, ताउम्र, बेसिक इनकम प्रदान करनी चाहिये। मज़दूर वर्ग को अपनी मज़दूरी बढ़ाने की और तुरन्त की समस्याओं को हल करने की लड़ाइयों में इस दीर्घकालीन मांग को भी शामिल करना चाहिये और इसके लिये सरकार पर दबाव लाना चाहिये। इससे मज़दूर वर्ग की अनिश्चितता की स्थिति में सुधार आयेगा और उसे एक बार फिर संगठित होकर अपने संघर्ष को आगे बढ़ाने की जगह मिलेगी। इसी से उनके काम व ज़िन्दगी की परिस्थितियों में सुधार आयेगा और हम उम्मीद कर सकते हैं कि एक अधिक न्याय संगत व समावेषी सामाजिक आर्थिक व्यवस्था कायम होगी।

अनुवाद आभार: अमित

Author

  • राहुल बैनर्जी पिछले चार दशकों से विभिन्न जन संगठनों के साथ जुड़कर पश्चिमी मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदायों के बीच उनके अधिकार और विकास सुनिश्चित करने के लिए प्रयासरत है। वे शोध एवं जमीनी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन द्वारा प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रख कर किया जाने वाला निरंतर विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सामाजिक, आर्थिक व लैंगिक न्याय के क्षेत्र में कार्य करते है। webpage: https://www.rahulbanerjeeactivist.in/ blog: http://anar-kali.blogspot.com

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