सुमन: 

आज मैं कालू भील से मिलने गई थी तो उसने अपनी कहानी ऐसे सुनाई।

“मेरी कहानी यह है कि मेरा नाम कालू भील है और मैं एक कुम्हार के ईंट भट्ठे पर ईंट बनाने का काम करता हूं। मैं चित्तौड़ ज़िले की भदेसर तहसील के एक गांव, गंगा गुंडा में रहता है। मेरी उम्र 25 वर्ष है और मैं दसवीं पास हूं। मेरी पत्नी का नाम पुष्पा है और माता-पिता का नाम कलाबाई और नंदलाल जी है। हम दोनो पति-पत्नी और हमारी तीन बेटियां प्रतिदिन आठ घण्टे ईंटें बनाने का काम करते हैं। यह ईंट भट्टा हमारे गांव में ही है। सब मिलकर, रोज़ाना 800 ईंटें बनाते हैं। तब जाकर हमें 600 रु मज़दूरी मिलती है। दो बकरियां भी पाल रखी हैं।

हमारे पास खेत नहीं है। मेरे पिता की दो बीघा जमीन थी पर उसके दो हिस्से हो गए क्योंकि हम दो भाई हैं। पिताजी की मित्यु होने पर खेतों को तीस हजार रुपयों के कर्ज के लिए एक राजपूत के पास गिरवी रखा दिया। उसके बाद मेरा बड़ा भाई उस राजपूत से पचास हजार रुपए और उधार लेकर आ गया। उस राजपूत की बहुत सी ज़मीन हैं, कुएं हैं। अब हमारे लिए खेत छुड़ाना बहुत मुश्किल है। जब हम पैसे वापिस करेंगे तब ही खेत छूटेगा। जब तक हम पैसे वापिस नहीं करेंगे वो राजपूत ही खेत में कमाई करेगा। वो किसी और को खेत करने को देता है। उसे मज़दूरी एक तिहाई देता है और खुद दो तिहाई रखता है।

मां बीमार है। उसको टीबी की बीमारी है। मेरे छोटी-छोटी तीन बेटियां हैं। इस मंहगाई में परिवार चलाने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है। मैं और मेरी पत्नी दोनों मज़दूरी करते हैं तब जाकर दोनों वक्त का पेट भरते हैं। मां हमारे साथ ही रहती है। उसका भी दवा-दारू का खर्च होता है। टीबी मरीज़ को सरकार से कुछ मदद मिलती है पर हमें नहीं मिल रही, पर मेरी मां को वृद्धा पेंशन मिलती है। पिताजी का राशन कार्ड है। वहां से महीने में पैंतीस किलो अनाज मिलता है। मेरी पत्नी धात्री है। सबसे छोटी बच्ची को दूध पिलाती है तो उसकी खुराक का भी पैसा सरकार से मिलता है।

मैं पहले एक सोलर की फैक्ट्री में काम करता था। वहां रहता तो अब तक अच्छा कमा रहा होता। पिताजी के मरने के बाद घर की ज़िम्मेदारी आ गई तो वापस आना पड़ा। अब तो कई सालों से भट्टों पर ही काम कर रहा हूं। मैं अपनी लड़कियों को पढ़ाना चाहता हूं पर ये तो ज़िंदगी की पढ़ाई ही कर रही हैं। अभी तो छोटी हैं, आंगनवाड़ी जाती हैं। वहां से इन्हे कच्चा दाल चावल मिलता है। कोशिश करूंगा इन्हे पढ़ने की।”

कालू भील की कहानी सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ कि अब ये जिंदगी भर कर्ज़ चुकाता रहेगा। हो सकता है कि ये बंधुआ मजदूर बन जाए। इसकी बेटियां बहुत प्यारी हैं। उन्हे मैने बिस्कुट दिए तो वे उन्हें पानी में डुबोकर खा रही थीं। कालू बहुत होशियार लड़का है। कुछ कर सकता है। एक बार शिविर में भी गया था, लेकिन घर की परिस्थिति खराब होने के कारण फंस  गया है।

Author

  • सुमन चौहान / Suman Chouhan

    सुमन जी, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं। वह खेतिहर खान मज़दूर शक्ति संगठन और आधारशिला विद्यालय के साथ जुड़ी हुई हैं और कई सालों से आदिवासी बालिकाओं के शिक्षा और स्थानीय मुद्दों पर काम कर रही हैं।

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