खेमलाल खटर्जी:
मैं मज़दूर हूँ,
ज़मीन से आसमान तक मशहूर हूँ।
कभी लकड़ी का कोयला,
तो कभी कोहिनूर हूँ।।
डूबा हूँ मुश्किलों के समंदर में,
तो कभी दुनिया भर की गमो से दूर हूँ।
दूसरों की मंजिल, मैं यू असां कर दूं,
पर खुद की मंजिल से दूर हूँ।
मैं अल्लाह, मैं सिख, मैं भगवान, मैं जीजस ,
इन सबकी मैं तक़दीर हूँ।
अखबार में छपती हेडलाइन हूँ,
तो कभी कूड़े पर पड़ा ढेर हूँ।
किस्मत की लकीर हूँ,
राह चलते फ़क़ीर हूँ ।
किसी की शामत ला दूं,
मैं ही विधानसभा, लोकसभा हूँ।
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खेमलाल ग्रामीण छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं। वह एक ऐसे समुदाय से आते हैं, जहां के लोगों ने, यूपी, ओडिशा या एमपी में, पीढ़ियों से ईंट भट्टों में काम किया है। इन भट्ठों में काम करने वाले लोगों का शोषण का भयानक अनुभव होता है और बंधुआ मजदूरी के रूप में उनकी तस्करी की जाती है। वे स्वयं ऐसे अनुभवों से गुजरे हैं, फिर भी – वे एक कवि हैं, और उनके शब्दों की शक्ति एक गहरा प्रभाव छोड़ती है।

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