भारतीय संविधान और प्रतिष्ठा/गरिमा और अवसर की समता

देवेंद्र:

भारतीय संविधान और प्रतिष्ठा / गरिमा और अवसर की समता का अर्थ –

मानव सभ्यता के इतिहास में समानता का विचार धीरे-धीरे विकसित हुआ है। पहले कबीलों के रूप में रहते हुए, फिर छोटे राज्य/जनपद और फिर बड़े साम्राज्यों से गुज़रता हुआ मानव समाज, समानता के कई रंग देख चुका है। जैसे-जैसे समाज विकसित हुआ समानता/समता के अर्थ बदलते रहे, विकसित होते रहे। तथाकथित जाति के लोग ऊपर आसन पर बैठेंगे और दलित नीचे तब भी हम सब समान है, ऐसा समझा जाता है। राजतंत्र में राजाओं को असीमित अधिकार थे, पर वो भी ये दावा कर सकते थे कि उनके राज्य  में सब समान हैं।

भारतीय संविधान अपनी प्रस्तावना/उद्देशिका में ही अपने नागरिकों के लिए प्रतिष्ठा (गरिमा) और अवसर की समता की बात करता है, और संविधान द्वारा दिये गए मूल अधिकारों में समता का अधिकार सबसे पहला अधिकार है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि भारतीय समाज विषमताओं से भरा हुआ समाज है, जहाँ कई तरह की असमानतायेँ मौजूद थी/हैं। इसलिए ‘समता के अधिकार’ की बात की गयी। जो चीज़ नहीं होती उसे ही देने का वादा किया जाता है। कोई ये नहीं कहता कि सूरज कल से पूरब दिशा में उगेगा या सूरज की रोशनी कल से सभी को मिलेगी, क्यूंकि वो तो निश्चित ही है। पर “समता” के बारे में हम दावे से ऐसा नहीं कह सकते हैं। संविधान निर्माताओं को इस बात का एहसास था, इसलिए समता के अधिकार की बात की गयी।

क्या भारतीय समाज एक असमान, विषमताओं से भरा समाज है? 

स्पष्टत: इसका उत्तर हाँ में ही होगा। हमारी विषमताएं बहूरूपी है। आर्थिक तौर पर अमीरी-गरीबी का अंतर  साफ देखा जा सकता है। सामाजिक तौर पर जाति प्रथा असमानता का सबसे बड़ा उदाहरण है। महिला-पुरुष असमानता से भी हम सब परिचित हैं। ये असमानताएँ राजनैतिक असमानता का रूप ले लेती हैं। अब चुने गए प्रतिनिधि अधिकतर अमीर, पुरुष और उच्च जाति के होते हैं। ये कारण आज़ादी के समय भी मौजूद थे और अंबेडकर जैसे व्यक्तियों ने इसे भोगा था, इसलिए भारतीय संविधान में “समानता के अधिकार’ की बात विस्तृत रूप से की गयी है, सबसे पहले की गयी है। भारतीय समाज भी अन्य समाजों की तरह पुरुष प्रधान समाज रहा  है और देश दो बड़ी असमानताओं – जातिगत भेदभाव व पितृसत्तात्मक समाज से गृहस्त है। आज से  70-80 वर्ष पूर्व, असमानता और भी गंभीर थी इसलिए संविधान में इसके निराकरण की बात की गयी है।

समता/समानता का अधिकार क्या है ?

हमारे संविधान की प्रस्तावना में ही प्रतिष्ठा (गरिमा) और अवसर की समता की बात की गयी और फिर संविधान के तीसरे भाग में नागरिकों के मूल अधिकारों का विवरण है, जो धारा (Article) 12 से धारा 35 तक मौजूद है। जैसा कि हम जानते हैं, मूल अधिकार भारतीय संविधान की आत्मा माने जाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय कई बार ऐसे फैसले दिये है जिनमें ये कहा गया है कि मूल अधिकार संविधान का मूल स्वरूप है, जिनमें छेड़छाड़ या बदलाव नहीं हो सकता। मुख्य मूल अधिकार में समता का अधिकार (आर्टिकल/धारा – 14,15,16,17 &18); स्वतंत्रता का अधिकार (आर्टिकल/धारा – 19, 20, 21, 22); शोषण के विरुद्ध अधिकार (धारा – 23, 24); धर्म की स्वतंत्रता (धारा – 25, 26, 27, 28) व अन्य अधिकार शामिल हैं।

रोमन साम्राज्य में शासन के लिए दो उक्तियाँ प्रचलित थी, एक थी – Rex is Lex यानि राज्य ही कानून है या जो राजा कहे वो कानून है। इसमें शासन करने वाले को असीमित अधिकार मिल जाते थे। इसे सरल भाषा में Rule by Law (शासक का राज) कहते है। दूसकी उक्ति थी – Lex is Rex  यानि Rule of Law (कानून का राज) इसमें राजा या प्रजा, सबके लिए एक कानून था और कानून के सामने सब बराबर थे। यह एक नयी अवधारणा थी। सन 1215 ईस्वी में इंग्लैंड में एक महत्वपूर्ण घटना हुई। वहाँ के राजा जॉन ने एक प्रप्रत्र जारी किया जिसे हम मेग्नाकार्टा के नाम से जानते हैं। इसमें पहली बार यह माना गया कि राजा कानून से ऊपर नहीं है और कानून के सामने सब बराबर हैं।

भारतीय संदर्भ में भी जब राजाओं का राज था तो राजा कानून से ऊपर थे, लेकिन स्वतंत्रता के बाद संविधान में स्पष्ट रूप से यह अधिकार दिया गया कि हमारे देश में विधि (कानून) का राज है और कानून के सामने सब बराबर हैं। यही समता का अधिकार है – विधि (कानून) के समक्ष समता (धारा-14) भारत के किसी भी नागरिक/व्यक्ति को उसकी जाति, धर्म, लिंग, नस्ल, जन्मस्थान के आधार पर कानूनी भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ेगा, न ही सरकारी नौकरियों, सार्वजनिक स्थलों पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। इसी के तहत छुआछूत को कानूनी तौर पर समाप्त किया गया (धारा-17) और राजाओं/महाराजाओं की उपाधियों को धारा-18 से समाप्त कर दिया गया। (ये अलग बात है कि भारतीय समाज अभी भी उन्हें राजा/रानी कह कर ही संबोधित करता है।)

अवसर की समता का क्या अर्थ है ?

संविधान में कानून के समक्ष, समानता का अधिकार है पर संविधान निर्माताओं को अपने व्यक्तिगत अनुभवों से ये पता था कि हमारे देश में दलितों/आदिवासियों/अल्पसंख्यकों और महिलाओं को जीवन के समान अवसर उपलब्ध नहीं हैं। पुरुषों के कॉलेज जाने की संभावना महिलाओं से अधिक है; किसी सवर्ण के सरकारी नौकरी में चयन की संभावना एक दलित से कई गुना अधिक है। यही बात धार्मिक रूप से अल्पसंख्यकों के बारे में भी सही है। इसलिए उन्होंने अवसर की समता का ज़िक्र किया और उसके लिए कुछ नियम बनाए/प्रावधान किए। आरक्षण उन्ही में से एक प्रावधान है। ऐसा इसलिए किया गया ताकि हमारे समाज में हज़ारों सालों से जो लोग दबे-कुचले हैं, वो आगे आ सकें, इसी को हम सामाजिक न्याय कहते हैं।

प्रतिष्ठा (गरिमा) का समता से क्या रिश्ता है?

विभिन्न जातियों/धर्मों/भाषा-भाषियों में बंटे हमारे समाज में किसी व्यक्ति का समान अवसर उसकी जाति/धर्म/आर्थिक संपन्नता से तय होता है। होना यह चाहिए कि सभी नागरिकों को एक समान गरिमामय (प्रतिष्ठा युक्त) अवसर मिलना चाहिए। ऐसे तभी संभव है जब समाज में कई तरह की विषमताओं के जो स्तर हैं, उन्हें सामाजिक/राजनैतिक तौर पर खत्म किया जाए। सिर्फ “समता का अधिकार” होने से समस्या हल नहीं होती, समता के साथ सम्मान/ प्रतिष्ठा भी उतनी ही ज़रूरी है। इसलिए संविधान की प्रस्तावना में प्रतिष्ठा/गरिमा और अवसर की समता की बात की गयी है इसी कारण से जिनके सम्मान/गरिमा को हमारे समाज में सर्वाधिक ठेस पहुंचाई जाती है। उनकी गरिमा/प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए संविधान/देश के कानून में कई प्रावधान हैं – एससी/एसटी एक्ट धारा 3 उसी का एक उदाहरण है।

संविधान में प्रावधान होने मात्र से क्या समाज में बदलाव आया है ?

ये तो निश्चित है कि हमारा समाज अभी भी विषमताओं से भरा समाज है, पर कानून इस विषमता को जायज नहीं ठहराया जा सकता। कोई यह नहीं कह सकता कि जाति/धर्म के आधार पर अदालत अपराध का निर्णय किया जाएगा। आज़ादी के बाद से बहुत से बदलाव हुए है, इसके लिए दलितों/आदिवासियों को बहुत संघर्ष करना पड़ा है, बलिदान देना पड़ा हैं। बहुत काम होना अभी बाकी है और बहुत सा काम हुआ भी है यह हमे मानना होगा।

दुनिया के कई अन्य देशों में भी इस तरह कि विषमताओं/असमानता का इतिहास रहा है। दक्षिण अफ्रीका में रंग भेद/नस्ल भेद के आधार पर भीषण अत्याचार हुए। अमेरिका में रंग के आधार पर काले लोगों पर गुलामी का इतिहास बहुत पुराना है। लेकिन हर जगह इंसान ने अपनी गरिमा/अपना सम्मान से जीने के अधिकार के लिए संघर्ष किया है।

यही, किसी भी कानून/संविधान की सीमा भी है। जो दलित हैं, समाज के निचले पायदान पर हैं/गरीब हैं, संविधान उनके लिए माध्यम, उपाय हो सकता हैं, लेकिन बिना संघर्ष के मानवीय गरिमा हासिल करना असंभव है।  

फीचर्ड फोटो आभार: indialegallive.com

Author

  • देवेंद्र, राजस्थान के झालावाड़ ज़िले के झिरी गाँव में रहते हैं। वह सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं, और अपने गाँव में हम किसान संगठन का संचालन करते हैं साथ ही एक वैकल्पिक स्कूल मंथन शिक्षण केंद्र भी चलाते हैं।

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