वैक्सीनेशन सर्वे के दौरान हम फ़ैज़ाबाद की लड़कियों के अनुभव:2

विनीता:

जिंदाबाद साथियों मेरा नाम विनीता है मैं पहाड़गंज की रहने वाली हूं और अवध पीपुल्स फोरम के साथ लंबे समय से किशोरियों के स्वास्थ्य पर काम कर रही हूं। सर्वेक्षण करते समय कई नए इलाकों में मेरा जाना हुआ, जहां पहले मैं कभी नही गई थी, मुझे पता भी नही था कि इन इलाकों में लोगों की क्या स्तिथि है।

सर्वेक्षण के दौरान मैं ऐसे 7-8 मोहल्ले में गई जहां किशोरियों के पास सैनिटरी पैड डिस्पोज करने के लिए साधन नहीं हैं, जिसके कारण वो सैनिटरी पैड को काली पन्नी में डालके नालियों में फेक देती है। न केवल ये उनके स्वास्थ्य के लिए नुकसान दायक है बल्कि पूरे इलाके में पानी भराव का कारण बन जाता है। किशोरियों को सही डिस्पोजल सीखने और मासिक धर्म पर जागरूक करने की ज़रूरत है।

इकरा:

जिंदाबाद साथियों मेरा नाम इकरा है, मैं 100% वैक्सीन अभियान में सीएचडबल्यू के पद पर हूं और 10 लोगों की टीम के साथ काम कर रही हूं। मेरी टीम की सभी साथी किशोरियाँ है और उनके साथ काम करने में काफी मजा आया, काफी नया अनुभव था। पहले कभी इतने लोगों के साथ काम करने का मौका नहीं मिला था, पर अभियान के दौरान मुझमें नेतृत्व भाव और मजबूत हुआ है, अब लगता है कि लड़कियां सच में खुद सब कुछ मैनेज कर सकती हैं।

अभियान में काफी सामाजिक गैरबराबरी देखने को मिली। मैं अवध पीपुल्स फोरम के साथ बच्चों को अपने समुदाय के सेंटर में पढ़ाने का काम करती थी। अभियान के दौरान ऐसे कई बच्चे देखे जो पढ़ाई नहीं कर पा रहे, क्यूंकी उनके माँ-पापा आर्थिक तरीके से कमज़ोर हैं। ऐसे बच्चों के साथ मैं सेंटर चला सकती हूं और उनको स्कूलों से जोड़ना चाहती हूं। बच्चों का सपना होता है कि वो नई चीजें सीखें, खूब पढ़ें-लिखे, ये सपना मेरा भी था और ये सपना पूरा करने के लिए मैं टीम के साथ काम करूंगी।

कुसुम:

मैं वैक्सीनेशन कैंपियन में सीवी के पद पर हूं और नवंबर माह से ही टीकाकरण करवाने में लोगों की सहायता कर रही हूँ। मैं 58 साल की हूँ और मेरी कई सारी दवाइयां चल रही है। जब मैं काम नहीं कर रही थी तब मेरे परिवार पर आर्थिक दबाव बहुत ज़्यादा हो गया था और मेरी दवाइयां लेने के लिए भी मेरे पास पैसे नहीं होते थे। पिछले 4 महीनों में मैं अपनी दवाइयां पूरी तरह से ले पाई हूं, क्योंकि मुझे ₹3000 टीकाकरण चैंपियन से मिल पाए। मेरे साथ के लोगों ने अपने लिए मोबाइल फोन भी लिए जो शायद वह बिना सहयोग के कभी ना ले पाते। अच्छा लगता है जब अपने पास कुछ पैसे हों और अपने कामों पर लगाए जा सके। मेरे साथ की दो लड़कियों ने अपने स्कूल की फीस भी टीकाकरण अभियान में मिल रहा है पैसों से जमा कर दी। महिलाओं को फैसले लेने की आज़ादी तभी मिल पाती है जब उनके पास जेब में कुछ पैसे पड़े हो। मैं आगे भी समाज कल्याण के लिए अवध पीपल्स फोरम के साथ काम करती रहूंगी और मेरी कोशिश होगी कि मैं खुद और मेरी घर की महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त कर सकूं।

नुजहत/इरम:

आदाब मेरा नाम नुजहत/इरम है, मैं घोसियाना की रहने वाली हूं और अवध पीपुल्स फोरम के साथ स्वास्थ्य की कार्यशाला में पहले जुड़ती रही हूं। अभी टीकाकरण करवाने में समुदाय के सदस्यों को सपोर्ट कर रही हूं। सर्वेक्षण करना मेरे लिए पहला मौका था इतने लोगों से मिलने का और उनको बेहतर तरीके से जानने का। इसी दौरान मैंने ये देखा की जिन घरों में छोटे बच्चे ज़्यादा हैं, उनके घरों में लड़कियां काफी कमज़ोर थी। शायद उनको पौष्टिक भोजन नहीं मिल पा रहा था, इस कारण वो ज़्यादा बीमार दिख रही थी। ऐसा काफी घरों में मैने देखा कि लड़कियां बीमार थी और उसके बाद भी वो ही पूरे घर का काम कर रही थी। मुझे ये देख कर लगा कि इन समुदायों में भी डाइट मैनेजमेंट का काम होना चाहिए, सस्ते तरीके से पौष्टिक आहार कैसे ये लड़कियां ले पाए, इस पर काम किया जाना काफी ज़रूरी है।

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