अमित:

चित्तौड़ ज़िले के राणा पूंजा भील, महाराणा प्रताप के प्रमुख सेनापति थे। वे राज्य के लिए इतने महत्वपूर्ण थे कि राणा प्रताप के राज्यचिह्न पर राणा पूंजा की छवि अंकित कर के उन्हे अमर कर दिया गया। इस बात से राणा प्रताप ने, न केवल राणा पूंजा भील, बल्कि पूरे भील समुदाय के प्रति अपने सम्मान और कृतज्ञता को दर्शाया था। 

पूरे राजस्थान में एक समय भील राजा थे। कोटा में कोटिया भील, बांसवाड़ा में बंसिया भील, उदयपुर में उदिया भील, डूंगरपुर के डूंगरिया भील आदि। लेकिन आज उसी चित्तौड़ ज़िले के भीलों की स्थिति बहुत ही दयनीय है। गौरवशाली और संघर्षशील भील मुखियाओं ने सत्ता छिनने के बाद दूसरे शासकों की गुलामी नहीं स्वीकारी। उन्होने पहाड़ों जंगलों में रहना पसंद किया, बजाय दूसरों की गुलामी में रहने के। धीरे-धीरे पूरे इलाके में राजनैतिक सत्ता भीलों के हाथ से सवर्ण जातियों के हाथों में चली गई। बाद में मुग़लों और अंग्रेज़ों के हाथ। इसी के साथ भीलों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति खराब होती गई। खेती व दैनिक खर्चों के लिये साहूकारों और सवर्णों से कर्ज़े लेने पड़े। अनाप शनाप ब्याज के कारण बहुत से लोगों को अपनी ज़मीनों से हाथ धोना पड़ा, ज़मीनों को गिरवी रखना पड़ा या वे बंधुआ मज़दूर बन गये। सालों साल तक यह प्रक्रिया चलते हुए आज भीलों के पास बहुत कम ज़मीन है। अधिकतर लोग कर्ज़े मे डूबे हैं और देश के सबसे गरीब लोगों में से एक हैं।

इन्हीं में से एक भील परिवार की ज़मीन के लिये चल रहे संघर्ष की कहानी आपको सुना रहे हैं। ओंकार जी भील के पड़दादे अरनिया गॉंव में रहते थे। राजा के ज़माने में इस इलाके की ज़मीन एक ब्राहमण को जागीरी में मिली तो वो कमाई के लिये गॉंव बसाने लगा। तरह-तरह के लोगों को उन्होने लाकर बसाया। लोहे के काम करने वालों को लाया, लकड़ी के काम करने वालों को, कुम्हार आदि को लाकर बसाया। गॉंव की देवी, माताजी को केवल भील पूजते थे। इनके बाप-दादा को गॉंव देवी को पूजने के लिये लाया। साथ ही नाइक परिवारों को लाया जिनका काम था गॉंव की रखवाली करना, खबरें देना आदि। इन लोगों को बसाने के लिये कुछ ज़मीनें दी गई, जिससे ये लोग अपने परिवार का पालन पोषण कर सकें। परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता रहा लेकिन और ज़मीन गॉंव से नहीं मिली।

फिर इनके दादा जी, श्री केला बा को पास के गॉंव उमेदपुरा वाले लोग बुला कर ले गये, क्योंकि उनके गॉंव के पुजारे के शरीर में माता जी नहीं आती थीं। वहॉं उन्हे थोड़ी ज़मीन दी। अरनिया में भी परिवार बढ़ गया था तो इनके दादा उमेदपुरा चले गये। जैसे-जैसे परिवार बढ़ते गया, उतनी सी ज़मीन में पूरा नहीं पड़ता था और ये लोग इधर-उधर मज़दूरी करने लगे और साथ ही खेती की ज़मीन ढूॅंढने लगे।

इनके पुराने गॉंव में बहुत सी चरनाई की ज़मीनें थीं। जब इन लोगों नें देखा कि गॉंव के सभी ब्राह्मण, राजपूत व अन्य लोग उन ज़मीनों पर कब्ज़ा कर के खेती कर रहे हैं तो लगभग दस साल पहले इन लागों नें भी लगभग 20-25 बीघा ज़मीन पर खेती करना शुरू कर दिया और कच्चे मकान बना लिये। कुछ उमेदपुरा में ही रहकर यहॉं खेती करते। यहाँ पर इन लोगों नें सिंचाई का भी साधन कर लिया। कुल मिलाकर करीब 53 परिवार ऐसी ज़मीनों पर खेती कर रहे हैं, जिनमें से पॉंच छः परिवार भीलों के हैं। यह उपजाऊ ज़मीन है और इन खेतियों के कारण ओंकार जी और अन्य भील परिवार की स्थिति थोड़ी सुधर गई।

गॉंव के उच्च जाति के लोगों को यह बात अच्छी नहीं लगी। ओंकार जी की पत्नी ने बताया कि बड़े लोगों को हमारे खेतों में लगे गेहूॅं के ढेर अच्छे नहीं लगते। वे लोग ही गॉंव के मुखिया हैं। सरपॅंच भी उन्ही के लोग हैं और इनकी सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों से भी अच्छी जान पहचान है।

कुछ समय पहले दो गाड़ी पुलिस, जिसमें एक गाड़ी महिला पुलिस थी, इनके खेतों पर आई। इन लोगों के कहे अनुसार साथ में तहसीलदार, पटवारी, सरपंच, सचिव व बहुत से गॉंव वाले भी थे। करीब 70 पुलिस कर्मी थे। दो बुलडोज़र साथ लाये थे। उन्हे देखकर ये लोग वहॉं से भाग गये। उन्होने इनसे अपना सामान निकालने को कहा लेकिन ये लोग वहॉं से भाग गये। कर्मचारियों और पुलिस बल ने बुलडोज़रों की मदद से इनके झोपड़े गिरवा दिये। खेत में सिर तक उॅंची मक्का और जुवार की फ़सल खड़ी थी। उस पर भी बुलडोज़र चला दिया। पॉंच भील परिवारों के घर तोड़ दिये गये। इनका कहना है कि इनके पास कुछ सरकारी नोटिस हैं, जिनसे पता चलता है कि ये दस साल से यहॉं रह रहे हैं। 

इन लोगों नें यह भी बताया कि झोपड़े तोड़ने के बाद इनके सामान में आग लगा दी गई। जिसमें इनके बिस्तर, अनाज, सूखा गोबर आदि सामान नष्ट हो गया। 

ओंकार जी, भगवती जी, जमना बाई, नरेश, पप्पू, दुर्गा आदि भील लोगों को समझ नहीं आ रहा कि इनको ही बेदखल करने के लिये पुलिस क्यों आई, जबकि पचास से अधिक अन्य लोगों ने भी सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा कर रखा है? वहॉं के स्थानीय वकील नें बताया कि पॉंच साल से अधिक समय से यदि कोई सरकारी ज़मीन पर खेती कर रहा है तो उसे बेदखल नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद प्रशासनिक कार्रवाही क्यों की गई?

प्रशासनिक कार्रवाही के बाद इन लोगों नें भील समाज की ही श्रीमती नारायणी भील व अन्य लोगों की मदद से इस घटना के बारे में वरिष्ठ अधिकारियों व आदिवासी आयोग को अवगत करवाया। शायद इस सब के कारण कुछ समय के लिये मामला ठण्डा पड़ गया और ये लोग अपने खेतों पर वापिस आकर खेती करने लगे। लेकिन अभी हाल में फिर से कुछ लोग बुलडोज़र लेकर आये और इनके खेतों के किनारे एक नाली खोद कर चले गये। अब इनसे कहा जा रहा है कि यहॉं एक छोटा तालाब बनना है जिसमें इनकी ज़मीनें डूब में आयेंगी और इन्हे हटना पड़ेगा। इन लोगों के पास बहुत कम ज़मीनें हैं और ये चिंतित हैं कि इतने सालों में मेहनत से संवारी गई खेती के चले जाने के बाद ये कैसे जीवन-बसर करेंगे।

पूरे इलाके में बहुत से भील हैं जिनके पास ज़मीनों पर कब्ज़े हैं, लेकिन सरकारी कागज़ नहीं हैं। पूंजीवादी विकास के मॉडल के चलते इलाके में जैसे ही सड़कें बन रही हैं, शहर का विस्तार होता है, फ़ैक्टिरियॉं लगती हैं तो इन ज़मीनों की कीमत बढ़ती है और भीलों की इन ज़मीनों पर बड़े लोगों की नज़रें गड़ जाती हैं और वे इन्हे हथियाने में लग जाते हैं।

भीलों को ज़मीनें दिलवाने के लिये नारायणी जी अपने खान मज़दूर संगठन व राणा पूॅंजा भील समिति के माध्यम से संघर्षरत हैं और इन्हे पूरा भरोसा है कि इनका संघर्ष सफ़ल होगा।

फीचर्ड फोटो प्रतीकात्मक है। फीचर्ड फोटो आभार: हिंदुस्तान टाइम्स

Author

  • अमित, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में एक वैकल्पिक शिक्षा के प्रयोग पर शुरू हुआ स्थानीय स्कूल – आधारशिला शिक्षण केन्द्र चलाते हैं।

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One response to “भील समुदाय की ज़मीन की लड़ाई – चित्तौड़गढ़, राजस्थान”

  1. Dharm Chand Avatar
    Dharm Chand

    ज़िंदाबाद

    राजस्थान में भील समुदाय ST ट्राइबल ओर इनको आरक्षण भी बहुत ज्यादा है, वही राजस्थान में मीणा समुदाय में भी ST में ही आता है पर भीलों की आर्थिक स्थिति खराब होने कारण आज भी लोग भूमिहीन है, कर्ज में डूबे हुए है।

    जिसके कारण वह अच्छे से पढ़ाई लिखाई नही कर पाते और उनको मिले आरक्षण का फायदा नही ले पा रहे है।

    वही दूसरी ओर मीणा समुदाय जो किसी समय मे चोरी, डकैती का काम किया करते थे आजादी के समय उनके ऊपर *जरायम कानून* लगा हुआ था उसके बाद जैन मुनि ने संगर्ष कर के इस कानून को हटा दिया।।।
    मीणा समुदाय की आर्थिक स्थिति बढ़िया होने के कारण राजस्थान के Non TSP एरिया के ST कोटे के सारे आरक्षण का लाभ मीणाओ ने उठाया है और अधिकतर लोग अच्छे सरकारी पद पर कार्यरत है।

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