‘काफल पाको, मिन नी चाखो’ उत्तराखंड की एक मार्मिक लोककथा

महिपाल:

चैत का महीना शुरू होने वाला है और इन दिनों उत्तराखंड के जंगलों में काफल का फल पकने को तैयार है। काफल पर एक प्रसिद्ध गाना भी बना है – बेडू पाको बारा मासा नारयणी काफल पाको चैता मेरी छैला। आप अगर इस समय में उत्तराखंड जाएंगे तो आपको पहाड़ों में सड़क के किनारे इसके पेड़ देखने को मिल जाएंगे या छोटे-छोटे बच्चे आपको सड़क के पास काफल बेचते नज़र आएंगे। 

एक कहानी आज एकाएक मेरे जेहन में आई, जिसे हम बचपन से अपने घर के बड़े-बुजुर्गों से सुनते आए हैं। जब भी काफल का मौसम आता है तो यह आम मान्यता है कि उसके साथ दो चिड़ियाओं का भी आगमन होता है, एक चिड़िया कहती है कि काफल पाको मिन नी चाखो (काफल पाक गए लेकिन मैंने नहीं चखे) तो दूसरी चिड़िया कहती है- पता च बेटी, पता च (पता है बेटी, पता है)

ये बस एक कहानी है या सच्ची घटना है, इसकी सत्यता का मेरे पास अभी तक कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन जब भी यह कहानी कभी पढ़ता हूँ या इस गाने को जब भी सुनता-देखता हूँ, तो मन दुखी सा हो जाता है। हर बार रोना आ जाता है।

यह गढ़वाली गीत सुनने में जितना अच्छा है, इसकी कहानी भी उतनी ही मार्मिक है। उत्तराखंड में एक लोक कथा प्रचलित है कि उत्तराखंड के एक गांव में एक गरीब महिला और उसकी बेटी रहती थी। उस महिला के पास आजीविका के लिए थोड़ी-सी ज़मीन के अलावा कुछ भी नहीं था। एक बार वह महिला सुबह ही जंगल जाकर एक टोकरी भरकर काफल तोड़ लाई। उसके बाद उसने अपनी बेटी को नींद से जगाया और कहा कि धूप आने लगी है, मैं खेत से गेहूं काट कर आती हूँ, तब तक सिलबट्टे में नमक पीसकर तैयार रखना। फिर हम दोनों साथ मिलकर काफल खाएँगे। सुनकर, उसकी बेटी उसे कहती है- माँ कल रात से कुछ भी नहीं खाया है, मुझे बहुत तेज़ भूख लग रही है। कुछ काफल मुझे खाना है। लेकिन उसकी माँ उसे मना करके, गेहूं काटने खेत में चली जाती है। 

माँ की बात मानकर बच्ची दोपहर तक इंतज़ार करती है।  इस दौरान भूख के कारण कई बार उन रसीले काफलों को देखकर बच्ची के मन में लालच आया। पर माँ की बात मानकर वह खुद पर काबू कर बैठी रही। दोपहर काफ़ी देर बाद जब उसकी माँ घर आई तो उसने देखा कि टोकरी में काफल कम हैं। सुबह से ही काम पर लगी माँ को ये देखकर बहुत गुस्सा आता है। वह अपनी बेटी से कहती है- मेरे मना करने के बाद भी तूने इसे क्यूँ खाया। इस पर उसकी बेटी उसे कहती है कि मैं अपने मरे हुए पिता की कसम खाती हूँ, मैंने इसेमें से एक काफल चखा तक नहीं। इस बीच माँ गुस्से में अपनी बच्ची को ज़ोर से धक्का देती है। बेटी को धक्का इतना तेज़ लगा कि वह बेसुध होकर नीचे गिर जाती है। तभी उसकी माँ उसे काफ़ी देर तक हिलाती है लेकिन तब तक उसकी बेटी की मौत हो चुकी थी। 

मां अपनी औलाद की इस तरह मौत पर वहीं बैठकर रोती रही। इधर शाम होते-होते काफल की टोकरी फिर से पूरी भर गई। जब उस महिला की नजर टोकरी पर पड़ी तो उसे समझ में आता है कि दिन की तेज  धूप और गर्मी के कारण काफल मुरझा गए और शाम को ठंडी हवा लगते ही वह फिर ताजे हो गए। अब मां को अपनी गलती पर बेहद पछतावा हुआ और वह भी उसी पल सदमे से गुजर जाती है।

ये कहानी हमारे राज्य की एक लोक कथा भर नहीं है बल्कि यह कहानी राज्य की आर्थिक स्थिती को भी दर्शाती है। ये एक कहानी है या सच, वह तो हमको तय करना है। यह कहानी उत्तराखंड के पर्वतीय इलाके में कठिनाई भरे जीवन की व्यथा बताने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी है।

Author

  • महीपाल, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

One comment

  1. बढ़िया कहानी। इसमें चिड़ियाओं का क्या रोल है? इन चिडियों का नाम क्या है?

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