झारखंड की दलमा पहाड़ी से शुरू हुई मेरी सामाजिक कार्यकर्ता बनने की यात्रा

कुमार दिलीप:

दलमा पहाड़ के तराई में जंगल-झाड़ियों के बीच बसा हमारा गाँव है – बोंटा! वन में बसने के कारण इस गाँव का क्षेत्रीय नाम ‘‘बंटा’’ है। हमारे गाँव से प्रखण्ड मुख्यालय- बोड़ाम, 13 कि.मी. उत्तर तथा ज़िला मुख्यालय दक्षिण की ओर 17 किमी. दूर जमशेदपुर शहर में है। गाँव में कुल 13 टोले हैं जिनमें से एक का नाम शासनकोचा है। इसी टोले में मेरा नानी/नाना (खेन्ति महतो/लखु महतो) तथा मामी/मामा (जीरा महतो/नित्यानन्द महतो) का घर है। मामा के एकलोता एवं छोटा होने के कारण मेरी मां (आलोमनी महतो) को शादी के बाद भी नाना घर में रहना पड़ा। जबकि हमारा पैतृक गाँव माधवपुर है जो प्रखण्ड मुख्यालय बोड़ाम से 7 किमी. उत्तर में है। 

सन् 1983 में अकाल से तत्कालिन बिहार में काफी प्रभाव पड़ा। अकाल के बाद सन् 1984 में मेरी मां- आलोमनी महतो तथा पिता- अर्जुन चन्द्र महतो ने नाना के घर से अलग रहने का निर्णय लिया। उसी गाँव में गैर-मजरूआ जमीन को साफ करके उन्होने एक छोटी सी लकड़ी का झोपड़ी बनाई। लकड़ी से बनी झोपड़ी को हमारे यहाँ काठाड़ बोला जाता है। माता-पिता साथ में तीन पुत्र (सुबल चन्द्र महतो, सुकदेव महतो, सनातन महतो) तथा एक पुत्री (राधारानी महतो) उस काठाड़ घर में रहने लगे। 

सन् 1984, जून 16 (बग्ला में – 01 आषाढ़ 1391) में मेरा (दिलीप कुमार) जन्म हुआ, परंतु दस्तावेज में यह 13 मई 1988, अंकित है। 1991 में 7 वर्ष के उम्र से मैंने स्कूल जाना प्रारंभ किया। पैतृक गाँव में 1 वर्ष बाग्ला माध्यम से पढ़ाई की, इसके बाद पढ़ाई छोड़कर हम वापस बोंटा आ गये और 1 वर्ष तक गाय, बकरी चराते रहे। फिर 1993 में पुनः पढ़ाई शुरू की। गाँव के कई टोला में बंटे होने और स्कूल तक पहुंच पाने का पथ न होने के कारण हम 4 किमी. दूर हलुदबनी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने जाते रहे। साथ में हमसे छोटा भाई जितेन्द्र नाथ महतो एवं बुद्देश्वर महतो को भी स्कूल ले जाते थे। (संदर्भ सूत्र – मां, आलोमनी महतो)।

सन् 1995 में भादूडीह प्राथमिक विद्यालय में तीसरी कक्षा में प्रवेश कर 5वीं कक्षा तक पढ़ाई की। पिता जी को टी.बी. की बीमारी होने के कारण परिवार की आय बंद हो गई। मां दलमा पहाड़ से लकड़ी, केंदू पत्ता और फल चुनकर लाती थी, जिन्हें बेचकर वह परिवार का पेट भरने का काम करती थी। जहां तक मेरी याद है कि मैं 5वीं कक्षा तक गमछा पहनकर स्कूल जाया करता था। 

10 फरवरी 1998 को मैंने डिमना मध्य विद्यालय में कक्षा 6 में प्रवेश लिया। घर में आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण गाँव से 8 किमी. पैदल स्कूल आना-जाना करते थे। कभी-कभी दोस्तों के साथ साईकिल से जाना-आना भी होता था। डिमना मध्य विद्यालय आने के बाद, एक फुल पेंट को दो हाफ पेंट बनाकर पहनने लगा। आर्थिक तंगी के बावजूद सब कुछ ठीक चल रहा था।

11 मार्च 1998 को दिन के करीब 3 बजे मेरे पिता का टी.बी. की बीमारी से देहांत हो गया। पिता जी के देहांत के बाद से ही मेरी वास्तविक संघर्ष यात्रा प्रारंभ हुई। पिता के देहांत के कुछ दिन बाद अप्रैल 1998 में मैं बोंटा गाँव छोड़कर बालीगुमा में लाल बहादुर सिंह के घर नौकर का काम करने के लिए निकल गया और बिना मज़दूरी के नौकर का काम करता रहा। केवल शर्त इतनी ही थी कि मुझे पढ़ाई जारी रखने का मौका दें और हमारे साथ यही हुआ। यह सिलसिला (1998 से 2006 तक) 8 वर्षों तक चलता रहा। 

सन् 1999 में बालीगुमा सुकना बस्ती के पास कृषि विभाग की ज़मीन को एक दबंग व्यक्ति द्वारा हड़पने का प्रयास किया गया। सुकना बस्ती से लाल बाहादुर के घर तक के रास्ते को रोकने के विरोध में सीधा टकराव हुआ। लाल बहादुर सिंह पहले से ही छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी संगठन के संपर्क में थे। उन्होने मुझे संगठन के संघर्षशील साथियों के बारे में और संगठन की कार्यशैली के बारे में भी बताया। उस ज़मीन और रास्ते को बचाने के लिए छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी से संपर्क करने के लिए मैं और लाल बहादूर, बालीगुमा से चौका-चांडिल गये और संगठन के साथियों को समस्या से अवगत कराया। बालीगुमा में ग्रामीणों के साथ बैठक में रणनीति तैयार कर हमने आंदोलन किया और जमीन हड़पने वाले दलाल को भगाया। इस आंदोलन से संगठन की ताकत को मैं समझने लगा। मैं 14 वर्ष के उम्र में छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी के संपर्क में आया, परंतु कागजी तौर पर नहीं। संगठन के बैठकों में शामिल होना अब मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। 

11 अक्टूबर 2001 को जय प्रकाश नारायण के पैतृक गाँव सिताबदीयारा (उत्तर प्रदेश) में छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी का राष्ट्रीय शिविर आयोजित किया गया। मैं पहली बार संघर्ष वाहिनी के इतने बड़े कार्यक्रम में शामिल हुआ। देश के विभिन्न क्षेत्र से आए साथियों को देखकर मैंने भी सामाजिक कार्य करने का इरादा बनाया। 2003 में मैट्रिक का परीक्षा दिया, लेकिन अनुत्तीर्ण हुआ। पुनः 2004 में मैट्रिक का परीक्षा दिया जिसमें उत्तीर्ण हो गया। 

07 नवम्बर 2005 से 13 दिसम्बर 2005 तक कोलकाता से दिल्ली तक की 36 दिनों की साईकिल यात्रा में शामिल हुआ। मैंने पहली बार इतना लम्बा सफर तय किया और 45 दिनों के बाद घर वापस आया। इस यात्रा के बाद मैंने छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी के पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में काम करने का निर्णय लिया। इसके बाद पहली बार छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी का जिला संयोजक बना।

2006 में बगईचा-नामकुम, रांची के राष्ट्रीय शिविर में मैंने पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में घोषणा की। साथ में अपना नाम भी बदल कर दिलीप कुमार से कुमार दिलीप कर दिया। इस दौरान मैंने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। 2006 में लाल बहादूर सिंह एवं उनके पत्नि सुशीला सिंह की ज़मीन हड़पने के गलत काम में सहयोग नहीं करने के कारण मुझे 13 नवम्बर 2006 को घर से बाहर निकाल दिया।

15 नवम्बर 2006 से मैं छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी के साथी दिलीप वाहिनी के घर में रहा। 13 दिस्मबर 2006 से 2008 तक संघर्ष वाहिनी के वरिष्ठ साथी अरविंद अंजुम जी के घर टेल्को में रहने लगा। इलाहाबाद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में मैं पहली बार छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी का राष्ट्रीय संयोजक बना। संयोजक बनने के बाद 2008 में शिक्षा के बाजारीकरण के खिलाफ एवं गुणवत्ता युक्त समान शिक्षा के लिए जन चेतना का कार्यक्रम पूरे देश चलाने का प्रयास किया। 2006 से ही चांडिल बांध विस्थापितों के समस्या और अधिकार को लेकर पुराने साथियों के साथ शामिल हो कर आंदोलन में भागीदारी निभाई। संगठन का काम के बावजूद कड़ी मेहनत से 2007 में 12वीं की परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ। चांडिल बांध विस्थापितों के समस्या और अधिकार के आंदोलन के साथ-साथ डिमना बांध विस्थापितों के साथ भी बैठक करना शुरू किया। 06 जनवरी 2009 को विशाल रैली-प्रदर्शन के माध्यम से डिमना बांध विस्थापितों की समस्या और अधिकार को स्थापित करने में भूमिका निभाई। 2009 में वाहिनी केंद्र मितान-जुमीद, चिलगु-चाकुलिया में रहने लगा। सोबरन स्मृति विद्यापीठ का प्रबंधन, संगठन का काम और अपनी पढ़ाई साथ में चलती रही। स्नातक का अंतिम सत्र की परीक्षा की तैयारी के लिए 2010 में छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी के वरिष्ठ साथी मंथन जी के घर टेल्को, ग्वालाबस्ती में रहने लगा। कड़ी मेहनत, लगन और साथियों के सहयोग से बी.काॅम. की परीक्षा में द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। 

02 मई 2010 को मेरे बहनोई (जीजा जी) सुभाष चंद्र महतो की एक माओवादी विचार धारा के संगठन ने गोली मार कर हत्या कर दिया। इस घटना के बाद मैं अपनी दीदी (राधारानी महतो) के साथ 6 महीने तक रहा। इस समय पोटका प्रखण्ड में भूषण पावर प्लांट एवं जिंदल पावर प्लांट को रोकने के लिए लगातार आंदोलन चला जिसमें मैंने सक्रिय भूमिका निभाई।

13 अक्टूबर 2011 से 24 अक्टूबर 2012 तक संगठन के वरिष्ठ साथी सीताराम शास्त्री के साथ गायत्री होम्स् में रहने लगा। संगठन का आंदोलन एवं रचनात्मक कार्यक्रम लगातार चलता रहा। संगठन के इतने सारे काम के बावजूद अनुभवी साथियों के सहयोग से एम.ए.आर.डी. की परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। इसके साथ मैं अपने गाँव बोंटा का पहला एम.ए. पास व्यक्ति बना। 24 अक्टूबर 2012 को सीताराम शास्त्री के देहांत के बाद मेरी जिम्मेदारी और भी बढ़ गई। 29 जनवरी 2013 से 05 जनवरी 2017 तक बेलटांड, पटमदा में छायुसंवा का कार्यालय बना कर रहने लगा, साथ में नये साथी विश्वनाथ और ईश्वर को रखा। कार्यालय को पुस्तकालय के रूप में स्थापित किया और संगठन में नये साथियों को जोड़ने का काम किया। 

21 मई 2016 को प्रेमलता बिन्नी एवं विश्वनाथ आजाद की द्वितीय पुत्री श्वेता शशि के साथ जीवन जीने का फैसला किया और उन्हें जीवन संगी के रूप में मानने की घोषणा की। बिना तिलक-दहेज और कर्मकाण्ड के हमारा सादगीपूर्ण विवाह संपन्न हुआ। संसारिक ज़िम्मेदारी बढ़ने के बावजूद संगठन का काम बिना अवरोध का चलता रहा। अब मेरे बेटे (वंशराज और दिव्यांशु दीप) भी आ गए है और श्वेता शशि के साथ घर में रहते है।  

झारखण्ड सरकार द्वारा स्थापित संस्था ‘‘सामाजिक अंकेक्षण इकाई’’ में 05 जनवरी 2017 से जिला स्रोत व्यक्ति के रूप में पूर्वी सिंहभूम जिले में पद पर स्थापित हूं। मनरेगा योजना का जिम्मेदारी पूर्वक अब तक 8 जिले के 647 पंचायतों में सामाजिक अंकेक्षण का कार्य सम्पन्न कराया है। मनरेगा योजना के अलावा जे.टी.डी.एस. (झारखंड ट्राइबल डेवलपमेंट सोसाइटी), सी.एफ.टी. (क्लस्टर फेसिलिटेशन टीम), वाटरसेड, जे.एस.एस.सी.डी.सी (झारखंड स्टेट शेडयूल्ड कास्ट कोओपरेटिव डेवलपमेंट कोओपरेशन), एफ.एफ.सी. (14 फाइनेंस कमीशन), एम.डी.एम. (मिड डे मील), एस.एस.ए. (सर्वशिक्षा अभियान), एस.बी.एम. (स्वच्छ भारत मिशन), एन.आर.एच.एम. (नेशनल रूरल हेल्थ मिशन) आदि योजनाओं का भी सामाजिक अंकेक्षण सम्पन्न कराया। इसके अलावा रचनात्मक कार्य के रूप में 17 बार रक्तदान किया। महात्मा गांधी शहादत दिवस के अवसर पर 30 जनवरी 2016 को ‘‘रोशनी जमशेदपुर’’ को अपनी दोनों आँखों का नेत्रदान किया। मेरी जीवन यात्रा लिखने के लिए प्रेरणा देने वाले श्रुति टीम के साथियों का आभार व्यक्त करता हूं। 

Author

  • कुमार दिलीप झारखण्ड के पूर्वी सिंहभूम ज़िले से एक सामाजिक अगुआ और युवा बुद्धिजीवी हैं। वह राज्य के सोशल ऑडिट यूनिट में कार्यरत हैं। वह पिछले एक दशक से युवाओं को सामाजिक बदलाव के प्रक्रिया में जोड़ने के लिए सक्रिय प्रयास करते आये हैं।

One comment

  1. दिलीप जी की संघर्षभरी यात्रा युवाओं के लिए प्रेरणादायी है।

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