डॉक्टर की लापरवाही ने प्रसव के बाद ले ली मेरी बहन की जान

आरज़ू:

मेरी एक बहन थी जिसका नाम रोज़ी था। कुछ साल पहले उसकी शादी हुई और शादी से वह बहुत खुश थी क्योंकि शादी एक अमीर घराने में हुई थी और वहाँ पर उसका सब बड़ा खयाल रखते  थे। मुस्लिम महिलाओं को वैसे तो इतनी आज़ादी नहीं मिलती पर उसके ससुराल में आमतौर से ज़्यादा आज़ादी थी। 3 साल पहले वह प्रेग्नेंट हुई और इस बात से वह काफ़ी खुश थी, उसके घर वाले भी काफ़ी खुश थे। शुरुआत में मेरी बहन रोज़ी को कोई समस्या या परेशानी नहीं समझ में आ रही थी। जैसे-जैसे प्रसव का समय करीब आया, मेरी बहन को टेंशन होने लगी और वह काफ़ी चिंतित रहती थी कि किस अस्पताल में भर्ती होना है और प्रसव कहाँ करवाना है। प्रसव का समय करीब आने पर उसने पहले लखनऊ जाने का मन बनाया और वहीं से प्रसव करवाने का सोचा लेकिन किन्ही कारणों से वह प्रसव के लिए सुल्तानपुर अपने गाँव चली गई।

अभी तक जितनी भी रिपोर्ट उसने निकलवाई थी, उनमें जच्चा और बच्चा दोनों ही स्वस्थ थे, कोई कठिनाई नहीं दिख रही थी। शायद यही सोचकर उसने अपने गाँव सुल्तानपुर चले जाने का सोचा होगा। जब प्रसव के लिए उसको अस्पताल में भर्ती कराया गया तब बिना कोई पुरानी रिपोर्ट देखें वहाँ के डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए बोला और एक सुई लगाने की वजह से उसका दर्द इतना बढ़ गया कि घरवालों को समझ नहीं आया और उन्होंने ऑपरेशन के लिए रज़ामंदी दे दी। मैंने पहले भी अपने आस-पास कई सारे ऑपरेशन देखे हैं और मेरे समुदाय में खासकर प्रसव के ऑपरेशन बहुत ही आमतौर पर होते हैं, जिनमें एक-डेढ़ घंटा लगता है। मेरी बहन का ऑपरेशन आधे घंटे से 40 मिनट में ही पूरा हो गया और बच्चे को परिवार को सौंप दिया गया। 

इस समय तक भी जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ थे, घर आए 5-10 दिन बीते ही थे कि मेरी बहन का पेट हल्का-हल्का सूजने लगा। वह वापस अपने घर आ गई थी और वहीं पर हल्की-फुल्की दवाइयाँ खाकर उसने 5-10 दिन और बिता दिए। अभी भी सूजन कम नहीं हुई थी, उल्टा बढ़ गई थी और उसे उल्टियां भी होने लगी थी। वह वापस उस डॉक्टर के पास गई जहाँ पर उसका प्रसव के दौरान ऑपरेशन हुआ था और वहाँ पर उसने अपना इलाज शुरू करवाया। कुछ दिन इलाज करवाने के बाद जब फ़ायदा नहीं मिला तब वहाँ से वह लखनऊ रेफर कर दी गई। वहाँ भी उसको आराम नहीं मिल पाया। घर वालों ने उसके बाद मुंबई के बड़े अस्पतालों में उसको दिखाया और उसका वहाँ काफ़ी दिन इलाज चला। इस दौरान उसका बच्चा उससे अलग था और मुश्किल से उसने 15 से 20 दिन ही अपने बच्चे के साथ गुज़ारे थे। मुंबई के अस्पतालों में इलाज करवाते समय ही वह मर गई और उसके बच्चे की भी हालत काफ़ी नाजुक हो गई थी। परिवार के सदस्यों ने किसी तरीके से बच्चे को वापस स्वस्थ करने का प्रयास किया और बच्चा बच गया, लेकिन एक साधारण से ऑपरेशन के कारण मेरी बहन की मौत हो गई। 

आज जब मेरे आस-पास कई महिलाएँ प्रसव करवाने की बात करती हैं तो वह भी यही सोचती हैं कि किसी छोटे से अस्पताल में कम खर्च में ऑपरेशन हो जाए, क्योंकि रिपोर्ट में कोई भी समस्या नहीं दिख रही होती है। यह सभी महिलाएँ सरकारी अस्पताल  जाने से बचती हैं क्योंकि सरकारी अस्पताल पर इतना भरोसा नहीं करती हैं।  मैं अभी इस समय कई अस्पतालों और कई डॉक्टरों को जानती हूँ जिनके यहाँ पर ऐसी कई किशोरियाँ व महिलाएँ आती हैं और खुल के बात ना कर पाने के कारण उनको सही इलाज नहीं मिल पाता। फैज़ाबाद में तो यह स्थिति है कि जहाँ पर महिलाओं की गोपनियता की बात आती है वहाँ पर कोई गोपनीयता नहीं रखी जाती। यह फैसला एक महिला का होता है कि वह बच्चा जन्म देना चाहती है या उसको नहीं रखना चाहती। 

फैज़ाबाद में ऐसे काफ़ी प्राइवेट अस्पताल हैं जहाँ पर महिलाएँ चुप-चाप बच्चा गिरा आती हैं, पर ऐसे सरकारी अस्पताल नहीं है जहाँ बच्चा गिराने में महिलाओं को सहयोग मिले या जो इस फैसले में महिला को सपोर्ट करें। सरकारी डॉक्टर अपने प्राइवेट क्लीनिक में महिलाओं को रेफर करवाते हैं और खुद जाकर बच्चा गिरा देते हैं। सुल्तानपुर जैसे शहरों में इससे भी बुरा हाल है। बच्चा गिरने की परकीय में ना ही सही चिकित्सकीय प्रक्रियाओं का खयाल रखा जाता है और ना ही साफ-सफाई का कोई ध्यान रखा जाता है। इस कारण से कई महिलाएँ और किशोरियाँ ज़िंदगी भर माँ नहीं बन पाती या फिर जान से हाथ धो बैठती हैं। हमारा समुदाय यौन स्वास्थ्य सुरक्षा प्रबंधन पर बात करने से कतराता है, जबकि यह इतना ही ज़रूरी है जितना इंसान के लिए पौष्टिक भोजन और साफ पीने का पानी है।

फीचर्ड फोटो प्रतीकात्मक है। फोटो आभार: commonwealthfund.org

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  • आरज़ू, उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद की युवा कार्यकर्ता हैं जो महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े हक-अधिकारों पर प्रेरणा किशोरी विकास केंद्र से जुड़े समुदायों को संभालती हैं। किशोरियाँ लगातार पढ़ाई से जुड़ी रहे दिलकुशा, धारा रोड में इनका यही प्रयास रहता है। साथ ही आरज़ू अवध पीपुल्स फोरम संस्था के साथ मिलकर यह किशोरियों की शिक्षा को बुलंद करने का काम करती हैं।

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