बलात्कार: एक कानूनी अपराध एवं सामाजिक बुराई

शंकर प्रजापति:

बलात्कार एक ऐसा अपराध, एक ऐसी सामाजिक बुराई जो सम्पूर्ण समाज को झिंझोड़ कर रख देता है। जब भी हम इस प्रकार की कोई खबर सुनते हैं या देखते हैं, तब न्यायालय से हमेशा यही गुहार लगाते हैं कि अपराधी के साथ सख्ती से पेश आए और उसे कड़ी कड़ी से सजा दे जिससे समाज में एक उदाहरण जाए और भविष्य में इस प्रकार के अपराध को कोई अंजाम न दे। हमारे पास इस अपराध से जुड़े कानूनी प्रावधान हैं, परन्तु उन प्रावधानों का इस अपराध के बढ़ते आंकड़ों पर कोई असर नहीं दिखता।

वह कौन सी मानसिकता है को जो इस अपराध को जन्म देती है?

अक्सर हमने देखा है कि लोग इस प्रकार के अपराधों को पुलिस तक ले जाने में डरते हैं। उन्हें समाज में उनकी इज्जत का डर होता है, वो सोचते हैं कि अगर समाज को इस बात का पता चल जाता है, तो उनका समाज में क्या स्तर रह जाएगा? उसकी बेटी से शादी कौन करेगा? इसी वजह से वह बात को वहीं ख़त्म कर देना चाहते हैं और ऐसा करके वो उस अपराधी को ऐसे कई अन्य अपराध करने का न्योता देते हैं।

राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो के आंकड़े बताते हैं कि बलात्कार के कुल अपराधों में से 94% अपराध, पीड़ित के किसी संबंधित व्यक्ति द्वारा अंजाम दिए जाते हैं, इस वजह से पीड़ित को चुप रहना पड़ता है। यौन सुख के लिए किए जाने वाले ऐसे अपराध समाज में महिलाओं के स्तर को गिराते हैं, उन्हें नीचा दिखाते हैं। मर्दानगी साबित करने के लिए किए गए यह अपराध समाज की पितृसतात्मक सोच को भी दर्शाते हैं।

आज हमारा दुर्भाग्य है कि विश्व की महाशक्तियों में से एक हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था इतनी जटिल है कि व्यक्ति को न्याय मिलते मिलते सालों लग जाते हैं, परंतु उसके निराशा ही लगती है। इसी कारण वह हार मान लेता है। जहाँ हम यह आशा करते हैं कि बलात्कार के अपराधी को मृत्यु दंड मिले, परंतु सबूतों की कमी, अपराधी का समाज में बड़ा कद या दर्जा होना, राजनीतिक दबाव का होना या अन्य कारणों से अपराध साबित नहीं हो पाता और अपराधी बरी हो जाता है, इस प्रकार वह और अपराधों को अंजाम देता है।

हम समाज के विकास और सुरक्षा हेतु हमारे प्रतिनिधियों को चुनकर देश की संसद तक पहुंचाते हैं, ताकि वह ऐसे कानून बना सकें जिससे ऐसे घिनोने अपराधों को कम किया जा सके। लेकिन जब हम उस प्रतिनिधि से बढ़ते हुए अपराधों पर सवाल-जवाब करते हैं, तब उनके विचार हमें परेशान कर देते हैं। जैसे “बलात्कार एक दुर्घटना है”, “लड़के हैं गलती हो जाती है”, “बलात्कार एक सामाजिक अपराध है जो पुरुषों और महिलाओं पर निर्भर करता है कभी सही, तो कभी गलत” कोई कहता है “ताली एक हाथ से नहीं बजती है।” कुछ लोग बलात्कार का कारण  महिलाओं के कपड़ों को बताते हैं। 

ये उन व्यक्तियों के विचार हैं, जिनको हमने अपने समाज की सुरक्षा का और संसद या विधानसभा में हमारा पक्ष रखने का दायित्व दिया है। ये सारे विचार हमको क्या दर्शाते हैं? जब कोई जनप्रतिनिधि या लोकप्रिय व्यक्ति इस प्रकार की बयान-बाजी करते हैं, तब उनके पीछे हज़ारों-लाखों की संख्या में लोग होते हैं, ऐसे में  इन लोगों की मानसिकता को क्या संदेश जाता होगा? उनके यही बयान बलात्कारियों को उत्साह एवं साहस प्रदान करते हैं। हकीकत देखी जाए तो कई बलात्कार के मामले इसलिए दर्ज नहीं होते, क्योंकि अपराधी के ऊपर किसी राजनीतिक व्यक्ति का हाथ होता है और वह बेझिझक अपराध करते हैं। 

जब अपने देश के बलात्कार के आंकड़ों को अन्य देशों के आंकड़ों से तुलना की जाती है तो अपने देश में एक ही कमी पाता हूँ, वो यह है कि इस देश का कानून व्यवस्था और कानून का क्रियान्वयन कमज़ोर है। यह सच है कि हम अपराधों को खत्म नहीं कर सकते, परंतु हम समाज के लिए एक ऐसे कानून का निर्माण तो कर ही सकते है जहां समाज में हर महिला, किशोरी और बच्ची खुद को सुरक्षित महसूस कर सके और वह अपनी पसंद के कपड़े पहन सके।

इस सामाजिक बुराई को खत्म करने का मात्र एक उपाय यह है कि हम एक मजबूत कानून व्यवस्था को बनाएं, जहां कानून का क्रियान्वयन सही ढंग से हो और अपराधी को सजा निश्चित रूप से मिले। जिससे वह अपराध को करने से पहले हज़ार बार सोचे। इसके साथ ही हमें यौन शिक्षा पर भी जोर देना चाहिए, विशेषकर लड़को को सहमति के बारे में बताएं और इसके बारे में जानकारी दें, ताकि समाज में जागरूकता फैल सके।

फीचर्ड फोटो आभार: न्यू इंडिया एक्सप्रेस

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  • शंकर प्रजापति, मध्यप्रदेश के मुरैना जिले से हैं। वर्तमान में वे आईटीएम विश्विद्यालय से कानून की पढ़ाई कर रहे हैं। वे जैनिथ़ संस्था के साथ सामाजिक मुद्दों पर काम कर चुके हैं और वर्तमान में हार्टबीट संस्था के साथ रोज़गार से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहे है। उन्हें किताबे पढ़ना, क्रिकेट खेलना, गाना सुनना और लेख लिखना पसंद है।

3 comments

  1. Very true… i must say …apradhiyo ko saja milni chahye or darne se kisi v problem ka solution nahi milta ha …

  2. Wow True..kaash log aap jesa soche And must say apraadhiyon ko esi saja milni chahiye ki doosre k man m bhi ek dar Bane jisse yeh dushkaram krne se phele 100 baar soche Jbhi hum ish burayi ko duniya se htaa payenge…

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