महेश मईडा:

लोकतंत्र में सबके राजनैतिक विचार एक जैसे नहीं होते हैं। मेरा मानना है कि सिर्फ राजनीति ही जीवन नहीं है, बल्कि राजनीति से बढ़कर भी हमारे जीवन में कई चीज़ें होती हैं, जैसे मनुष्यता, आपसी भाईचारा और प्रेम आदि। हमें आने वाले समय में एक अच्छे स्वस्थ समाज की ज़रूरत है, जिसे राजनैतिक नफरत फैलाकर नहीं बनाया जा सकता। भविष्य में हम अपने आस-पास के समाज को किस रूप में देखना चाहते हैं, यह आपके वर्तमान के निर्णयों पर निर्भर करता है। जब हम सब छोटे थे तो हमारे मन में “सर्वे भवंतू सुखिनः” से प्रेरित समाज की कल्पनाकृति थी, जिसमें सब लोग खुश थे, चारों तरफ आपसी भाईचारा और सौहार्दपूर्ण माहौल होगा, लेकिन वर्तमान हालात-कहानी कुछ और ही बयां कर रही है।

देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों के साथ ही अन्य सभी राजनैतिक दलों द्वारा भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी, दलाली, अपराधिक तत्वों को राजनैतिक संरक्षण के साथ धनपतियों के हाथ की कठपुतली बनी हुई है। सरकारों द्वारा आंकड़ों में फेरबदल कर अपनी सक्षमता दिखाने का खेल चल रहा है। आये दिन मनमाने राजनीति से प्रायोजित सरकारी आदेशों से देश की एकता एवं अखंडता की धज्जियां उड़ाई जा रही है। राजनैतिक फायदे के लिए कभी हिन्दू-मुस्लिम को लड़ा रहे हैं, तो कभी दलितों को बेरहमी से पीटा जा रहा है। कभी आरक्षण को मुद्दा बना कर नफरत फैलाई जा रही है, तो कभी निजीकरण के नाम पर प्रजातांत्रिक संस्थाओं का गला घोंटा जा रहा है। किसानों के लिये विशेष कारगर योजना पर कार्य नहीं किया गया, नतीज़न, आज भारत का किसान आर्थिक रूप से दुनिया का सबसे कमजोर किसान है। आज का किसान कर्ज में इतना दब गया है कि आये दिन फांसी लगाकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहा है। यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों को भी कभी ट्रान्सफर के नाम पर, कभी परफॉर्मेंस के नाम पर तो, कभी अनुशासन के नाम पर परेशान किया जाता है। सरकार को समुचित स्थानांतरण नीति बनानी चाहिए, जिससे दलाल नेता जो निजी फायदे के लिए ट्रान्सफर की राजनीति करते हैं, उनका खात्मा हो सके। सरकारी कर्मचारियों को एक ईमानदार, जन सेवक, देश भक्त बनाने के लिए माक़ूल वातावरण बनाना चाहिए तथा सेवा शर्तों को वर्कआउट एवं काम की संस्कृति के अनुरूप बनाना ज़रूरी है और ज़रूरी हो तो समुचित कानून बनाये जाने चाहिए। समाज के हर वर्ग से इस देश को इन भेड़ियों से बचाने के लिये आगे आना ही होगा। राष्ट्र का सौदा ये देश कभी बर्दाश्त नहीं करेगा। देश में भ्रमित एवं गंदी राजनीति का कोई स्थान नहीं होना चाहिये। 

आज छात्रों को निशाना बनाया जा रहा है। शिक्षा के व्यापारीकरण के साथ ही विश्वविद्यालयों से विद्वान शिक्षकों के बजाय राजनैतिक विचारधारा के पार्टीगत हित साधने वाले लोगों की नियुक्तियाँ हो रही हैं। देश की आशा युवा शक्ति को बरगलाकर नकारा बेरोज़गार और आपराधिक प्रवर्ती का बनाया जा रहा है। इन परिस्थितियों में अगर देश के जागरूक युवा वक्त रहते नहीं जागे तो, ये नक़ली दलाल और नकली देशभक्त राजनेता देश को पूरा बर्बाद कर देंगे।

आखिर क्यों हिंदूओं को खतरा महसूस हो रहा है कि, मुस्लिम भारत पर कब्जा कर गजवा ए हिंद बनाना चाह रहे हैं? मुस्लिमों को लग रहा है कि, RSS कुछ ही दिनों में ISIS जैसा खूंखार संगठन बन जाएगा और आतंकवाद का रंग भगवा हो जाएगा। दलितों को लग रहा कि जल्द ही नई संविधान सभा गठित होने वाली है, जिसमें मनुस्मृति के नियमों को लागू किया जाना है और उनके विकास में रिवर्स गियर लग जाएगा जो उन्हें सीधे उत्तर वैदिक काल में ले जाएगा। सवर्ण को लग रहा है कि आरक्षण की वजह से उसकी युवा पीढ़ी बेरोज़गार और बेचारी होती जा रही हैं। ये सभी कल्पनाएँ कहाँ से उपजी? क्या वास्तव में हमारे आस-पास ऐसे हालात पनप रहें हैं या कुछ और?

अगर हम ईमानदारी से विश्लेषण करें तो पाएंगे कि असल में ये सारी अवधारणाएं वाट्सअप और फेसबुक पर अंधाधुंध फैलाए जा रहे उन्मादी कॉपी-पेस्ट का नतीजा है। ये कॉपी-पेस्ट, लंबे-लंबे मैसेज, भड़काऊ फोटो और तमाम वीडियो की शक्ल में बहुतायत से फैलाये जा रहे  हैं। अगर हम सोशल मीडिया की छद्म आभासी दुनिया से निकलकर अपने आस-पास लोगों को देखें तो यकीनन एक सौहार्दपूर्ण भारत नज़र आएगा, लेकिन अगर हम अभी भी नहीं चेते और इन्हीं वाहियात फारवर्डेड मैसेजों के आधार पर दूसरों के लिए अपनी अवधारणाएं बनाते रहे तो एक दिन यह भी संभावना है, कि पास में खड़ा आदमी अचानक आप पर हमला कर बैठे। ये सब राजनैतिक प्रयोजन हैं, इनमें उलझने से हमारी जानें जाएंगी, हमारे खुद के घर जलेंगे। सत्ता की मलाई वही सब राजनेता और उनकी पार्टियां लूटेंगी, जिन्होंने मैसेजों की बमबारी के लिए आईटी सेल/कम्पनियां नियुक्त की हैं।

सभी प्रमुख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समाचार चैनलों पर चुनाव प्रबंधन से संबंधित सभी समाचारों पर कड़ी निगरानी रखी जानी चाहिए। कोई अप्रिय घटना या किसी कानून/नियम का उल्लंघन पाया जाता है, तो तुरंत कार्रवाई की जाये, तभी असल लोकतंत्र के मायने हैं।

लोकतंत्र केवल शासन प्रणाली ही नहीं, बल्कि एक जीवन शैली भी है। शासन एवं राजनीति में संलग्न लोगों की इस परिपाटी को बनाये रखने की जिम्मेदारी सर्वाधिक होती है। सौहार्द्रता एवं समन्वयपूर्ण वातावरण के निर्माण की शुरूआत शालीन एवं संयमित भाषा से ही होती है, लेकिन अफसोस कि जिम्मेदार राजनेता ही भड़काऊ भाषण देते रहे हैं। जैसा हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश के चुनावों में देखने को मिल रहा है। खासकर कैराना और मुज्जफरनगर के संदर्भ में ये भड़काऊ बयान और शब्दों की राजनीति हमारे लोकतंत्र को रसातल में ले जा रही है! इसलिए….सावधान रहिये …नफरत फैलाने वाली कोई भी पोस्ट शेयर न करें। हम अभी भी अजनबियों को चाचा, ताऊ, भैया, दद्दा, मामा कहने वाली संस्कृति के वाहक हैं। हममें से कोई नहीं है जो जाति पूछकर संबोधन करता हो। सोशल मीडिया से फैलती आग में जलने और समाज को जलाने से बचें और जातिगत व धार्मिक नफरत फैलाने वाले ग्रुपों को एक्जिट करें, फिर देखिए हमारा परिवेश कितना सौहार्दपूर्ण होगा।

फोटो आभार: स्क्रॉल.इन

Author

  • महेश मईडा, राजस्थान के बांसवाड़ा ज़िले से हैं। महेश नर्सिंग ऑफिसर के पद पर कलावती सरन केंद्रीय बाल चिकित्सालय, नई दिल्ली में कार्यरत हैं।

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2 responses to “राजनैतिक वर्चस्व की लड़ाई में उलझता लोकतंत्र”

  1. RITESH NINAMA Avatar
    RITESH NINAMA

    हमारे जैसे युवाओं के लिए आपका लेख बहुत ही प्रेरणादायक हैं। आप इतने व्यस्त जीवन भी समय निकालकर युवाओं के लिए कुछ न कुछ प्रेणादायक लेख लिखते रहते हो।🥰😍❤️❣️

    1. ADVOCATE DILIP MAIDA Avatar
      ADVOCATE DILIP MAIDA

      बिल्कुल सही कहा डॉक्टर साहब आपने सब राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए सभी धर्मों के नाम से तो कभी जाति के नाम से हर प्रकार से आपस में लड़ आया है युवाओं को और जनता को गुमराह करके इन नेताओं ने वोट बटोरे हैं इसलिए अगर इन सब पर प्रतिबंध नहीं लगा तो आने वाले कुछ वर्षों में जो स्थिति पड़ोसी देश में हो रही है वही स्थिति हमारे देश में होने वाली है

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