वास्तविकता की चुनौती

जगदीश चौहान:

भगतसिंह की किताब, मैं नास्तिक क्यों हूं?, अछूत की समस्या, और बाबासाहेब डॉ आंबेडकर की किताब जाति का उन्मूलन इन पंक्तियों के मुख्य स्त्रोत कहे जा सकते हैं, लेकिन डॉ अनिल सदगोपाल जी के अनेक भाषण जो मैंने सुने और देखे हैं उसका बहुत बड़ा योगदान इन पंक्तियों को लिखने में है। भगतसिंह, आंबेडकर, गांधी और अनिल जी ने मुझे वो चश्मे दिए जिसकी सहायता से मैंने देश में फैली असमानता को देखा। ये असमानताएं अनेक रूपों में सदियों से हमारे सामने है। और ये इतनी जीवंत है कि हम थोड़े भी जागरूक हों तो हम देखने के साथ – साथ इसे महसूस भी कर सकते हैं।

हमारे मुखधारा के साहित्य को दलित साहित्य चुनौती देता है।
हमारी सुंदरता की कल्पनाओं को समाज की बदसूरती चुनौती देती है।
हमारे सजावटी और बनावटी चेहरों और शरीरों को, वास्तविक चेहरे और विकलांग शरीर चुनौती देते हैं।

यहां के जातिवाद और भाषावाद को बुद्घ और महावीर चुनौती देते हैं।
आस्तिकवाद को तर्क चुनौती देता है।
अध्यात्मवाद को भेाैतिकता चुनौती देती है।

हमारी तथाकथित महानता को जीवन की वास्तविकता चुनौती देती है।
हमारे सुंदर से महलों को गरीब के झोंपड़े चुनौती देते हैं।
हमारी किताबी समानता को समाज की वास्तविक असमानता चुनौती देती हैं ।

हमारी तमाम सुविधाओं को एक बच्चे की भयंकर अभावग्रस्तता चुनौती देती हैं।
हमारे तथाकथित संयम को कामवासना के विचार चुनौती देते हैं।
हमारी तथाकथित संपूर्णता को वास्तविक अपूर्णंता चुनौती देती है।

फीचर्ड फोटो आभार: How Technology Ends Inequality

Author

  • जगदीश, मध्य प्रदेश के बुरहानपुर ज़िले से हैं। उन्होंने स्नातक तक (BA) की पढ़ाई पूरी की है। वर्तमान में जगदीश गांधी फेलो के तौर पर बड़वानी ज़िले में शिक्षा के ऊपर कार्य कर रहे हैं।

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