युवानिया लेखन कार्यशाला

युवानिया डेस्क:

युवानिया के एक वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में तीन दिवसीय लेखन कार्यशाला का आयोजन किया गया, लगभग 25 युवाओं ने इसमें भाग लिया। चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट, हिंदी अकादमी व अन्य जगहों से पुरस्कृत बाल कहानीकार मधुलिका अग्रवाल ने दो दिन, छोटी-छोटी लेखन गतिविधियों के माध्यम से बहुत सहज और सरल तरीके से सबको लेखन के गुर सिखाए।

तीसरे दिन, देश की वरिष्ठ मीडिया व्यक्तित्व नताशा बधवार ने सहभागियों से यह पूछा कि उन्हें लिखने के लिए क्या प्रेरित करता है? एक-एक कर सभी के जवाबों से, उन्होंने लेखन संबंधित विधाओं को उजागर किया। नताशा ने 13 साल एनडीटीवी (NDTV) में बतौर कैमरा वुमन काम किया है। आजकल वे छोटी फिल्में बनाती हैं। कार्यशाला के सभी प्रतिभागियों के साथ उनका व्यक्तिगत संवाद, सबको अच्छा लगा। 

बहुत से युवाओं ने इस कार्यशाला के माध्यम से पहली बार लिखा। वे लिखने के लिए प्रेरित हुए और युवानिया के लिए लिखने की इच्छा जताई। आगे के अंकों में आपको इनके लेख पढ़ने को मिलेंगे।

शिविर में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड, बिहार, ओडिशा व छत्तीसगढ़ के साथी जुड़े। अधिकतर साथी श्रुति फेलोज़ के क्षेत्र के थे, लेकिन कुछ साथी अलग से भी जुड़े थे। ओडिशा के वरिष्ठ साथी अमूल्य भाई ने भी नव लेखकों की प्रोत्साहित किया और ओडिया साथियों से संवाद में सहायता की।

एक अच्छी बात यह हुई कि तीसरे दिन का शिविर (जो एक सप्ताह के अंतराल में हुआ था) आयोजित करने में, युवानिया संपादक मंडल में जुड़े मध्य प्रदेश के एक लेखक साथी सुरेश डुडवे ने प्रमुख भूमिका निभाई।

श्रुति के साथी सिद्धार्थ, तेजस्विता, सौरभ, जुहेब और मोहन ने इस कार्यशाला के आयोजन में अहम भूमिका निभाई। लेखन कार्यशाला एक नया और सार्थक प्रयास लगा, जिससे युवानिया समूह को भी ऊर्जा मिली। सहभागियों ने इच्छा जताई कि इस तरह की कार्यशाला का आयोजन आगे भी किया जाना चाहिए, जिससे गरीब वर्ग के युवाओं की लेखन क्षमता का विकास हो।


लेखन कार्यशाला, जौनपुर; उत्तर प्रदेश

युवानिया लेखन कार्यशाला को अलग-अलग क्षेत्रों में भी आगे बढ़ाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के जौनपुर ज़िले में दिशा संस्था द्वारा युवानिया लेखन कार्यशाला का आयोजन किया गया। 02 सितंबर को आज़ाद पूर्व माध्यमिक विद्यालय, आज़ाद नगर, मुरारा जौनपुर में एक लेखन कार्यशाला का आयोजन हुआ। कार्यशाला का संयोजन विवेक शर्मा के द्वारा किया गया और इसमें लगभग 30 छात्र-छात्रों ने अपनी सहभागिता दर्ज की।


लेखन, एक कला जो जीवन आसान बनती है, व्यक्तित्व सजाती है

शुभम:
फैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश

2020 व 2021 में पूरी दुनिया कोरोना महामारी से ग्रसित थी, इसका सबसे ज़्यादा प्रभाव किशोरियों, दिहाड़ी मज़दूरों, घरेलु कामगारों व हाशिये पर खड़े समुदाय पर पड़ा। अवध पीपल्स फोरम, अयोध्या के फैज़ाबाद ज़िले में ऐसे ही समुदायों में शिक्षा व स्वास्थ्य पर कार्य करता है। सरकारी सेवा, हर नागरिक को मिले इसके लिए सरकारी संस्थाओं जैसे सरकारी स्कूल व सरकारी अस्पतालों में अवध पीपल्स फोरम, जड़ से जुड़के कार्य करता है। 

कोरोना महामारी में सबसे बड़ा प्रभाव किशोरी शिक्षा पर दिखा। जहां किशोरियों की शिक्षा 12वीं क्लास तक ही सिमट के रह जाती है और कुछ गिनी चुनी किशोरियाँ ही आगे की शिक्षा सही तरीकों से ले पाती हैं, तालाबंदी के दौरान इन किशोरियों को भी शिक्षा से अलग कर दिया गया। जैसे तूफ़ानों में टूटे हुए पेड़ नदी में बहते-बहते किनारे पर आ लगते है और उनमें सड़न पैदा हो जाती है, किशोरियों को भी शिक्षा से अलग करके कुछ ऐसा ही माहौल बना दिया गया था। अवध पीपल्स फोरम ने कोरोना में शहीद हुए शिक्षकों की याद में एक लेखन प्रतियोगिता कराई। ये प्रतियोगिता इसलिए भी थी कि किशोरियाँ अपनी बात खुल कर कह पाएं। तालाबंदी के बाद से जो तूफान आया उसमे एक बसेरा, एक साझा मुकाम इन किशोरियों के लिए बन सके, इसका भी प्रयास किया गया। 

ये लेखन गतिविधि फैज़ाबाद-अयोध्या के 05 सरकारी स्कूलों में कराई गई, इस गतिविधि में 70 किशोरियां जो 9वीं से 12वी कक्षा की छात्रा थी, उन्होंने भाग लिया। लेखन प्रतियोगिता का मुद्दा “लड़कियों की शिक्षा, मौजूदा दौर की चुनौतियां और रास्ते” रखा गया था।

यह गतिविधि जुलाई माह के अंत व अगस्त माह की शुरुआत में कराई गई थी। सभी छात्राओं के लेखों की एक किताब भी बनाई गई जिसे अलग-अलग स्कूल व सामुदायिक पुस्तकालय में रखा गया, जिससे समुदाय के लोग किशोरियों की भावनाओ से जुड़ सकें व उनके दर्द में शामिल हो सकें।  

लेखन पत्रिकाओं में किशोरियों ने अपने अनुभव साझा किए तो ऐसी स्तिथि और दृश्य सामने बने जो मानव मूल्यों व संवैधानिक मूल्यों से कोसों दूर थे। लड़कियों ने लिखा था कि कैसे वो अपने ही घरों में कैदी बन गई थी, कैसे उनके घर पर जबरन शादी करवाने की बातें हो रही थी, अपने परिवार वालों की ही नियत बिगड़ते देखना पड़ा, 3 वक़्त का राशन ना होने के कारण खाली पेट कितने महीने गुज़ारने पड़े, शराब के नशे में पिता के मुंह से भद्दी गालियां खानी पड़ीं, लड़की बनकर पैदा होने के लिए कोसी गई और कई बार बड़े भाई से मार भी खाई। 

इन परिस्थितियों के बाद भी लड़कियों को सबसे ज़्यादा डर इस बात का लगा कि वो वापस अपने स्कूल नहीं लौट पाएंगी। महिलाओं के साथ होते शोषण को सामान्य बनाने का कार्य भी इस महामारी ने किया और हमारे समाज की कड़वी सच्चाई भी सामने लाई। चाहे वो महिलाओं के प्रति घृणा हो, घरेलू उत्पीड़न हो, महिला विरोधी हरकत हो या पितृसत्ता में जकड़ी हुई सोच हो। 

इन सभी चुनौतियों के रास्ते खोजते हुए किशोरियों ने बताया कि सभ्य समाज की कल्पना करना तो दूर की बात, लड़कियों को समाज का हिस्सा बनाना ही सबसे बड़ी जीत लगती है। समाज अपनी अलग धारा में है, लड़कियों को अवसर देने से ही समाज में उनके लिए एक विकासशील जगह बनाई जा सकती है और इसके लिए सभी महिलाओं, किशोरियों को आर्थिक बंदी से निकालना पड़ेगा जो शिक्षा से ही संभव है। सभी किशोरियों और महिलाओं का प्रथम कर्तव्य संस्कारी होना नहीं बल्कि शिक्षित होना है, जिसके लिए हम सब को खूब पढ़ना पड़ेगा। 

“सुनील लता मैडम जो महिला शिक्षा मोर्चा की एक जुझारू सेवक, जी.जी.आई.सी. की प्रधानाचार्या और एक विकासशील समाज की विचारक थी, उनका दिहान्त हो गया। अपनी जीवन यात्रा के दौरान सैकड़ों किशोरियों को उन्होंने पढ़ाया और जो फीस नहीं जमा कर सकती थी उनकी फीस भी जमा की। सुनील लता मैडम की याद में और उनके जज्बे को सलामी देने के लिए, किशोरियों को शिक्षित करने के साथ जीवन के हर कदम पर अवसर की बराबरी, सम्मान जनक चुनाव करने की शक्ति व उत्पीड़न पर आवाज़ उठाने की शक्ति प्रदान करने के लिए हम सब नागरिकों को ये प्रण लेना होगा कि खुद भी शिक्षित बनेंगे और महिला विरोधी व पितृसत्ता में जकड़ी सोच को बदलेंगे।“

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Authors

  • शुभम, उत्तर प्रदेश से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह अवध पीपुल्स फोरम के साथ जुड़कर युवाओं के साथ उनके हक़-अधिकारों, आकांक्षाओ, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं।

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