वैज्ञानिक चेतना तो ठीक है लेकिन, मन है कि मानता नहीं!

अरविंद अंजुम:

कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले में एक मंदिर है, जिसका नाम है- कुक्के सुब्रह्मण्य। यहाँ नौ सिरो वाले सांप की मूर्ति है, जिसकी पूजा श्रद्धालु करते हैं। इस मंदिर में लंबे समय से ‘मदे-स्नान’ नामक प्रथा प्रचलित रही है। मदे-स्नान का अर्थ है थूक-स्नान। इस प्रथा के अनुसार ब्राह्मणों के थूक और जूठन पर श्रद्धालु लोटते हैं। उनका विश्वास है कि ऐसा करने से उनकी बीमारियां दूर होती हैं और घर धन-धान्य से भर जाता है। स्वाभाविक रूप से ये श्रद्धालु ज्यादातर दलित एवं जनजातीय समूह से आते हैं, जैसे आज-कल कांवड़ यात्रा एवं अन्य धार्मिक आयोजनों में सबसे बड़ी भागीदारी पिछड़ी जातियों एवं दलितों की होती है। आत्म-गर्वबोध का यह ताज़ा अध्याय है।

मानवीय चेतना के विकसित होने के साथ-साथ इस जघन्य प्रथा को बंद कराने के प्रयास शुरू हो गए। लेकिन दक्षिणपंथी एवं दकियानूसी समूह इसे जारी रखने पर उतारू था। इस जिले में संघ एवं भाजपा के बढ़ते प्रभाव की वजह से राजनीतिक रूप से भी इस प्रथा को संरक्षण मिलने लगा। इसके बावजूद इस प्रथा को बंद कराने की मुहिम ज़ोर पकड़ती गई। अंततः सरकार को भी आगे आकर इस प्रथा को बंद करने की पहल लेनी पड़ी।

सरकार एवं प्रशासन की ओर से पहली बार 2011 में इस प्रथा को बंद कराने का गंभीर प्रयास हुआ। ज्ञात हो कि कई राजनैतिक दल एवं सामाजिक संगठन विगत कई वर्षों से इस प्रथा को बंद कराने के लिए दबाव डाल रहे थे। पर दूसरी ओर संघ/भाजपा, स्थानीय श्रद्धालु जन तथा ब्राह्मण-पुजारी समुदाय, थूक-स्नान के समर्थन में खुलकर आ गये। उनका कहना था कि यह एक धार्मिक-परंपरा है और इसमें सरकार को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। स्कंद पुराण की एक कथा के हवाले से इसके महात्म्य का बखान किया गया। उस कथा के अनुसार कृष्ण-पुत्र सांब तथा उनकी पत्नी जांबवती जूठन पर लोटकर ही कुष्ठ रोग से मुक्त हो गई थी; गोया ‘जूठन पर लोटन’ एक अंधविश्वास न होकर कोई सिद्ध चिकित्सा-पद्धति हो।

प्रशासन की पहली कोशिश तो नाकाम हो गई और दोनों पक्ष के बीच कशमकश जारी रहा। आगामी वर्षों में सरकार एवं  प्रशासन ने कठोर भूमिका लेते हुए इसे बंद कराना चाहा। थूक स्नान के समर्थक, कर्नाटक हाई कोर्ट चले गए और उन्होंने सरकार के आदेश के खिलाफ स्टे ले लिया। पर बाद में कर्नाटक सरकार, सुप्रीम कोर्ट गई और शीर्ष कोर्ट ने हाईकोर्ट के स्थगन आदेश को निरस्त कर दिया। इस तरह सदियों से चली आ रही इस अमानवीय प्रथा का अंत हो गया। पर क्या सचमुच इसका अंत हुआ है या यह अब भी लोगों के मन में बसा है?

सरकार ने तो इस कुप्रथा को बंद कर दिया, पर लोगों के मन पर इसकी छाप बनी रही। उन्होने इस प्रथा को थोड़ा बदलकर मदे स्नान से इदे स्नान कर दिया। अर्थात अब थूक का स्नान नहीं होगा बल्कि सिर्फ जूठन का स्नान होगा। किसी परंपरा, प्रथा का निरंतर अभ्यास हमारे मन पर इतना प्रभावी होता है कि सैद्धान्तिक रूप से मुक्त होने के बावजूद भी हम उस से बंधे, चिपके रह जाते हैं। अगर उसको दुहराया न जाए तो एक रिक्तता महसूस होती है।

कई प्रथाओं और परंपराओं में इसकी झलक देख सकते हैं। राजा राममोहन राय के प्रयास से 1829 में सती-प्रथा के खिलाफ कानून बना। लेकिन जब राजस्थान के दिवराला में रूप कंवर, 158 साल बाद 4 सितम्बर 1987 में सती हुई, तो उसके  समर्थन में जनसैलाब उमड़ आया। तेरवीं के दिन लाखों लोग दिवराला में चुनरी चढ़ाने पहुंचे थे। कानून बने तो सदियां बीत गई, पर मन पर सती की महिमा कायम रही और आज भी है। इसी तरह हम देख सकते हैं कि 1961 में दहेज के खिलाफ कानून बना। पर दहेज तो गाजे-बाजे और धूमधाम के साथ आज भी लिया और दिया जाता है। कानून अपनी जगह है और हमारा मन, परंपराएं और प्रथाएं अपनी जगह।

फिर भी कानून की ज़रूरत होती है क्योंकि कानून सही या गलत के बारे में एक मान्यता बनाता है, वैधता का मानदंड बनाता है। लेकिन हमारी मानसिकता अगर उस कानून से जुदा है, तो उसे बलपूर्वक लागू करवाना किसी भी सरकार के लिए अक्सर कठिन होता है। जैसे दहेज कानून को लागू करने के लिए सामाजिक मानसिकता नदारद है। ऐसा तभी संभव हो सकेगा जब कानून का सांस्कृतिक रूपांतरण हो; अर्थात हमारी सोच, हमारी मान्यताएं, हमारे मुहावरे, हमारी धारणायें, हमारे अच्छे और बुरे की समझ और तमीज बदले। कानून बदलाव का सहारा है पर बदलाव तो सामाजिक और व्यक्तिगत मन में होना है, तभी संहिताएं और संरचनाएं बदलेगी और बदलाव दिखेगा। वैसे उडुपी के कृष्णा मठ में मंदिर-प्रशासन ने इदे स्नान प्रथा को 2018 में अंतिम रूप से  समाप्त कर दिया। 

सामाजिक परिवर्तन एक कठिन डगर है, फिर भी विफलताओं के बावजूद प्रयास की निरंतरता बनी रहनी चाहिए।

फोटो आभार: न्यूज़ क्लिक

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  • श्रुति से जुड़े झारखण्ड के संगठन विस्थापित मुक्ति वाहिनी को बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले अरविन्द भाई, अभी जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी के अंशकालिक कार्यकर्ता हैं। अध्ययन, अनुवाद, प्रशिक्षण जैसी वैचारिक गतिविधियों में विशेष सक्रियता के साथ-साथ स्थानीय और राष्ट्रिए स्तर के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सवालों पर विशेष रुचि और समय-समय पर लेखन का काम करते हैं।

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