मधु भील:

मेरा नाम मधु भील है, मेरे गाँव का नाम केरारपुरा है जो राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले की भदेसर तहसील की धीरजी का खेड़ा पंचायत में आता है। मैं आपको मेरे गाँव और वहाँ की आर्थिक स्थिति के बारे मैं बताना चाहती हूँ। मेरा गाँव एक छोटा सा गाँव है, यहाँ लगभग 100 घर होंगे। गाँव में अधिकांश घर राजपूतों के हैं, कुछ घर मेघवाल समाज के और कुछ घर भील समाज के लोगों के भी हैं। कुछ लोग खेती करते हैं और कुछ लोग मज़दूरी करके अपना घर का गुजारा करते हैं। मेरा गाँव पहाड़ियों के बीच मैं है। मेरे गाँव में एक समस्या है कि यहाँ लोगों को मज़दूरी कम मिलती है। मज़दूर जिसके यहाँ काम करने जाते हैं, वहां मालिक उन्हें समय पर पैसे भी नहीं देता है, जिससे उसका घर का खर्चा चलना मुश्किल हो जाता है।

गाँव में एक विद्यालय और एक आंगनवाड़ी सेंटर है। हमारे यहाँ के भील समाज के लोगों की आर्थिक स्थिति सबसे अधिक कमज़ोर है। हमारा गाँव मुख्य रोड से लगभग 4 किलोमीटर दूर है। गाँव में आवाजाही का कोई साधन ना होने के कारण लोगों को काफी परेशानी रहती है। मैं आधारशिला स्कूल में पढ़ती हूं। कोरोना वायरस महामारी के चलते मैंने अपने गाँव में बच्चों को पढ़ाई कराने की ज़िम्मेदारी ली, जिसके बारे में मैं आपको कुछ बताना चाहती हूँ।

सबसे पहले तो जब सब स्कूल बंद हो गए थे तो हम सब लड़कियां अपने-अपने गाँव चली गई थी। कुछ दिन बाद फिर हमारे आधारशिला स्कूल में एक बैठक हुई, जिसमें मैं भी शामिल थी। मीटिंग खत्म होने के बाद पलका दीदी ने मुझसे बात की और पूछा कि तू पढ़ाई कर रही है या नहीं? फिर मुझसे दीदी ने कहा कि तू खुद भी पढ़ाई कर और तेरे गाँव में जो लड़कियां नहीं पढ़ती हैं, उनको भी पढ़ाया कर। इसी बहाने उनके साथ-साथ तेरी भी पढ़ाई होती रहेगी। क्योंकि ज्ञान बांटने पर बढ़ता है और हमारा ज्ञान कभी खत्म नहीं होता। मुझे भी दीदी की यह बात अच्छी लगी और मैंने उनकी बात मानी। उसी दिन गाँव वापस जाकर मैंने अपनी मम्मी को बोला कि मम्मी मैं घर का काम भी कर लूंगी, साथ ही मैं 2 घंटे खुद की पढ़ाई करूंगी और बच्चों को भी पढ़ाऊँगी। मैं खुद एक-एक घर जाकर लड़कियों को बुलाकर लेकर आती थी और उनको पढ़ाती थी। धीरे-धीरे मेरे पास बच्चों की संख्या बढ़ती गई।

पढ़ाई के बाद सब मिलकर खेल भी खेलते हैं

मैं खुद लड़कियों को उनके घर पढ़ाने गई थी पहले दिन। उस दिन पढ़ने के लिए केवल दो लड़कियां और एक छोटा बच्चा आया था, हर रोज़ ही इस तरह से तीन-चार बच्चे आते थे। लेकिन जब मैं इन बच्चों को काम देने लगी तो उनको भी लगा कि यह अच्छा पढ़ाती है और मेहनत कर रही है। फिर मेरे पास पढ़ने के लिए 30 से 40 तक बच्चे आने लगे। मेरे गाँव में अधिकांश घर राजपूत समाज के हैं। वो लोग भी अपने बच्चों को पढ़ने के लिए खुद मेरे घर छोड़ने आने लगे। यह बात मैं इसलिए भी बता रही हूं क्यूंकी हमारे यहाँ राजपूत समाज के लोग अपने बच्चों को हमारे घरों मैं नहीं आने देते थे और ना ही वो भील समाज के बच्चों को अपने घरों मैं आने दिया करते थे। लेकिन वही आज खुद अपने बच्चों को छोड़ने आ रहे हैं, यह देखकर मुझे बहुत खुशी हुई।

लेकिन एक परेशानी यह भी है कि जब कोई बच्चे नहीं आते थे, तब मैं खुद उनके घर जाकर उनको बुलाकर लाती थी या फिर उनके घर पर ही जाकर पढ़ाती थी। तो उनके दिमाग में यह गलतफहमी थी कि इसके स्कूल वाले इसे पैसे देते होंगे इसलिए पढ़ाती है। उन बच्चों को और उनके माता-पिता को समझाना बहुत मुश्किल था और उनके माता-पिता बच्चों को भेजने में बहाना करने लगे। वह बोलते थे कि घर पर काम बहुत है, बच्चे पढ़ने जाएंगे तो काम कौन करेगा? यहाँ पर अधिकतर लड़कियों की ज़िम्मेदारी होती है रोटी बनाना, बकरियां चराने जाना है और छोटे भाई-बहन की देखभाल करना। लेकिन मैंने एक बार उन सभी लड़कियों को बुलाकर उनके साथ मीटिंग कर उनको समझाया कि हमारे लिए पढ़ना बहुत ज़रूरी है। उन सभी ने मेरी बात को समझा और धीरे-धीरे सब पढ़ने आने लगी। मैंने कम से कम दो महीने तक बच्चों को पढ़ाया, लेकिन फिर अचानक मेरी तबियत बहुत ज़्यादा खराब हो गई थी जिसके वजह से मैंने पढ़ाना बंद कर दिया।

Author

  • मधु / Madhu

    मधु राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं। वर्तमान में मधु कक्षा 10 में पढ़ती हैं। लॉकडाउन के बाद से वह अपने गाँव में वृद्धा पेंशन, टीकाकरण और कोविड महामारी के बारे में जागरूकता और से बचाव के मुद्दों पर काम कर रही हैं।

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