युवानिया के एक साल पूरे होने पर मिली पाठकों की सराहना और प्यार

युवानिया के सभी साथियों को ज़िंदाबाद। पिछले साल जब युवानिया का पहला अंक प्रकाशित हुआ था तो साथी तेजस्विता और सिद्धार्थ से काफी लंबी बातचीत हुई थी। मेरी पहली आशंका यही थी कि कोई भी पत्रिका नियमित अंतराल पर लगातार निकालना/प्रकाशित करना बहुत मेहनत का काम है, पत्रिका के संपादकों को सामाग्री इकट्ठा करना पड़ता है, लगातार लिखने वालों को लिखने के लिए कहना पड़ता है। पर तमाम आशंकाओं को निर्मूल करते हुए हमारी ‘युवानिया’ एक साल- 24 अंकों की हो गई है। इस बीच ढेरों नए साथियों ने इसके लिए लेख, गीत, इलाके की गतिविधियों के बारे में लिखा, वहीं पुराने कुछ साथी भी लिख रहे हैं। ऐसी पत्रिकाएँ कम हैं जिनमें सामाजिक कार्यकर्ता जो देश के अलग-अलग हिस्सों में कार्यरत हैं – अपने अनुभवों को लिख रहे हैं, अपने इलाके – अपने कार्य की समस्याओं से सभी को अवगत करा रहे हैं। 

इस पूरे प्रयास के लिए सामाजिक परिवर्तन कार्यशाला के सभी साथी और श्रुति दिल्ली के सभी साथी, जो यह ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं, बधाई के पात्र है। ‘युवानिया’ ऐसे ही प्रकाशित होती रहे – नए साथी-नए लेखक इसमें लिखें और इसकी पहुँच दूर-दूर तक बने, ऐसी कामना है। आप सभी साथियों को बहुत बहुत बधाई। 

– देवेंद्र, (झिरी, राजस्थान)


Yuvaniya is a very interesting and very important portal where the youth living in remote areas can express their views on the current issues. I am a teacher and have read many articles published in this esteemed magazine. It is an eye-opener about the life of these young citizens of our country and the challenges they face.

The writing abilities of many are to be applauded. Keep up your good work Team Yuvaniya. Heartiest congratulations to the Team.

– Shelly, (Delhi)

(हिन्दी अनुवाद)

युवानिया एक बेहद ही रोचक और ज़रूरी प्लैटफॉर्म है, जहाँ देश के दूर-दराज़ के इलाकों में रहने वाले युवा उनके मुद्दों पर अपने अनुभव और विचार अभिव्यक्त कर सकते हैं। मैं पेशे से एक शिक्षिका हूँ और इस बेहतरीन प्लैटफॉर्म पर आए काफी सारे लेख और कविताएं मैंने पढ़ी हैं। इन्हें पढ़ना, भारत के युवा नागरिकों के जीवन और उनकी चुनौतियों को समझाने वाला और आंखे खोल देने वाला अनुभव है। इन सभी युवाओं की लिखने के हुनर की सराहना की जानी चाहिए। 

टीम युवानिया! बस इसी तरह बेहतरीन काम करते रहिए। पहली सालगिरह पर सहृदय शुभकामनाएँ।

– शैली, (दिल्ली)


युवाओं को आज के ज़माने में कौशल से ज्यादा ‘मंच’ की जरूरत है। छोटे गांवों और कस्बों में रहने वाले प्रतिभाशाली युवा बस इस कारण अपने विचारों को व्यक्त करने में असमर्थ हैं, क्योंकि उन्हें युवानिया जैसे सुरक्षित मंच नही मिल पाते। अवसर से वंचित हमारे युवा साथी कहीं कॉन्टेंट कंज्यूमर न बन जाएं, इससे विपरीत आज के डिजिटल विश्व में हमे युवाओं के साथ मिलकर ऐसे मंच तैयार करने होंगे जो उनके विचारों, कला और प्रतिभा के उत्पादक और संरक्षक बने। एक साल पूरे होने पर युवानिया की टीम को तहेदिल से शुभकामनाएँ।

– स्वप्निल, (शिवपुरी, मध्य प्रदेश)


ऐसे समय में जब कोरोना महामारी ने सबसे ज़्यादा प्रभावित हमारे सार्वजनिक जीवन को किया है। आपस में मिलना-जुलना मुमकिन नहीं हो पा रहा है। राजनैतिक नज़रिये के निर्माण और एक दूसरे से सीखने -सिखाने की तमाम गतिविधियों पर अंकुश लगा है। देश एक ही समय में कई तरह की अपेक्षित, प्रायोजित और थोपी गयी समस्याओं से दो-चार हो रहा है। सामुदायिक जीवन में ‘सामाजिक दूरी’ को कोरोना से बचाव के नाम पर थोपा जा रहा है और उसे ही इस महामारी से बचने का अचूक समाधान बतलाया जा रहा है। मास्क से ढके चेहरों ने जैसे देश के नागरिकों को महज़ संख्याओं में बदल दिया है। बिना पूरे चेहरे के इस देश में घूमते हम नागरिक अपनी पहचानें खो रहे हैं। डर है कहीं धीरे-धीरे यह मुल्क चेहरा विहीन नागरिकों की एक सल्तनत न बन जाये।

ऐसे में युवानिया ने जैसे संवाद के लिए नए रास्ते खोले। युवानिया को सार्वजनिक पटल पर आए पूरा एक साल हो रहा है। इस एक साल में हर पखवाड़े (15 दिन) पर एक अंक प्रकाशित हुआ। यानी 24 अंकों ने सार्वजनिक जीवन में आए और थोपे गए खालीपन को भरने की कोशिश की।

यह वेब पत्रिका इसलिए एक नयी धमक और उम्मीद है क्योंकि यह एकतरफा एकालाप नहीं है, बल्कि यह उन युवाओं का सम्मिलित उद्यम है जो एक-दूसरे से बात करना चाहते हैं। एक-दूसरे से सीखना और सिखाना चाहते हैं। यह अपनी बताने और दूसरों की सुनने के लिए लालायित युवाओं का एक ऐसा स्पेस, बन सकी है जहां किसी की योग्यता या उसे तरजीह देने का पैमाना यह नहीं है कि वो कितना अच्छा लिखता है बल्कि इसका केवल और केवल एक पैमाना है कि वो अपनी बात को लिखना चाहता या चाहती है।

इस वेब पत्रिका की निरंतरता ने यह भरोसा दिया है कि हालात कैसे भी हों, हम नए रास्ते खोज सकते हैं। एक दरिया की मानिंद जो अपने रास्ते तलाश कर लेते हैं। उन हवाओं के मानिंद जिन्हें कहीं कभी कैद नहीं किया जा सकता। उन रोशनियों की माफिक जिन्हें अंधेरे को चीरना आता है और उस मिट्टी की तरह जो अपने भीतर समेट कर रख सकती है सालों का इतिहास और उसमें आए उतार-चढ़ाव और उस आग की तरह जिसे ऊपर जाने से कोई शै रोक नहीं सकती।

जब परिस्थितियां हर तरह से खिलाफ हों तब अपने पक्ष में उन्हें मोड़ना और उन कठिनाइयों को अपने लिए मुफीद बनाना दरअसल एक राजनैतिक प्रशिक्षण ही है, जो इस पत्रिका में शामिल युवाओं के मन मानस का हिस्सा बन चुका है। अगर कोरोना और उसके बचाव के लिए अपनाए और थोपे गए तरीकों के कारण मिलना-जुलना सहज होता तब शायद यह पत्रिका, इस तरह सामाजिक जीवन में वजूद में न आ पाती। हो सकता है किसी और रूप में कुछ और होता लेकिन यह पत्रिका ज़रूरी तौर पर उस विराट खालीपन को भरने की कोशिश ही मानी जाएगी।

आज एक साल बाद इस पत्रिका को देखें तो यह बात यकीन से कही जा सकती है कि इसने युवाओं में खुद को अभिव्यक्त करने की लालसा पैदा की है। उन्हें अपनी बात कहने के अंदाज़ भी दिये हैं और परवाज़ भी दी है। इस पत्रिका के कई अंक केवल इसलिए संग्रहणीय हैं क्योंकि उनमें वो हक़ीक़तें दर्ज़ हैं जो दूर- दराज़ के इलाकों से आज की कॉर्पोरेट मीडिया के लिए जहर के माफिक हैं। इस पत्रिका ने जनवादी मीडिया के तौर पर एक सशक्त मौजूदगी दर्ज़ कराई है।

श्रुति की युवा टीम और युवानिया के युवा संपादक मण्डल ने जिस तरह से अपनी प्रतिबद्धता और कौशल, इसमें निवेश किया है उसे सलाम किया जाना चाहिए। यहाँ उन सभी का नाम लिया जाना इसलिए भी ज़रूरी है ताकि उन्हें इस बात का गर्वीला एहसास हो कि उनकी इस अथक मेहनत, कौशल और कामिटमेंट को दुनिया में देख रहे हैं, उसकी सराहना कर रहे हैं।

बेशक तेजस्विता और सिद्धार्थ ने इसका ज़िम्मा लिया लेकिन श्रुति टीम के सभी साथियों, महिपाल, जुहेब, आशा, एलीन, एमलॉन और सौरभ ने समन्वयन भी किया और अपनी अपनी खूबियों को इसमें लगाया। अमित भाई के बिना यह पत्रिका न तो वजूद में आती और न ही इसमें निरंतरता शायद रह पाती। बहरहाल।

यह पहला साल महज़ इब्तिदा है। इसे बहुत दूर जाना है और अपने समय के सवालों का प्रतिपक्ष बनना है। जवाब तलाशना है और एक-दूसरे के साथ चलते हुए सभी के लिए बेहतर ज़िंदगी के लिए जगह बनाना है।

शुभकामनाओं सहित

सत्यम और श्वेता, (दिल्ली)


पिछले एक साल में, मैंने युवानिया के कुछ लेख पढ़े हैं। इस प्लैटफॉर्म की ख़ूबसूरती और शक्ति इसके लिए काम करने वालों के जोशीले नेतृत्व और उनके दिलों की सच्चाई से आती है। इसमें प्रकाशित हुए लेख, ना सिर्फ़ ग्रामीण युवाओं की सशक्त आवाज़ है, पर यह उनके व्यक्तित्व, दिनचर्या, आकांक्षाओं और बदलाव के जज़्बे का प्रमाण भी हैं। मुझ जैसी छोटे शहर से आने एक महिला के लिए, जो काफ़ी सालों से बड़े शहरों में रहकर सामाजिक न्याय के लिए काम कर रही है, युवानिया एक महत्वपूर्ण कड़ी को जोड़ता है। एक साल पूरा होने पर मैं युवानिया की टीम को और सारे लेखकों को बधाई देती हूँ। 

जय भीम, जय जोहार, सतरंगी सलाम। 

अपराजिता पांडे, (दिल्ली)


युवानिया पत्रिका मेरे दिल के बहुत करीब है, मुझे इससे आज के समय की युवादृष्टि को समझने का मौका मिलता है। पिछले एक वर्ष में युवानिया ने मेरे ज्ञानवर्धन में भी काफी सहयोग किया है। मैं इस पत्रिका के माध्यम से देश, शहर और गाँव में हो रहे बदलाव से रूबरू होता हूँ। 

– गौरव किशन, (बेगूसराय, बिहार)

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